कहानी - सपनों की उड़ान

प्यार की नाकामी जीवन का अंत नहीं बल्कि जिंदगी रूपी किताब का एक पृष्ठ मात्र है जिससे आगे बढकर मेहनत से अपने सपनों की एक नई इबारत लिखनी चाहिए।

By: Chand Sheikh

Published: 14 Jan 2021, 01:31 PM IST

आलोक सिंघल

आज अस्पताल के एक कमरे के बाहर 'डॉ. शिखा सिंह' की नेम प्लेट पढ़कर सहसा मेरी बचपन की दोस्त का ख्याल आ गया जिसे हम शेखू-फेंकू कहकर चिढ़ाते थे। तभी अंदर से नर्स की कर्कश आकाज ने मेरा ध्यान भंग किया 'भाईसाहब आपके बाबूजी की तबियत अचानक खराब हो गई है आप यहीं बैठो, मैं डॉक्टर साहब को बुलाकर लाती हूं।

बाऊजी कई वर्षों से कैंसर से जूझा रहे थे और पिछले कुछ हफ्तों से उनकी तबियत तेजी से खराब होती जा रही थी। अब पूरी तरह से दवाओं से ही गुजारा हो रहा था। नर्स द्वारा दी गई दवा खाकर बाऊजी कुछ पल चैन की नींद अभी सोए ही थे। अचानक मेरे बचपन के किस्से मेरे मानस पटल पर सहसा ब्लैक एण्ड व्हाइट फिल्म की तरह जीवन्त होने लगे। मेरे सभी दोस्तों में पढ़ाई में सबसे होशियार थी शेखू। सांवले रंग के कारण उसके व्यक्तित्व की गंभीरता उभरकर आती थी। दोस्त रंग-रूप को लेकर कितना भी चिढ़ाते हों लेकिन उसकी आंखों की सच्चाई मुझो हमेशा खींचती थी।

ग्यारहवीं कक्षा में बायोलॉजी ले तो ली लेकिन दो महीनों में ही मेरे पसीने छूट गए और तब मेरी सच्ची मित्र शिखा ने मुझो इस मानसिक तनाव से उभरने में सहारा दिया। मैं धीरे-धीरे बायो-फिजिक्स, कैमेस्ट्री सभी कुछ अच्छे से समझाने लगा और साथ ही शिखा के पवित्र प्रेम को भी समझाने लगा जो कि शायद वह मुझासे बचपन से करती थी, परन्तु कभी कह नहीं पाई। मैं उससे कुछ कहता या उससे कुछ सुनता उससे पहले ही नियति को कुछ और ही मंजूर था। शिखा की माताजी को कैंसर था। उसी जानलेवा कैंसर से एक दिन अचानक उनकी मृत्यु हो गई और उसका परिवार उसके पैतृक शहर में जा बसा।

जब हम आखिरी बार अलग हुए थे, उसकी आंखों के आंसुओं के शोर में उसकी मंदी मुस्कुराहट फीकी सी प्रतीत होती थी। फिर कब मिलोगी? मैंने पूछा। 'जब ईश्वर को मंजूर होगा।' कहकर वह हमेशा के लिए चली गई। मुझो तो यह भी नहीं पता था कि वह सचमुच मुझासे प्यार करती भी है या नहीं। हालांकि मेरे दिल को इस बात का यकीन था। हम दोनों की आंखों से बहती अश्रुधारा मूक थी परन्तु चिल्ला-चिल्लाकर हमारे प्रगाढ़ प्रेम को प्रतिबिम्बित कर रही थी।
नर्स की कर्कश आवाज ने पुन: मेरी स्मृतियों को शून्य कर दिया। 'यह दवा जल्दी लेकर आइए। डॉक्टर राउंड पर आने वाली हैं। तेज कदमों से मैं दवा लेकर बाबूजी के बिस्तर के पास लौटा तो डॉक्टरों व नर्सों की टीम उन्हें घेरे खड़ी थी। मेरी नजर उन पैनी नजरों से मिली जो जानी पहचानी थी। 'शेखू!' मुंह से निकला! 'तुम यहां? 'कैसे हो अमित?' वही मंदी मुस्कान पर आवाज में औपचारिकता अधिक थी। मानो वह सबके सामने बचपन के दोस्त से खुलकर नहीं मिल पा रही हो। मैं ठीक हूं।

मेरी दोस्त 'शेखू' ही अब इस अस्पताल की कैंसर स्पेशलिस्ट डॉ. शिखा सिंह है। वार्ड का राउंड लेने के बाद शिखा ने मुझो अपने रूम में चाय पर बुलाया तो सहसा मुंह से निकला 'डॉ. शिखा सिंह.........तुम हमेशा से यही बनना चाहती थी ना.....' और हम दोनों मुस्कुराए। सफर की चुनौतियों के विषय में चर्चा करने में अब हम दोनों की कोई रूचि नहीं थी। जीवन के हसीन बचपन को कुछ याद ही किया था कि डॉ. शिखा सिंह को 43 नं. रूम के मरीज का कॉल आ गया और वो फिर बातें अधूरी छोड़ बिना पीछे मुड़े आगे बढ गई। शायद यही था उसकी कामयाबी का रहस्य। खुद पर जज्बात को हावी नहीं होने देती थी। खुद पर व खुद के सपनों पर उसे इतना यकीन था तथा सपनों को हकीकत में बदलने का उसके मन में एक जुनून भी था। उसी क्षण मन के एक कोने में आत्म विश्लेषण शुरू हो गया कि शिखा के जाने के बाद पहले प्यार में नाकाम मैं बारहवीं भी धक्के से पास कर पाया। बाबूजी की परचूनी की पुश्तैनी दुकान ने मुझो उनकी इकलौती संतान को रोजगार तो दे दिया परन्तु कहीं न कहीं मैं बहुत पिछड़ गया था। यूं तो हमें पैसे की कमी न थी। कमी थी तो अपने सपनों में रंग भरकर उड़ान भरने की और इसी हताशा ने मुझो एक अलग इंसान बना दिया था।

लेकिन शिखा ने भी वही दर्द सहा पर अपने सपनों की उड़ान को रुकने नहीं दिया। उसकी माता जी की कैंसर से मृत्यु के बाद से ही वह दृढ़ संकल्प थी कि मैं कैंसर स्पेशलिस्ट डॉक्टर बनूंगी और उसने अपने अरमानों को मूर्त रूप दिया। सच तो यह है कि जिंदगी ने मुझो और शिखा को एक समान अवसर दिया जिससे मैंने तो मेरे जीवन को महज सम्भाला था लेकिन शिखा ने अपना व अपनों का जीवन संवारा है। शिखा ने अपनी भावनाओं को अपने सपनों का गला नहीं घोंटने दिया बल्कि अपने जज्बात को खुद की शक्ति बना लिया। प्यार की नाकामी को मैंने जीवन की हार का कारण समझा लिया। शिखा मिसाल है उन लोगों के लिए जो प्यार की नाकामी से जीवन का अंत कर देते हैं। प्यार की नाकामी, जीवन की नाकामी या जीवन का अंत नहीं बल्कि जिंदगी रूपी किताब का एक पृष्ठ मात्र है जिससे आगे बढकर अपनी मेहनत से अपने सपनों और हौसलों की एक नई इबारत लिखनी चाहिए।

शिखा के लिए मेरे मन में सम्मान और बढ गया और अचानक मैं चौंका....सॉरी-सॉरी कहती हुई शिखा कमरे में आई और उसकी आत्मविश्वास से भरी आंखों को देखकर सहसा मुझो खुद पर नाज हुआ कि मैंने ऐसे हीरे की परख कर उससे प्यार
किया था।

Chand Sheikh Desk
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