सरकारी मकान में चल रही डॉक्टरों की "दुकान"

सरकारी मकान में चल रही डॉक्टरों की
Government medical colleges

Shankar Sharma | Updated: 05 Jun 2015, 11:57:00 PM (IST) Jaipur, Rajasthan, India

 राज्य सरकार के आदेश के बावजूद प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में डॉक्टरों के सरकारी आवासों में केवल मरीजों को देखने का धंधा थमा नहीं है

जयपुर। राज्य सरकार के आदेश के बावजूद प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में डॉक्टरों के सरकारी आवासों में केवल मरीजों को देखने का धंधा थमा नहीं है। शिकायतों के बाद चिकित्सा मंत्री राजेन्द्र राठौड़ ने करीब एक माह पहले मेडिकल कॉलेज प्राचार्यो को सभी सरकारी आवासों का भौतिक सत्यापन करवाकर पांच दिन में कार्रवाई के निर्देश दिए थे। प्रभावशाली डॉक्टरों को बचाने के लिए मौके पर जाकर भौतिक सत्यापन करने की बजाय एक बार फिर शपथ पत्र लिया जा रहा है कि वे सरकारी मकानों में रह रहे हैं। फिलहाल भौतिक सत्यापन के नाम पर वीडियोग्राफी कराई जा रही है।

सूत्रों ने बताया कि हकीकत में भौतिक सत्यापन किया जाता तो एसएमएस कॉलेज के ही करीब दो दर्जन से अधिक डॉक्टरों के आवास आवंटन रद्द हो जाते। ये डॉक्टर कई साल से बड़े-बड़े सरकारी आवासों में दिन में मरीजों को देख रहे हैं। मरीजों को देखने का काम पूरा होने के बाद रात में इन आवासों पर ताले लग जाते हैं और डॉक्टर अपने निजी आवास पर चले जाते हैं।

झांककर नहीं देखा
एसएमएस मेडिकल कॉलेज की आवास आवंटन समिति डॉक्टरों को आवास आवंटन करती है। ऎसे में समिति और कॉलेज प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह देखे कि इन आवासों में डॉक्टर रह रहे हैं या नहीं, लेकिन कॉलेज प्रशासन ने एक बार भी इनका औचक निरीक्षण नहीं किया। हाल ही में बनाई गई आवंटन समिति ने भी चिकित्सा मंत्री के आदेश के बाद एक महीना केवल शपथ पत्र लेने में ही लगा दिया, जबकि सभी डॉक्टरों ने आवास आवंटन के समय ही शपथ पत्र दिए थे, इसके आधार पर कमेटी एक बार इन आवासों में जाकर देखती तो अधिकांश में रात के समय ताले लटके मिलते।

एसएमएस अस्पताल व एसएमएस कॉलेज से सम्बद्ध अस्पतालों में 34 सरकारी आवास हैं। महिला और जनाना अस्पताल में तो ये परिसर के अंदर ही हैं। एसएमएस के आस-पास हीराबाग, जेकेलोन के पास गंगवाल पार्क में भी डॉक्टरों के सरकारी आवास हैं। इनमें कुछ तो एक-एक हजार वर्गगज में बने हैं। इन आवासों में डॉक्टर रोजाना करीब 100 से 300 मरीज तक देखते हैं। एक-एक मरीज से औसतन 100 से 250 रूपए तक फीस वसूल की जाती है। इस हिसाब से इन आवासों में रहने का दावा करने वाले डॉक्टर रोजाना हजारों रूपए कमा रहे हैं।

रहने लायक नहीं
राजधानी में कई सरकारी मकानों की हालत तो ऎसी है कि उनमें डॉक्टर तो कोई रह नहीं सकता। यही कारण है कि डॉक्टर इन आवासों का उपयोग मरीजों को देखने में करते हैं और अपने शानदार बंगले में रहते हैं। इन खस्ताहाल मकानों की कई साल तक न तो मरम्मत होती है और न रंग-रोगन, फिर भी ये डॉक्टर कभी कोई शिकायत नहीं करते।

जनता को नहीं फायदा
अस्पताल के पास ही 24 घंटे डॉक्टर की उपलब्धता को देखते हुए सरकारी आवास आवंटित किए जाते हैं। जिससे किसी भी आपात स्थिति या मास केजुअल की स्थिति में डॉक्टर को तत्काल बुलाया जा सके। लेकिन इनमें डॉक्टरों के नहीं रहने से सरकार को जनता को तत्काल चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने का मकसद ही पूरा नहीं हो रहा है।

दिखावे की रिकॉर्डिग
करीब एक महीने भौतिक सत्यापन के नाम पर चुप्पी साधने वाले प्रशासन ने अब सरकारी आवासों की वीडियोग्राफी शुरू करवाई है।
मंगलवार को भी एसएमएस के आस-पास और गंगवाल पार्क क्षेत्र में वीडियोग्राफी हुई।
हालांकि दिन के समय वीडियोग्राफी से सत्यापन के औचित्य पर सवाल खड़ा हो गया।
जानकारों का कहना है कि अधिकांश डॉक्टर दिन के समय मरीज देखने के लिए आवासों में मौजूद रहते हैं।
ऎसे में घर आबाद नजर आता है। जबकि रात के समय इनमें ताले लगे होते हैं।

शपथ पत्र ले लिए हैं
डॉक्टरों के इनमें निवास करने के शपथ पत्र लिए हैं। इसके बाद भी इनमें निवास नहीं पाया जाता है तो कार्रवाई की जाएगी।
डॉ. यू.एस. अग्रवाल, प्राचार्य, एसएमएस कॉलेज
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