अब बेटी के जन्म पर नहीं बजता सूपड़ा

 बेटे के जन्म पर थाली एवं बेटी के जन्म पर सूपड़ा (छाजला)  बजाने की परम्परा संस्थागत प्रसव के बाद से स्वत: बंद हो गई। अब प्रसव पीड़ा शुरू होते ही जननी एक्सप्रेस के कॉल सेंटर 104 पर सूचित किया जाता है। पहले प्रसव का कार्य घर पर ही दाई की देख-रेख में होता था। बेटे के जन्म पर थाली एवं बेटी के जन्म पर सूपड़ा बजा कर घर के सदस्यों सहित आस-पड़ोस को सूचित किया जाता था। लेकिन, वर्तमान में प्रसव चिकित्सालय में होने से थाली या सूपड़ा बजा कर बेटा या बेटी के जन्म की सूचना नहीं दी जाती बल्कि चिकित्सक द्वारा बेटा या बेटी होने की शाब्दिक सूचना एवं शुभकामना दी जाती है। लोगों का मानना है कि संस्थागत प्रसव प्रसूता व बच्चे के स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत अच्छा है लेकिन इस कारण अब पुरानी परम्पराएं नहीं निभाई जातीं।

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Published: 19 Dec 2015, 12:34 PM IST

बेटे के जन्म पर थाली एवं बेटी के जन्म पर सूपड़ा (छाजला)  बजाने की परम्परा संस्थागत प्रसव के बाद से स्वत: बंद हो गई। अब प्रसव पीड़ा शुरू होते ही जननी एक्सप्रेस के कॉल सेंटर 104 पर सूचित किया जाता है। पहले प्रसव का कार्य घर पर ही दाई की देख-रेख में होता था। बेटे के जन्म पर थाली एवं बेटी के जन्म पर सूपड़ा बजा कर घर के सदस्यों सहित आस-पड़ोस को सूचित किया जाता था। लेकिन, वर्तमान में प्रसव चिकित्सालय में होने से थाली या सूपड़ा बजा कर बेटा या बेटी के जन्म की सूचना नहीं दी जाती बल्कि चिकित्सक द्वारा बेटा या बेटी होने की शाब्दिक सूचना एवं शुभकामना दी जाती है। लोगों का मानना है कि संस्थागत प्रसव प्रसूता व बच्चे के स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत अच्छा है लेकिन इस कारण अब पुरानी परम्पराएं नहीं निभाई जातीं।
यह है मान्यताएं
आमेट निवासी सीतादेवी टेलर ने बताया कि बेटी के जन्म पर सूपड़ा इस लिए बजाया जाता है कि सूपड़े में आने वाली राई के दानों के बराबर बेटी को परिवार की ओर से आवश्यक सामग्री दे कर विदा किया जाता जिससे उसे सुसराल में कोई परेशानी नहीं हो, वहीं महिलाएं अपने परिवार की खुशहाली के लिए सूपड़े में आने वाली राई के दानों के बराबर प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष उपवास, व्रत , त्यौहार, पूजा आदि करती है। बेटे के जन्म पर थाली बजाने से वह निडर, बलवान, साहसी, हर समय सजग, परोपकारी बने।
अब कहीं-कहीं सूरज पूजन पर निभाई जाती है परम्परा
चिकित्सालय में जन्म होने से अब परम्परा का निर्वहन नहीं हो पाता तो बच्चे के सूरज पूजन पर इस परम्परा का निर्वहन किया जाता है। सूरज पूजन के समय बेटे होने पर थाली एवं बेटी होने पर सूपड़ा बजाने का रिवाज है। 

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