मैं हवामहल। देश-दुनिया के आकर्षण का केन्द्र। विश्व विरासत का सेहरा जिस परकोटे (भीतरी शहर) के सिर सजा है, उसका मुकुट मैं ही तो हंू। मगर हालत बुरी है मेरी। कई जगह खिड़की-किवाड़ टूटे हुए हैं। जिस कारीगरी के दम पर मेरी पहचान है, उस पर गर्द जमी है। जिस रंग ने जयपुर को गुलाबी पहचान दी, वह पपडिय़ां बनकर उधड़ रहा है। जब-जब मेरे आसपास से देशी-विदेशी सैलानी गुजरते हैं, वे मुझे देखकर प्रसन्न होते हैं मगर मैं उनके समक्ष शर्मिन्दा ही रहता हंू।

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