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पुरुष आज भी महिलाओं को आगे बढ़ते देखना पसंद नहीं करते: इंदिरा नुई


आज भी हमारे समाज में पुरुष महिला को काम करते हुए और उसे आगे बढ़ते देखना पसंद नहीं करते। आज भी महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कमतर आंका जाता है। यह कहना है इंदिरा नूई का जो सोमवार को जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के तीसरे दिन दरबार हॉल में अपनी बुक 'माई लाइफ इन फुल वर्क फैमिली एंड ऑवर फ्यूचर' पर अर्पणा पीरामल से चर्चा कर रही थीं।

जयपुर

Published: March 07, 2022 09:12:29 pm


आज भी हमारे समाज में पुरुष महिला को काम करते हुए और उसे आगे बढ़ते देखना पसंद नहीं करते। आज भी महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कमतर आंका जाता है। यह कहना है इंदिरा नूई का जो सोमवार को जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के तीसरे दिन दरबार हॉल में अपनी बुक 'माई लाइफ इन फुल वर्क फैमिली एंड ऑवर फ्यूचर' पर अर्पणा पीरामल से चर्चा कर रही थीं। उन्होंने अपनी ऑटोबायोग्राफी माई लाइफ इन फुल वर्क फैमिली एंड ऑवर फ्यूचर में उन्होंने अपने निजी और व्यवसायिक दोनों जिदंगियों से जुड़े कई किस्से लिखे हैं। उन्होंने इस सेशन में अपने जीवन के सफर,अपने धैर्य और दृढ़ संकल्प की चर्चा की। उन्होंने अपने उस सफर की बात की, जिसमें उन्होंने तमाम रूढि़वादी विचारधाराओं को तोड़कर,लिंग और नस्ल की बाधाओं को पार कर ग्लोबल बिजनेस लीडर का खिताब हासिल किया। अपनी बुक पर चर्चा करते हुए उनका कहना था कि पुरुष कार्मिक आज भी महिला कार्मिक या बॉस के साथ काम करने में सहज महसूस नहीं करते जबकि महिला अपने काम को लेकर अधिक सक्षम या योग्य होती है। पुरुष अकसर फ्रस्ट्रेशन में आ जाते हैं लेकिन महिलाओं के साथ ऐसा कम होता है।
पुरुष आज भी महिलाओं को आगे बढ़ते देखना पसंद नहीं करते: इंदिरा नुई
पुरुष आज भी महिलाओं को आगे बढ़ते देखना पसंद नहीं करते: इंदिरा नुई
वहीं कार्यालयों में बढ़ते यौन उत्पीडऩ को लेकर उनका कहना था कि मेरे साथ कभी यौन उत्पीडऩ की कोई घटना नहीं हुई। हालांकि, कॉरपोरेट जगत में अपने शुरुआती दिनों में बहुत सारे पुरुषों के व्यवहार से मेरी शालीनता और मेरे मूल्यों को ठेस पहुंची। बाद में मैंने इसे देखते ही ऐसे व्यवहार को बंद करने को प्राथमिकता दी लेकिन मेरा मानना है कि यदि किसी के साथ वर्क प्लेस में ऐसा व्यवहार होता है तो उसे इसके खिलाफ आवाज उठानी चाहिए। अगर महिलाओं को लगता है कि उन्हें सही वेतन नहीं मिल रहा है तो उन्हें बोलना ही चाहिए। वे इसके लिए कॉर्पोरेट व सरकारी स्तर पर प्रयासों की पैरवी करती हैं। विदेश में अपनी संस्कृति और अपने पहनावे को लेकर भी उनका कहना है कि मेरे पहनावे से शुरुआती दिनों में कलीग्स को असहज महसूस होता था। वह मेरे बिना ही क्लाइंट मीटिंग्स में चले जाते थे। पेपसिको के अपने अनुभव को लेकर उन्होंने कहा कि वह एक ग्रेट कम्पनी थी, जहां उन्होंने बतौर सीईओ काम किया। मैं वहां वीकेंड पर भी आफिस जाती थी।
ऑफिसों में बढ़ते वर्क प्रेशर पर सहमति जताते हुए उन्होंने कहा कि आज कार्यालयों में वर्कप्रेशर बढ़ रहा है और इसकी वजह से स्ट्रेस भी बढ़ा है। अपने ऑफिस का उदाहरण देते हुए वह कहती हैं कि मैंने प्रयास किया कि यहां ऐसा ना हो। वर्क स्टे्रस को कम करने के लिए मेरी प्लानिंग पहले से ही शुरू हो जाती है। मैं अपने एम्पलॉय को एक माह पूर्व ही टास्क दे देती हूं। जिससे उसे अपना टारगेट पूरा करने का समय मिले और स्टे्रस कम हो।
इंदिरा के मुताबिक उनका जीवन द्वंदों से भरा हुआ है। एक पत्नी और कार्यकारी अधिकारी के बीच का द्वंद, एक मां और कार्यकारी अधिकारी के बीच का द्वंद, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र के बीच का द्वंद। इन सबके बाद भी मैं खुद को मल्टीपल वर्कर मानती हूं।अपने व्यक्तिगत जीवन को लेकर उनका कहना था कि परिवार हमेशा उनके लिए प्राथमिकता रही है। अपनी दोनों बेटियों के साथ समय बिताने में उन्हें सबसे अधिक खुशी मिलती है। उन्होंने कहा कि मुझे म्यूजिक सुनना पसंद है। साथ ही रीडिंग और स्पोट्र्स भी लेकिन टीवी पर जब स्पोट्र्स चल रहे होते हैं तो बुक पढ़ते हुए उसे देखती है और सारा ध्यान किताब पर चला जाता है। खुद को सोशलाइज नहीं मानने वाली इंदिरा के मुताबिक उन्हें पार्टी में जाना पसंद नहीं हैं। वह बताती हैं कि उनकी जिदंगी बेहद आसान नहीं रहीं। जब मैँ बच्ची थी तब खुद से सवाल पूछती थी। यह मुझे तय करना था कि मुझे क्या करना है। मैं लगातार पढऩे लगी। मेडिटेशन करने लगी। मुझे लगता है कि आप जो भी काम करते हैं उसे लोग आसानी से अपनाने के लिए तैयार नहीं होते लििेकन जब आप खुद से तय कर लेते हो कि आपको किस मुकाम पर पहुंचना है तो आप उसे हासिल कर लेते हो।

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