लघुकथा-परिस्थितियां सिखाती हैं

दादी कुछ समय से बीमार चल रही थी जो खाना बनाने में असमर्थ थी। रमेश खाना खाने के बाद कुछ खाना अपनी दादी के लिए ले कर जा रहा था। उसे अपनी बूढ़ी दादी की कितनी फिक्र है।

By: Chand Sheikh

Published: 21 Sep 2020, 11:53 AM IST

लघुकथा

रामगोपाल आचार्य

जब विद्यालय में बालकों को मध्यांतर का भोजन कराया जा रहा था, अधिकांश बच्चे खाना खाकर खेलने में जुट गए। चार-पांच साल का रमेश रोता हुआ आया उसका बस्ता और कपड़े सब्जी गिरने से गीले थे। जब हम अध्यापकों ने उसके रोने का कारण पूछा तो सहपाठियों ने बताया कि खाना खाने के बाद रमेश कुछ रोटियां और एक कटोरी में सब्जी अपने बैग में रख उसे संभाल कर चलता हुआ घर जा रहा था, तभी रोटी की सुगंध से एक कुत्ता उसके पीछे दौडऩे लगा,कुत्ते के डर से रमेश तेज भागने लगा तो उसकी कटोरी तिरछी हो गई और उसकी सब्जी गिर गई और वह रोने लगा।

यह सुनकर हमारे कुछ साथियों को एक क्षण के लिए गुस्सा भी आया कि जब खाना खा चुका था तो उसे और खाना घर ले जाने की क्या आवश्यकता थी। जब हमने उसके पड़ोसी बच्चों से पूछा तो उन्होंने बताया कि रमेश के पिताजी साल भर से बीमार चल रहे थे और पिछले महीने चल बसे। घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। घर में रमेश की मां एवं बूढ़ी दादी है।

पिताजी की मृत्यु के कुछ दिन बाद ही मां किसी ओर के साथ नाते चली गई। अब रमेश और उसका ख्याल रखने वाली दादी ही बची थी। दादी कुछ समय से बीमार चल रही थी जो खाना बनाने में असमर्थ थी। रमेश खाना खाने के बाद कुछ खाना अपनी दादी के लिए ले कर जा रहा था।

उसे अपनी बूढ़ी दादी की कितनी फिक्र है। हम सभी स्टाफ साथियों ने निश्चय किया कि रमेश को खाना खाने के बाद एक टिफिन खाना घर के लिए दिया जाएगा जो उसके स्वयं के एवं दादी के लिए होगा। हमने टिफिन ला कर उसे दिया, खाना खाते समय ही रमेश का टिफिन भर दिया जाता था।

Chand Sheikh Desk
और पढ़े

राजस्थान पत्रिका लाइव टीवी

हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned