लघुकथा-जुम्मन की शहनाई

आज केवल जुम्मन की मौत ही नहीं हुई हम पति-पत्नी के एक शहनाई बजाने वाले वालिद का इंतकाल हुआ था।

By: Chand Sheikh

Published: 20 Nov 2020, 12:21 PM IST

लघुकथाएं

जुम्मन की शहनाई
रंगनाथ द्विवेदी

जिस जुम्मन की मौत हुई थी वे कोई आम मौत नहीं बल्कि हमारे शहर के एक मशहूर शहनाई कलाकार की मौत थी। लगभग छह दशक तक जुम्मन मियां ने शायद ही कोई ऐसी शादी रही हो जिसमें उन्होंने शहनाई ना बजाई हो। जुम्मन की मौत की खबर ने छह दशक की उन सभी शादी वालों की आंखें भी भीगो दीं। शहर के वे एकलौते ऐसे शख्स थे, जिन्हें कोई भी मोहल्ला हिंदू या मुसलमान नहीं ंकहता था।

उनकी मौत की खबर सुन मैं और मेरी पत्नी दोनो ही फफक के रो पड़े। क्योंकि जुम्मन मियां ने हम दोनों की टूट और बिगड़ रही शादी को एक पिता की तरह आगे बढ़कर बचाया था। हमारी शादी की वे घटना आज फिर से जीवित हो गई, जब भरे मंडप में चक्कर आने की वजह से मैं गिर गया था। होने वाली पत्नी के रिश्तेदारों ने मुझो व मेरे पूरे परिवार को बंधक बनाकर पुलिस बुला कर एफ आई आर करा दी।

मेरी पत्नी के रिश्तेदारों ने पुलिस को बताया कि इस लड़के की शादी उसकी बीमारी को छिपाकर की जा रही है। जबकि सच्चाई ठीक इसके उलट थी। मुझो अत्यधिक थकान के कारण चक्कर आए थे, तब मैंने पहली बार जुम्मन मियां को अपने पूरे आत्मविश्वास के साथ उस शहनाई की कसम खाते हुए सुना व देखा जो उन्होंने आज से पहले कभी भी किसी भी शादी में नहीं किया था। उन्होंने भरे कंठ से कहा-साहब मैंने कई पीढिय़ों से इस खानदान की शादियों में ना केवल शहनाई बजाई है बल्कि इस परिवार के एक- एक सदस्य को मैं अपने घर की तरह जानता हूं। इस लड़के में कोई बीमारी नहीं है। विश्वास ना हो तो आप मुझो अपने यहां महीनों बंधक बनाकर इस लड़के की डॉक्टर से जांच करा लें।
तब थाने के दरोगा ने कहा कि जुम्मन की शहनाई एक विश्वास है, क्योंकि जुम्मन शहनाई की झाूठी कसम कभी नहीं खा सकता। फिर हमारी शादी हुई।
आज केवल जुम्मन की मौत ही नहीं हुई हम पति-पत्नी के एक शहनाई बजाने वाले वालिद का इंतकाल हुआ था।

ऊपर वाले की चिंता!
शशि वर्मा

परीक्षा केंद्र के पास एक मंदिर परिसर में बैठे हम दोनों भाई पढ़ रहे थे। श्रद्धालु मंदिर में आ जा रहे थे और श्रद्धा सुमन अर्पित कर रहे थे तथा आरती-प्रार्थना कर रहे थे। पास में ही स्थित चींटी नाल से चींटियां भी मंदिर की ओर दाने की तलाश में जा रही थीं।

श्रद्धालु मंदिर में प्रवेश को लेकर इतने त्वरित वेग से जा रहे थे कि कई चींटियां उनके पैरों तले कुचली जा रही थीं और उनको इस बात से कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा था। इस दृश्य को देखकर भाई रवि मुझासे बोला- भैया लोगों को ऊपर वाले की तो इतनी चिंता है कि वे फूल धूपबत्ती अगरबत्ती प्रसाद आदि लेकर आ जा रहे हंै लेकिन इनको नीचे वालों की कोई चिंता नहीं है। बात सच्ची थी जो दिल को भा गई और जिंदगी की सार्थकता समझाा गई कि हमें सभी प्राणियों का खयाल रखना चाहिए तभी जीवन सही मायनों में सार्थक व सफल है।

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