लघुकथा - आखिरी फैसला

तेरी मुंबई की छठी मंजिल के फ्लैट में कैद होकर रह जाऊंगी मै बेटा। तुम दोनों तो सुबह से ही काम पर चले जाओगे। मै अकेली पूरा दिन क्या करूंगी?

By: Chand Sheikh

Published: 23 Feb 2021, 11:47 AM IST

शारदा गुप्ता

मकान व खेतों के कागजों पर साइन करते करते सुमन एकदम से रुक गई (उसे याद आया दिवाकरजी के बेटे ने पूरी जायदाद अपने नाम लिखवा ली थी। मां को बुढ़ापे का वास्ता व विदेश में रहने का लालच दिया था उसने भी। और एक दिन एयरपोर्ट पर मां को अकेला छोड़ कर खुद विदेश चला गया था।)

मां को कुछ सोचते हुए देख बेटा विमल सकते में आ गया। 'क्या बात है मां? मुझ पर विश्वास नहीं है क्या?' 'नहीं बेटा ऐसी कोई बात नहीं है। मुझो थोड़ा सोचने का समय दे। ये तुम्हारे दादाजी का बनाया हुआ मकान है जिसमें मैं दुल्हन बन कर आई थी। तेरे पापा व मैंने इस घर में सुख-दुख के दिन साथ रहते हुए देखे थे।' 'हम मुंबई ही तो जा रहे हैं। आप सोचो ना? सूना पड़ा पड़ा घर खण्डहर हो जाएगा। बाद में इसकी अच्छी कीमत भी नहीं मिलेगी।'

'तेरी मुंबई की छठी मंजिल के फ्लैट में कैद होकर रह जाऊंगी मै बेटा। तुम दोनों तो सुबह से ही काम पर चले जाओगे। मै अकेली पूरा दिन क्या करूंगी? गांव मै रोज मंदिर जाती हूं। पास पड़ोस भी अच्छा है। कभी-कभी खेतों पर भी जाती हूं। रामू मेरा पूरा ख्याल रखता है। एक आवाज पर दौड़ा चला आता है। यहां अपना हाथ जगन्नाथ है। नहीं बेटा, इस उम्र में मै चैन से जीना चाहती हूं।' और मां ने पेन धीरे से नीचे रख दिया।

--------

सेवाभाव

वंदनागोपाल शर्मा 'शैली'

सुबह-सुबह जब मैं कॉलेज के लिए साइकिल से निकलती तब मोहन अपने रिक्शे की सीट झाटकारता दिखता। तो कभी रिक्शे के चक्कों में हवा भरता दिखता!
मोहन, हमारे पड़ोसी, वकील अंकल जी के ऑफिस में काम करता था। साथ ही स्कूली बच्चों के लिए रिक्शा भी चलाता था।
एक दिन की बात है,मेरी साइकिल की चेन टूट गयी थी। मैं उसे सुधारने का प्रयास कर रही थी, कि तभी...
'दीदी जी! चलिए मैं आपको कॉलेज छोड़ देता हूं!' मोहन ने कहा।
'अरे! नहीं-नहीं' मैंने कहा।
'प्लीज मना न करें, आपकी क्लास मिस हो जाएगी।'
'अच्छा चलो!' मैंने उसका मन रखने के लिए 'हां' कर दी।

'मोहन! तुमने इंजीनियरिंग की है, फिर रिक्शागाड़ी क्यों चलाते हो?' मैंने उत्सुकतावश पूछा।जब तक नौकरी नहीं मिल जाती, रिक्शा चलाना जरूरी है। घर खर्च के लिए तो पैसों की जरूरत पड़ती है न!'
'इंजीनियर होकर तुम्हें रिक्शा चलाने में कभी शर्म नहीं आई?' मैंने उससे कहा।
'शर्म कैसी दीदीजी! इसी रिक्शे को चलाकर पिताजी ने मुझो इंजीनियर बनाया। आज उनके न रहने पर यही रिक्शा मुझो जीने की ताकत देता है। जब नौकरी मुझो मिल जाएगी, तब भी खाली समय पर जरूरतमंदों का सहारा मैं बनूंगा!'

Chand Sheikh Desk
और पढ़े

राजस्थान पत्रिका लाइव टीवी

हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned