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Rajasthan Mining Sector: दोहन ही नहीं पोषण की भी जरूरत

राजस्थान में खनन क्षेत्र ( Mining sector ) को 33 प्रतिशत ग्रीन कवर सुनिश्चित करना चाहिए। राज्य में बड़ी संख्या में छोटी और बड़ी माइंस हैं, यदि वे 33 प्रतिशत ग्रीन कवर सुनिश्चित करते हैं, तो इससे दीर्घकालिक पर्यावरणीय स्थिरता ( environmental ) भी सुनिश्चित होगी।

जयपुर

Published: June 07, 2022 05:09:50 pm

राजस्थान में खनन क्षेत्र को 33 प्रतिशत ग्रीन कवर सुनिश्चित करना चाहिए। राज्य में बड़ी संख्या में छोटी और बड़ी माइंस हैं, यदि वे 33 प्रतिशत ग्रीन कवर सुनिश्चित करते हैं, तो इससे दीर्घकालिक पर्यावरणीय स्थिरता भी सुनिश्चित होगी। यह बात राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राजस्थान सरकार के चेयरमैन सुधांश पंत ने कहीं। वह जयपुर में कंफेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (सीआईआई) द्वारा आयोजित 'द 7आर्स कॉन्फ्रेंस: रोडमैप फॉर ए ग्रीनर टुमॉरो' के 5वें संस्करण में मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे। पंत ने कहा कि जहां अधिकांश औद्योगिक परियोजनाएं निर्धारित ग्रीन कवर का ध्यान रख रही हैं, वहीं माइनिंग क्षेत्र को भी उनसे सीख लेनी चाहिए और राज्य में हरित पर्यावरण को बढ़ावा देने के लिए अपना योगदान देना चाहिए। पंत ने कहा कि सीआईआई ने अधिक सस्टेनेबल और हरित पर्यावरण के प्रति जागरूकता पैदा करने की दिशा में एक सराहनीय पहल की है। उन्होंने यह भी कहा कि सभी के छोटे-छोटे कदम पर्यावरण को और अधिक धारणीय बनाने में काफी मददगार साबित होंगे। यह कम पानी और बिजली का उपयोग करने और यहां तक कि एसी के उपयोग को कम करने के माध्यम से हो सकता है। बागवानी के लिए रीसाइकिल्ड पानी का उपयोग किया जा सकता है। जैसी जीवन शैली हम अपनाएंगें, उसी से हमारा कल हराभरा होगा। राजस्थान सरकार ई-वेस्ट पॉलिसी लेकर आ रही है। जिसका ड्राफ्ट तैयार है और इसे हितधारकों के साथ उनकी टिप्पणियों और सुझावों के लिए साझा किया गया है।
Rajasthan Mining Sector: दोहन ही नहीं पोषण की भी जरूरत
Rajasthan Mining Sector: दोहन ही नहीं पोषण की भी जरूरत
सौर ऊर्जा की अपार संभावनाएं
चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर, हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड, अरुण मिश्रा ने कहा कि राजस्थान में सौर ऊर्जा की अपार संभावनाएं हैं। ऊर्जा के इस स्रोत की क्षमता का बेहतर और प्रभावी ढंग से उपयोग किया जाना चाहिए। अधिकांश निवेशक व्यवसाय, वित्तीय और उद्योग के उत्पादन पहलुओं पर गौर करते हैं। हालांकि, अब पर्यावरण और सस्टेनेबिलिटी फैक्टर का भी मूल्यांकन किया जाता है। उन्होंने इस पर भी जोर दिया कि कोविड सभी पर्यावरण जागरूक परियोजनाओं के लिए एक वेक-अप कॉल था और उन्होंने इसी अनुसार कदम उठाए।
हाई ड्यूअल एनर्जी एफिशिएंट ग्लास का उपयोग
सेंट-गोबेन इंडिया के ग्लास सॉल्यूशंस एंड स्ट्रेटेजिक प्रोजेक्ट्स के प्रबंध निदेशक आइजनहावर स्वामीनाथन ने कहा कि आज के समय में बिल्डिंग्स पर्यावरण की समस्या का एक हिस्सा हैं। कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन बहुत अधिक है। इसे देखते हुए ऊर्जा की बचत के लिए बेहतर डेलाइटिंग एक प्रमुख समाधान है। परियोजनाओं में हाई ड्यूअल एनर्जी एफिशिएंट ग्लास का उपयोग करना चाहिए, जो कि ऊर्जा बचाने के लिए उनकी परियोजना में आग प्रतिरोधी भी हो सकता है।
उत्सर्जन में कटौती के लिए प्रतिबद्ध
डिप्टी हेड ऑफ प्लांट ऑपरेशंस, हीरो मोटोकॉर्प लिमिटेड, मुकेश गोयल ने कहा कि पृथ्वी केवल एक ही है। यह बात किसी को भूलनी नहीं चाहिए। पेरिस जलवायु समझौते में, दुनिया भर के 700 शहरों के साथ-साथ संयुक्त राज्य अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों को भी ने उत्सर्जन में कटौती के लिए प्रतिबद्ध हैं। कई कंपनियों ने पहले ही अपने नेट जीरो लक्ष्यों की घोषणा कर दी है। आज के समय में सस्टेनेबल विकास सुनिश्चित करने में डिजिटाइजेशन महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
तीन ट्रेंड्स बहुत ध्यान देने की जरूरत
गोदरेज ग्रीन बिजनेस सेंटर के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर, के.एस. वेंकटगिरी ने कहा कि तीन ट्रेंड्स बहुत ध्यान देने योग्य हैं। सबसे पहले, सरकार ग्रीनर इंडिया की तरफ पहल कर रही है, जिसमें वे फेसिलिटेटर की भूमिका निभा रहे हैं। दूसरा उद्योगों और निगमों ने सस्टेनेबिलिटी गोल्स के लिए पहल की है। जहां बड़े उद्योग पहले ही ऐसे उपायों की घोषणा कर चुके हैं, वहीं छोटे उद्योग भी अब उचित कदम उठा रहे हैं। तीसरा, जो नई तकनीक उभर रही है, वह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हरित पर्यावरण को बढ़ावा देने में मदद करेगी। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सकारात्मक मानसिकता अपनानी होगी।

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