जयपुर मनोचिकित्सा केंद्र में इलाज के लिए छोड़ा, लेकिन परिजन अब उन्हें वापस ले जाना भूले

जयपुर मनोचिकित्सा केंद्र में ऐसे कई मानसिक रोगी हैं जो ठीक होने के बाद भी अपने घर नहीं जा पा रहे हैं। वर्षों हो गए इन मरीजों को अपनों का इंतजार करते हुए, लेकिन इन्हे लेने कोई नहीं आ रहा है

 

By: Deepshikha Vashista

Published: 03 Jan 2020, 03:46 PM IST

जयपुर. मनोचिकित्सा केंद्र में ऐसे कई मानसिक रोगी हैं जो ठीक होने के बाद भी अपने घर नहीं जा पा रहे हैं। वर्षों हो गए इन मरीजों को अपनों का इंतजार करते हुए, लेकिन इन्हे लेने कोई नहीं आ रहा है। अब इन मरीजों की आस भी धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। जानकारी के अनुसार मनोचिकित्सा केंद्र में करीब 82 मरीज ऐसे हैं जो अपनी बीमारी से ठीक हो चुके हैं। कोई चालीस साल से यहां है तो कोई तीस साल से। इन लोगों की आंखें तरस गई हैं अपने परिवार वालों की राह ताकते हुए। मनोचिकित्सकों का कहना है कि इन मरीजों के परिजन ठीक होने के बाद स्वीकार नहीं कर रहे। परिजनों को लगता है घर ले जाने के बाद इनकी बेगार करनी पड़ेगी। कई परिजन तो ऐसे हंै, जिन्होंने घर का पता ही गलत बता रखा है। इसलिए उनसे सम्पर्क भी नहीं हो पा रहा है।

केस: 1

नाम- शीला

कब से- 1978

निवासी- झालावाड़

बीमारी- साइकोसिस

केस: 2

नाम- शेखर

कब से- 1989

निवासी- बीकानेर

बीमारी- सिजोफ्रेनिया

केस: 3

नाम- जफरूद्दीन

कब से- 2003

निवासी- बिहार

बीमारी- मेजर मेंटल डिसऑर्डर

रिमाइंडर भेजते हैं लेकिन...

मनेचिकित्सकों का कहना है कि मरीज के परिजनों को पोस्टकार्ड से घर ले जाने के लिए रिमाइंडर भेजते हैं। जिन परिजनों के फोन नंबर उपलब्ध हैं, उन्हें फोन भी किया जाता है, लेकिन कोई लेने ही नहीं आता। कुछ मामलों में साइकेट्रिक सोशल वर्कर जब मरीज को उनके घर लेकर जाता है तो पहले परिजन उसे रख तो लेते हैं। बाद में घरवाले दवाइयां बंद कर देते हैं जिससे उसकी हालत फिर से खराब होने लगती है। ऐसे में परिजन फिर से मनोचिकित्सा केंद्र में छोड़कर चले जाते हैं।

सभी परिवारजनों से आग्रह है कि मरीज के ठीक होने के बाद उन्हें घर के वातावरण में रखकर सहानुभूतिपूर्वक उनके साथ पेश आएं और समाज में उन्हें पुन: स्थापित करने में सहयोग करें। मानसिक रोगों का इलाज दवा और मनोवैज्ञानिक तरीके के अलावा परिवार व समाज की अहम भूमिका होती है। उसे नजरअंदाज करने पर मरीज में सुधार की संभावना कम हो जाती है।

- डॉ. आरके सोलंकी, विभागाध्यक्ष, मनोचिकित्सा विभाग, एसएमएस मेडिकल कॉलेज

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