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स्मृति शेष: कल्याण सिंह पहले ऐसे राज्यपाल थे, जो अपना खाना खुद ही बनाते थे

Kalyan Singh Biography: पूर्व राज्यपाल कल्याण सिंह ने शनिवार को अंतिम सांस ली। उन्हें वीआइपी कल्चर के खिलाफ किए गए फैसलों के कारण याद किया जाएगा।

जयपुर

Updated: August 22, 2021 10:34:39 am

पत्रिका न्यूज नेटवर्क

जयपुर। Kalyan Singh Biography: पूर्व राज्यपाल कल्याण सिंह ने शनिवार को अंतिम सांस ली। उन्हें वीआइपी कल्चर के खिलाफ किए गए फैसलों के कारण याद किया जाएगा। सिंह ने अपने कार्यकाल के दौरान राज्यपाल के आगे लगने वाला महामहिम शब्द हटवाकर इसकी जगह माननीय शब्द करवा दिया था।

Kalyan Singh

राज्यपाल को जयपुर से बाहर जाने पर दिया जाने वाला गार्ड ऑफ ऑनर भी उन्होंने बंद करवा दिया। विश्वविद्यालयों में 26 साल बाद दीक्षांत समारोह हर वर्ष करवाने की शुरुआत भी उन्होंने की। इसके लिए उनकी शर्त थी कि सबकी डिग्रियां आवश्यक रूप से तैयार हो जाएं।

दीक्षांत समारोह में जाने पर विवि द्वारा गोद लिए गांव को देखने अवश्य जाते थे। साथ ही दीक्षांत समारोह में गाउन पहनना बंद करवाकर उसकी जगह परम्परागत भारतीय पोशाक पहनना शुरू करवाया। परीक्षा से लेकर उत्तर पुस्तिकाओं के पूनर्मूल्यांकन के काम समयबद्ध करवाने की पहल करवाई थी। नकल पर उनकी सख्ती रहती थी।

कोई मामला ध्यान में आता तो उसको वो बिना कार्रवाई नहीं छोड़ते। कल्याण सिंह ने 4 सितम्बर, 2014 को राज्यपाल के पद की शपथ ली थी और वे 8 सितम्बर, 2019 तक राज्यपाल रहे। उन्होंने 2015 में हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल के रूप में अतिरिक्त कार्यभार भी संभाला।

16 साल बाद मिले थे कार्यकाल पूरा करने वाले राज्यपाल
कल्याण सिंह राजस्थान के उन चुनिंदा राज्यपालों में शामिल हैं, जिन्होंने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया था। राजस्थान के राज्यपाल के रूप में अपना पूरा कार्यकाल निकालने वाले कल्याण सिंह सातवें राज्यपाल रहे हैं। उनसे पहले छह ही राज्यपाल ऐसे थे, जिन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया। कल्याण सिंह के कार्यकाल की शुरुआत होने से पहले बलिराम भगत ऐसे राज्यपाल थे, जिन्होंने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। बलिराम भगत 1993 से लेकर 1998 तक राज्यपाल रहे थे।

खुद ही बनाते थे अपना खाना
वे पहले ऐसे राज्यपाल थे, जो अपना खाना खुद ही बनाते थे और पद पर रहते हुए भी उनकी थाली में केवल चटनी, रोटी के साथ छाछ का एक गिलास होता था। यह उनकी सादगी का एहसास कराता था। उनसे कोई खास मिलने जाता तो वह अपने स्टाफ को बोलते, मेरी वाली चाय लेकर आना। इसका मतलब होता था केवल दूध वाली चाय। वे राजभवन पहुंचने वाले हर व्यक्ति से मिलते थे और जो भी मिलने पहुंचता उससे पूछते चाय—पानी ली या नहीं। चाय—पानी के साथ मिठाई सर्व करने के भी राजभवन कर्मचारियों को स्पष्ट निर्देश थे।

दो बार भाजपा छोड़ी फिर जुड़े
रामभक्ति के प्रति वशीभूत होकर अपना सर्वस्व निछावर कर देने वाले यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने अपने संघर्ष के बल पर यूपी में पहली बार भाजपा की सरकार बनाई और राम के नाम पर साल भर के भीतर सरकार भी चली गई। पखवाड़े भर पहले उनसे मिलने गए कुछ मीडियाकर्मियों से उन्होंने दोहराया था...अफसोस न गम जयश्रीराम।

राममंदिर आंदोलन में आगे रहे कल्याण सिंह की पहचान कट्टरपंथी हिंदुत्ववादी और प्रखर वक्ता की थी।30 अक्टूबर 1990 को जब मुलायम सिंह यादव यूपी के मुख्यमंत्री थे और कारसेवकों पर गोलियां चलीं तब बीजेपी ने उग्र हिंदुत्व को उफान देने के लिए कल्याण सिंह को ही आगे किया गया। अपने संघर्ष के बल पर उन्होंने 1991 में भाजपा की सरकार बनायी।

मंत्रिमंडल गठन के बाद उन्होंने रामलला परिसर का पूरे मंत्रिमंडल के साथ दौरा किया और राममंदिर बनाने का संकल्प लिया। उनकी सरकार के एक साल भी नहीं गुजरे थे कि 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में विवादित ढांचा ढहा दिया गया। इसके लिए उनको नैतिक जिम्मेदारी लेकर मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया और केंद्र सरकार ने उनकी सरकार बर्खास्त कर दी।

1967 में अतरौली विधानसभा से पहली बार विधायक बनने के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। इस सीट से वे आठ बार जीते। दिसंबर 1999 मे कल्याण सिंह ने कुछ मतभेदों की वजह से भाजपा छोड़ दी। साल 2004 में एक बार फिर से भाजपा के साथ राजनीति से जुड़ गए।

2004 में उन्होंने भाजपा के उम्मीदवार के रूप में बुलंदशहर से विधायक के लिए चुनाव लड़ा। 2009 में एक बार उन्होंने भाजपा छोड़ दिया और खुद एटा लोकसभा चुनाव के लिए निर्दलीय खड़े हुए और जीते भी। कल्याण सिंह का 23 अगस्त को अंतिम संस्कार किया जाएगा। उनका 5 जनवरी 1932 को अलीगढ़ में जन्म हुआ था।

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