जयपुर कलक्टर भूले अपनी ही बेटी को, दिवाली पर सबका साथ लेकिन पिता का इंतजार

जयपुर कलक्टर की गोद ली हुई बेटी अमिता टांक की जुबानी पीड़ा, खाते में पैसा आ रहा, लेकिन प्यार नहीं मिल रहा, दिवाली पर आज नए कपड़ों और पटाखे का इंतजार, 2016 में जयपुर सहित अन्य कलक्टरों ने गोद ली थी अनाथ बेटियां

विजय शर्मा / जयपुर। बचपन में मां-पापा ने बहुत प्यार दिया। उनके साथ खेली-कूदी। लेकिन मुझे पता नहीं था, उनका साया इतनी जल्दी उठ जाएगा। 2011 में पापा मुझे छोड़कर दुनिया से चले गए। अब मेरे पास मां ही बची थी। लेकिन किस्मत को यह भी मंजूर नहीं था। दो साल बाद बीमारी के चलते 2013 में मां का साथ भी छूट गया। आठ साल की उम्र में ही मैं अनाथ हो गई। लेकिन मेरा दुख और दर्द भगवान ने सुना।

2016 में 12 साल की उम्र में मुझे फिर से नए पापा मिले। जिन्होंने मेरा हाथ पकड़ा वह थे जयपुर कलक्टर। ना केवल गोद लिया बल्कि मेरी पढ़ाई का जिम्मा भी उठाया। तब मुझे उन्होंने अच्छे कपड़े दिलाए और स्कूल में एडमिशन भी। आज तीन साल हो गए। अब सुना है कलक्टर बदल गए हैं। मेरी जिम्मेदारी भी अब नए कलक्टर पर आ गई है। मैं गांधी नगर स्थित हॉस्टल में रहती हूं। मेरे खाते में पढ़ाई के 500-600 रुपए आते हैं। बस यह पता है कि पैसे पापा भिजवाते हैं। दुख इस बात का है कि कलक्टर पापा को मैंने देखा नहीं है। हॉस्टल से लेकर स्कूल में सभी मुझ से कहते हैं, मेरे पापा कलक्टर हैं। लेकिन वो मुझसे कभी मिलने नहीं आते।

स्कूल में प्रिंसिपल से लेकर मैडम मेरा खयाल रखती हैं। अब कोई त्योहार हो तो मैडम मिलकर मुझे नए कपड़े दिलाती हैं। स्कूल में सबकी लाड़ली हूं। मगर दुख बस इतना है कि पापा पैसे तो भेजते हैं प्यार नहीं। दिवाली आने वाली है, मैं भी चाहती हूं कलक्टर पापा के साथ दिवाली मनाऊं। यदि आपको कलक्टर पापा मिले तो उनके मेरी बात कह देना।

यह पीड़ा बयां कर रही है कि...फिर अनाथ हो गई बेटी

जयपुर कलक्टर की ओर से गोद ली गई बेटी अमिता का दुख यह बयां कर रहा है कि वह एक बार फिर अनाथ हो गई है। तत्कालीन कलक्टर सिद्धार्थ महाजन ने उसे गोद लिया था। यही नहीं शुरुआत में तो जिला प्रशासन के कार्यक्रमों में उसे बुलाया जाता रहा। लेकिन अब जयपुर कलक्टर को बदले हुए नौ महीने हो गए। ना ही बेटी और ना ही कलक्टर ने गोद ली गई अमिता का चेहरा देखा है।

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