कविता- यदि जानना हो तो

कविता का मर्म जानना हो तो उसे कागजों से निकाल रूह तक ले जाओ
कविता की मासूम भाषा में उम्मीद अभी तक जिंदा है।

By: Chand Sheikh

Published: 25 Nov 2020, 10:51 AM IST

कविता- यदि जानना हो तो

निर्मल गुप्त

हंसना क्या होता है
यह जानना हो तो
किसी मसखरे से पूछो
बाकी लोग तो बस
यूं ही हंस लिया करते हैं।

मुस्कान की थाह लेनी है
तो उस रिसेप्शनिस्ट से जानें
जिसके जबडों में
मुस्कराते रहने की जद््दोजहद में
गठिया हो जाती है।

मौन की भाषा को जानना है
तो झाांक लो
उन लाचार आंखों में
जिन्होंने अभी तक हर हाल में
सच बोलने की जिद नहीं छोड़ी है।

कविता का मर्म जानना हो
तो उसे कागजों से निकाल
रूह तक ले जाओ
कविता की मासूम भाषा में
उम्मीद अभी तक जिंदा है।

जिंदगी का मर्म जानना है
तो मौत की दहलीज तक
टहल आओ
इसे ऐसे सपने की तरह जियो
जो कच्ची नींद में टूट भी जाए
पर मन मायूस न हो।

नए शब्द नए भावार्थ गढते हुए
सब खुद -ब -खुद पता चलता है
किसी से कुछ मत पूछो।
बहती नदी की गति को
तस्दीक की जरूरत नहीं।

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कविता- जिंदगी एक पहेली

संजय गौड़

जिंदगी, तुम क्यूं,
पहेली सी लगती हो।
कभी सखा,
कभी, सहेली सी लगती हो।

बदलती हो,
हर पल रंग,
हर लम्हा नई,
नवेली सी लगती हो।

सारा जहां,
साथ है तुम्हारे,
फिर क्यूं,
अकेली सी लगती हो।

शहद जैसी मीठी,
सड़क जैसी सीधी,
जाने क्यूं,
जलेबी सी लगती हो।

तुम ही मीत, तुम ही से गीत,
मगर क्यूं,
फरेबी सी लगती हो।

बच्चों जैसी नादानी,
अल्हड़ मस्त जवानी,
कभी मदमाती,
अठखेली सी लगती हो।

तप्त लावा कभी,
शांत सागर कभी,
बड़ी ही अनूठी,
अलबेली सी लगती हो।

सच कहूं,
जितना भी समझांू,
जिंदगी तुम,
अजनबी सी लगती हो।

Chand Sheikh Desk
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