निर्जला एकादशी 2020: जानें म​हर्षि वेद व्यास ने क्यों निर्जला एकादशी को बताया सर्वश्रेष्ठ

महाभारत में भी मिलता है उल्लेख

By: SAVITA VYAS

Published: 02 Jun 2020, 03:03 PM IST

जयपुर। जेष्ठ शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली निर्जला एकादशी को सभी एकादशी में सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। पौराणिक मान्यता के अनुसार इस एकादशी को निर्जल रह कर उपवास करने से वर्ष की 24 एकादशियों के व्रत के समान फल मिलता है। ऋषि वेदव्यास जी के अनुसार इस एकादशी को पांडव पुत्र भीम ने किया था। इसी वजह इस एकादशी को भीम सैनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।
ज्योतिषाचार्य सुरेश शास्त्री के अनुसार एकादशी का व्रत करने के साथ दान का भी विशेष महत्व है। इस लिए जरूरतमंद लोगों और ब्राह्मणों को दान करना चाहिए। इस दिन पानी पिलाने का महत्व होने से कई जगहों पानी की छबीले लगा कर नीबू पानी, शर्बत, मिल्क रोज पिलाया जाता है।
इस दिन पवित्र नदी या सरोवर में स्नान करने की परंपरा है, लेकिन कोरोना संक्रमण के कारण लोग गलता सहित अन्य पवित्र नदी या सरोवर में डुबकी नहीं लगा सके। हालांकि श्रद्धालु सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए छोटे मंदिरों में शक्कर युक्त जल से भरे मिट्टी के घड़े, खरबूजा, आम, पंखी ठाकुरजी का अर्पित कर पुण्यार्जन कर रहे हैं।

मंदिरों में सजी झांकियां
आराध्य गोविन्ददेवजी मंदिर में महंत अजंनकुमार गोस्वामी के सान्निध्य में सुबह ठाकुरजी का अभिषेक कर नूतन पौशाक धारण करवाई गई। लॉकडाउन के चलते इस बार श्रद्धालु अपने आराध्य के सम्मुख जाकर दर्शन नहीं कर सके। लोगों को ऑनलाइन दर्शन कर ही संतोष करना पड़ा। मानस गोस्वामी ने बताया कि आज शाम ग्वाल झांकी में 5.45 से 6.15 बजे तक जल विहार की झांकी सजाई जाएगी। इसमें ठाकुरजी को चंदन का लेप लगा कर केवडा एवं गुलाब जल युक्त सुगंधित जल से शीतलता प्रदान की जाएगी। ठाकुरजी को ऋतुफल, शर्बत, मुरब्बे, एवं शीतल व्यंजनों का भोग लगाया जाएगा। उधर पुरानी बस्ती स्थित गोपीनाथ जी के मंदिर में महंत सिद्धार्थ गोस्वामी के सान्निध्य में भगवान का अभिषेक कर पौशाक धारण करवाई गई। देवस्थान विभाग के चांदनी चौक स्थित मंदिर ब्रजनिधिजी में पुजारी भूपेन्द्र कुमार रावल के सान्निध्य में तथा मंदिर श्री आनंदकृष्ण बिहारीजी में पुजारी मातृप्रसाद के सान्निध्य में जल विहार झांकी सजाई गई। इस मौके पर ठाकुरजी को नवीन पौशाक धारण करवा कर ऋतुफलों एवं शीतल व्यंजनों का भोग लगाया गया। इसके बाद पुष्पों से झांकी सजाई जाएगी। गोनेर में भी इस बार लॉकडाउन के कारण लक्ष्मी जगदीश महाराज के मेला नहीं भरा। मंदिर स्थापना के बाद पहली बार निर्जला एकादशी के दिन श्रद्धालुओं के लिए पट नहीं खुले।

पौराणिक कथाओं के अनुसार नाम के अनुसार व्रत को निर्जला करने से आयु और आरोग्य में वृद्धि होती है। महर्षि व्यास के कथनानुसार अधिमास सहित एक वर्ष की 25 एकादशी व्रत न किया जा सके तो केवल निर्जला एकादशी व्रत करने से पूरा फल प्राप्त हो जाता है। दृढतापूर्वक नियम पालन के साथ निर्जल उपवास करके द्वादशी को स्नान करने के बाद सामथ्र्य अनुसार स्वर्ण व जल युक्त कलश दान का विधान है। इस व्रत को महाभारत काल में पांडवों में भीमसेन ने भी किया था। इसलिए इसे भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है। एक बार बहुभोजी भीमसेन ने व्यास जी के मुख से प्रत्येक एकादशी को निराहार रहने का नियम सुनकर विनम्र भाव से कहा कि महाराज मुझसे कोई व्रत नहीं किया जाता है। दिन भर बड़ी तीव्र क्षुधा बनी रहती है अत: ऐसा उपाय बताइए जिसके प्रभाव से स्वत: सद्गति हो जाए। तब व्यास जी ने केवल एक निर्जला व्रत की सलाह दी।

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SAVITA VYAS Desk
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