scriptpandit jhabarmal sharma award List 2022 | पं. झाबरमल्ल शर्मा स्मृति व्याख्यानमाला: उच्चतर शिक्षण संस्थानों को 'लोकल इंगेजमेंट-ग्लोबल नेटवर्क' का मंत्र | Patrika News

पं. झाबरमल्ल शर्मा स्मृति व्याख्यानमाला: उच्चतर शिक्षण संस्थानों को 'लोकल इंगेजमेंट-ग्लोबल नेटवर्क' का मंत्र

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) दिल्ली के निदेशक प्रो. वी. रामगोपाल राव ने भारतीय उच्चतर शिक्षण संस्थानों को विश्व रैंकिंग में पीछे बताने को मीडिया की उपज बताया।

जयपुर

Updated: January 11, 2022 05:18:02 pm

पत्रिका न्यूज नेटवर्क
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) दिल्ली के निदेशक प्रो. वी. रामगोपाल राव ने भारतीय उच्चतर शिक्षण संस्थानों को विश्व रैंकिंग में पीछे बताने को मीडिया की उपज बताया, वहीं बेबाकी से यह भी कहा कि दुनिया के जिन देशों के संस्थानों को आगे बताया जाता है वहां विश्वविद्यालयों को मंत्री नहीं चलाते। उन्होंने उच्चतर शिक्षण संस्थानों को शोध में आगे बढ़ने के लिए स्थानीय भागीदारी व वैश्विक पहुंच (लोकल इंगेजमेंट एवं ग्लोबल नेटवर्क) का नारा भी दिया।

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प्रो. राव ने पत्रिका समूह की ओर से आयोजित पं. झाबरमल्ल शर्मा स्मृति व्याख्यानमाला की 31वीं कड़ी में मंगलवार को वर्चुअल संबोधन दिया। उन्होंने व्याख्यान को आत्मनिर्भर भारत और उच्चतर शिक्षा संस्थानों की जरूरतों पर केन्द्रित किया। इस मौके पर पत्रिका समूह केे परिशिष्टों में वर्ष 2021 में प्रकाशित श्रेष्ठ कविता व कहानी के विजेताओं को सृजनात्मक साहित्य पुरस्कारों से सम्मानित भी किया गया। उन्होंने पॉवर पाइंट प्रजेंटेशन के माध्यम से समझाया कि भारत के उच्चतर शिक्षा संस्थान शोध में किस तरह से आगे हैं? वे काम तो कर रहे हैं, लेकिन मीडिया के माध्यम से जनता तक अपना काम नहीं पहुंचा पा रहे। इससे परसेप्शन मैनेजमेंट नहीं हो पा रहा है।

पश्चिम के पिछलग्गू न बनें, नवाचार करें
प्रो. राव ने जहां अमरीका का उदाहरण देकर भारतीय संस्थानों को पश्चिम देशों के शोधों का पीछा नहीं करने और समाज की समस्याओं पर आधारित शोध करके नाम कमाने की सलाह दी, वहीं अलग—अलग संस्थानों को साझा तरीके से काम को विविध आयाम देने और उन्हें स्वायत्तता व जिम्मेदारी देने की वकालत भी की।

हम शोध में आगे
प्रो. राव ने बताया कि भारत में अमरीका की आबादी के बराबर तो लोग उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। शोध के मामले में भारत दुनिया में तीसरे स्थान पर है। चीन पहले और अमरीका दूसरे स्थान पर हैं, जर्मनी व जापान भी शोध में हमसे पीछे हैं। देश में ज्ञान की सृजनशीलता 11 प्रतिशत है, जबकि इसके लिए खर्चा जीडीपी का 0.6—0.7 प्रतिशत ही हो रहा है।

इसके बावजूद शोध पर प्रति डॉलर खर्च में देश आगे है, लेकिन समस्या यह है कि ज्ञान को आय में नहीं बदल पा रहे हैं। शोध अधिक होने और फेकल्टी अच्छी होने के बावजूद हम शिक्षण संस्थानों की वैश्विक रैंकिंग में पिछड़ रहे हैं, क्योंकि इन संस्थानों में क्या हो रहा है यह सर्वे में जवाब देने वालों को पता ही नहीं होता। यहां मीडिया की भूमिका की जरुरत है। उन्होंने महिलाओं की स्थिति को लेकर कहा कि आइआइटी दिल्ली में हर तीसरा विद्यार्थी महिला है

पुस्तकालय से शोध लोगों के काम के नहीं
उनका कहना था कि शोध पुस्तकालय पर आधारित किए गए तो वे पुस्तकालय में ही जमा होकर रह जाएंगे। इस स्थिति से बाहर निकलने के लिए भारतीय उच्चतर शिक्षण संस्थानों को शोध के विषय पश्चिमी देशों से आयात करने की प्रवृत्ति रोकनी होगी। इसके अलावा ये संस्थान समाज की स्थानीय समस्याओं को हल करने पर भी ध्यान केंद्रित करें। वर्ष 1862 में अमरीका ने भी इंग्लैंड और जर्मनी का अनुसरण बंद करके मांग के अनुसार शोध किए, ऐसा ही हमें करना होगा। इसके लिए यह भी जरुरत है कि विद्या की देवी सरस्वती व धन की देवी लक्ष्मी को साथ रखते हुए न केवल सोच विकसित की जाए, बल्कि काम भी किया जाए।

बिखराव नहीं, बहुआयामी हो संस्थान
प्रो. राव ने कहा कि उच्चतर शिक्षण संस्थानों को बिखराव के बजाय बहुआयामी विश्वविद्यालय सिस्टम पर शिफ्ट होने की जरूरत है। समस्या मंत्रालयों के स्तर पर भी काफी है। बिखराव मंत्रालयों के स्तर पर भी है, वे उच्च शिक्षण संस्थानों के साथ मिलकर काम नहीं कर रहे। उन्होंने उदाहरण देकर बताया कि जैसे सड़क व कृषि वाले मंत्रालय का शिक्षा मंत्रालय से न तो संपर्क और न ही वे एक—दूसरे की जरुरतों के बारे में जानते हैं।

50 रुपए में कोरोना जांच बड़ी देन
प्रो. राव ने आइआइटी दिल्ली में उनके कार्यकाल में हुए नवाचारों का हवाला देकर कहा कि दो अलग—अलग विभागों को साथ मिलकर काम करने को कहा और उनको सीड मनी के रूप में आर्थिक सहयोग भी ज्यादा नहीं दिया, उनसे अपने शोध को आय का जरिया बनाने को कहा गया। बम रखे होने का पता करने के लिए पहले 'स्निफर डॉग' की आवश्यकता होती थी, लेकिन आइआइटी दिल्ली ने 'इलेक्ट्रिक नोज' विकसित की।

इसके शोध में 10 साल लगे, पर इसे रेल और बस कहीं भी साथ ले जाया जा सकता है। पहले 'स्निफर डॉग' को बाजार या बस में साथ ले जाने में दिक्कत होती थी। 350 रुपए में आरटीपीसीआर जांच व 50 रुपए में रेपिड एंटीजन टेस्ट की सुविधा उपलब्ध कराना भी उनके संस्थान की ही देन है। सस्ती कीमत में हृदयाघात के बारे में पहले ही पता चल पाए, यह भी उनके यहां हुआ।

सैन्य क्षेत्र में उपलब्धि जल्द
उन्होंने कहा कि उनका संस्थान डीआरडीओ के साथ मिलकर काम कर रहा है, जल्द ही सैन्य क्षेत्र में आइआइटी दिल्ली का बड़ा नाम होगा। इसी तरह इसरो के साथ कम करने के लिए भी उनके यहां अलग सेल बनाया गया है।

कृषि क्षेत्र में भी आइआइटी
प्रो. राव ने बताया कि आइआइटी दिल्ली कृषि जनगणना पर भी काम कर रहा है। मृदा स्वास्थ्य के शोध को लोगों तक पहुंचाने के लिए कंपनी बनाई है। इस शोध से पानी व सूक्ष्म पोषक तत्वों को बचाया जा सकता है।

भारत का आइटी व बायोटेक में नाम
प्रो. राव ने कहा कि सूचना प्रौद्यो गिकी व जैव प्रौद्योगिकी में भारत का दुनिया में नाम है। नेनो टेक्नोलॉजी व आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआइ) के लिए भी काम हो रहा है, एआइ के लिए आइआइटी दिल्ली ने अलग स्कूल विकसित किया है।

इस पर भी बोले प्रो. राव
— नेनो यूरिया से किसान की लागत कम होने के साथ ही उत्पादन बढ़ेगा और पर्यावरण बचेगा।
— क्वांटम तकनीक का कम्प्युटर से क्रिप्टोग्राफी में उपयाोग होगा
— आइआइटी व राज्यों के इंजीनियरिंग कॉलेजों से जोड़ने के लिए राष्ट्रीय नीति हो तो सैंकडों साझा प्रोजेक्ट बनेंगे
— ग्रामीण क्षेत्र के अच्छा स्टार्ट अप्स का आइआइटी दिल्ली में स्वागत है, प्रस्ताव भेजें।

पाठक-दर्शकों का भरोसा ही हमारी पहचान: भुवनेश जैन

पत्रिका समूह के ग्रुप डिप्टी एडिटर भुवनेश जैन ने स्वागत भाषण में कहा कि पाठकों व दर्शकों का भरोसा ही पत्रिका समूह को शिखर पर बनाए हुए है। पत्रिका ने भी सदैव विश्वसनीयता, निष्पक्षता व निर्भीकता के सिद्धान्तों को अपनाया। इसी कारण राजस्थान व मध्यप्रदेश में सरकारों को काले कानून वापस लेने पड़े और मध्यप्रदेश में जमीनों को लेकर सहकारिता कानून बदलना पड़ा।

पत्रिका के सिद्धान्तों के कारण ही उसके उठाए मुद्दों पर हाईकोर्ट ने कई बार प्रसंज्ञान लिया और चेंजमेकर अभियान के माध्यम से विधायक के रूप में राजस्थान व मध्यप्रदेश में अच्छी छवि के लोगों को जीत दिलवाई। सामाजिक सरोकार के तहत पत्रिका के अभियान मिसाल हैं। इतना ही नहीं पत्रिका के वेब माध्यम से चार करोड और फेसबुक से दो करोड़ से ज्यादा लोग जुडे हुए हैं।

इनका किया गया सम्मान
प्रो. राव ने पत्रिका समूह के सृजनात्मक साहित्य पुरस्कारों के तहत कहानी चर्ग में जयपुर के महेश कुमार और कविता के लिए तिरुवनंतपुरम (केरल) की अनामिका अनु को प्रथम पुरस्कार के रूप में डिजिटल माध्यम से 21—21 हजार रुपए दिए गए। इसी तरह कहानी में जयपुर की शकीला बानो और कविता में झाबुआ (मप्र) की मालिनी गौतम को द्वितीय पुरस्कार के रूप में 11—11 हजार रुपए प्रदान किए गए।

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