हिला गया नाटक 'पागलघर'

एक लेखक का सत्ता की गुलामी स्वीकार न करना यानी घोड़ा न बनना, उसका वैचारिक विद्रोह मान दबाव बनाने के बाद उसे पागल घोषित कर पागलखाने में डालना।

जयपुर। क्या बुद्धिजीवी वैचारिक प्रदूषण फैलाते हैं? क्या विदेशी लेखकों की किताबें पढ़ना देशद्रोह है? क्या किताबें मानसिक विकार पैदा करती हैं? इन सवालों का आपका जवाब 'नहीं' ही होगा न! ये सवाल उठाता है रमेश शर्मा का डिजाइन्ड और निर्देशित नाटक "पागलघर"।

एक लेखक का सत्ता की गुलामी स्वीकार न करना यानी घोड़ा न बनना, उसका वैचारिक विद्रोह मान दबाव बनाने के बाद उसे पागल घोषित कर पागलखाने में डालना। तरह-तरह की यातनाएं देना, अंततः उसे घोड़ा न बनने का अपराध करने की वजह से खुदकुशी करने को मजबूर करना हिला देता है। संदेश देता है कि "विचार" कभी नहीं मरता। बहरहाल, एक बेहतरीन नाटक एक शाम को अच्छी सोच दे गया।

नाटक में शैलेन्द्र सिंह (लेखक), विजय सिंह राठौड़ (नेता), दिपांशु पाण्डे (युवा डॉक्टर), सुरेश आचार्य (अफसर), वसीम राजा (वरिष्ठ डॉक्टर) ने सधा हुआ अभिनय किया। रोहित मुंधडा एवं अक्षय सियोता (सिपाही) के लिए खास करने को था नहीं।

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