मंदबुद्धि कहलाया जाने वाले बालक आगे चलकर बना महान वैज्ञानिक

कुत्ते के काटने पर होने वाले संक्रमण की रोकथाम के लिए रेबीज रोग का टीका बनाने वाले महान वैज्ञानिक लुई पाश्चर की इस महान खोज की वजह से लाखों लोगों की जिदंगी बच जाती है। इनकी खोजे मानव जीवन की सबसे अहम खोजों में से थी।

By: Archana Kumawat

Published: 05 May 2020, 04:00 PM IST

इनका जन्म 1822 में फ्रांस के डोल नामक स्थान पर हुआ था। पिता चमड़े के साधारण व्यवसायी थे। घर के हालात अच्छे नहीं थे, इसलिए बेटे को लेकर पिता के यही सपने थे उसका जीवन गरीबी में न निकले। पिता की इच्छा थी कि बेटा पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बने। इसीलिए उन्होंने इनका दाखिला अरबोय की एक स्कूल में करवाया। पिता इनकी शिक्षा के अतिरिक्त कर्जा उठाने के लिए भी तैयार थे लेकिन इनका मन पढ़ाई में कहां लगता था। इन्हें तो चित्रकारी और मछली पकडऩे में आनंद आता था। बाकी में समय में पिता की मदद करवाने की कोशिश किया करते थे। इस तरह पढ़ाई से यह धीरे-धीरे पिछड़ते जा रहे थे और इसका नतीजा यह हुआ को उनका एकेडमिक रिकॉर्ड खराब होने लगा। अब तो स्कूल के साथी मंदबुद्धि कहकर उनका मजाक बनाने लगे। अध्यापक की उनकी उपेक्षा करने लगे। इन सबसे ये इतने दुखी हुए कि बीच में ही स्कूल छोड़ दिया। इस दौरान पिता ने ही इनके हौंसले बढ़ाए और इन्हें आगे की शिक्षा के लिए पेरिस भेजा। हालांकि पेरिस भेजना पिता के लिए इतना आसान नहीं था। उन्हें बहुत कर्ज लेना पड़ा। पेरिस में वैसाको के एक कॉलेज में एडमिशन लिया और आगे की पढ़ाई शुरू की। इनकी रुचि रसायन शास्त्र में थी और वे रसायन शास्त्र के विद्वान डॉ. ड्यूमा से विशेष प्रभावित हुए।
कॉलेज प्रोफेसर बनकर दिखाया
रसायन विज्ञान में रुचि होने के बावजूद भी इन्होंने रसायन की जगह भौतिकी में अध्ययन किया। बचपन में मंदबुद्धि कहलाया जाने वाला यह व्यक्ति अपनी मेहनत और लगन से कुछ ही समय में विज्ञान विभाग के अध्यक्ष बनें। इसके एक साल बाद स्ट्रॉसबर्ग विश्वविद्यालय में बतौर प्राध्यापक पढ़ाने लगे। भौतिक विज्ञान और रसायन विज्ञान को समझने के बाद इन्होंने जीव विज्ञान की ओर ध्यान देना शुरू किया। साथ ही ये अलग-अलग अनुसंधान करने में भी रुचि लेने लगे।
अनुसंधान के दौरान जीवाणु से हुई मुलाकात
फ्रांस के जिस विश्वविद्यालय में ये पढ़ाते थे, उसके पास अंगूर के बगीचे थे और वहां मदिरा बनाने के काम किया जाता है। एक बार मदिरा तैयार करने वाले कुछ कारीगर अपनी समस्या को लेकर इनसे मिलने आए। उन लोगों को कहना था कि कुछ समय बाद मदिरा का स्वादा खट्टा हो जाता है। ऐसे में उन्हें बहुत नुकसान होता है। वे चाहते थे वैज्ञानिक इसका अध्ययन करें। यही विचार कर उन्होंने मदिरा की एक बोतल इन्हें दी। कई दिनों तक वे मदिरा पर अध्ययन करते रहे। वे सूक्ष्मदर्शी की सहायता से घंटों मदिरा की बूंदों को देखते रहते। एक दिन काफी देर अध्ययन के बाद उन्हें बूंदों में अति सूक्ष्म कीड़े दिखाई दिए, जो नग्न आंखों से नहीं देखे जा सकते थे। इन कीड़ों को इन्होंने जीवाणु नाम दिया। अपने प्रयोग में आगे उन्होंने देखा कि मदिरा को एक निश्चित तापमान पर गर्म करने के बाद फिर से ठंडा किया गया तो जीवाणु मर गए थे। इस तरह कारीगरों को फिर से वाइन के खट्टा होने की शिकायत नहीं मिली।
नई-नई खोज में मिलती गई कामयाबी
जीवाणु की रोकथाम के लिए इन्होंने जो तरीका अपनाया था उसी सिद्धांत पर आगे चलकर पाश्चुरीकृत दूध भी चलन में आया। जीवाणु की खोज के बाद इन्होंने जीवाणु पर रिसर्च करना शुरू किया। उसी बीच फ्रांस में मुर्गीपालन केंद्रों में हैजे की बीमारी का प्रकोप बढ़ गया था। इनका मानना था कि जीवाणु रक्त में भी हो सकते हैं। इन्होंने मरे हुए चूजों के रक्त में से जीवाणुओं को निकालकर एक इंजेक्शन तैयार किया और इस इंजेक्शन के इस्तेमाल से मुर्गीयों में फिर से ये रोग नहीं हुआ। इसके बाद इन्होंने गाय और भेड़ों के एन्थ्रैक्स नामक रोग के लिए वैक्सीन तैयार की। इसमें भी संक्रमण को रोकने में यह कामयाब रहे। इसके बाद इनका अगला अध्ययन जानवरों से मनुष्यों में संक्रमण को रोकना था। इस तरह उन्होंने एक नई खोज की। यह कोई और नहीं, बल्कि कुत्ते के काटने पर होने वाले संक्रमण की रोकथाम के लिए रेबीज रोग का टीका बनाने वाले महान वैज्ञानिक लुई पाश्चर थे। इनकी इस महान खोज की वजह से लाखों लोगों की जिदंगी बच जाती है। इनकी खोजे मानव जीवन की सबसे अहम खोजों में से थी। 1868 में उन्हें एक स्ट्रोक का सामना करना पड़ा और 1895 में दुनिया ने इस महान वैज्ञानिक को खो दिया।

Archana Kumawat
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