सीएए के विरोधी नहीं हैं गद्दार और देशद्रोही-बॉम्बे हाईकोर्ट

देशभर में (Protest against CAA) नागरिकता संशोधन विधेयक के विरोध में धरने और प्रदर्शन हो रहे हैं और सरकारें इन्हें रोकने के लिए तरह तरह के (Leagl obstacles) कानूनी हथकंडे अपना रही हैं। विरोध करने वालों को (Traitors and Anti Nationals) गद्दार और देशद्रोही तक कहा जा रहा है।

जयपुर

देशभर में (Protest against CAA) नागरिकता संशोधन विधेयक के विरोध में धरने और प्रदर्शन हो रहे हैं और सरकारें इन्हें रोकने के लिए तरह तरह के (Leagl obstacles) कानूनी हथकंडे अपना रही हैं। विरोध करने वालों को (Traitors and Anti Nationals) गद्दार और देशद्रोही तक कहा जा रहा है। विशेषकर सरकार समर्थक सोश्यिल मीडिया के जरिए विरोधियों को देशद्रोही और गदर कहकर प्रचारित कर रहे हैं। यह तथ्य हाल ही में दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान सरकार के मंत्रियों और सत्तारुढ़ पार्टी ने जमकर इस तरह के प्रचार से यह साबित भी है। लेकिन हाल ही में बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद बैंच ने बीड़ जिले में सीएए के विरोध में होने वाले प्रदर्शन को रोकने के लिए धारा-144 के आदेश को रद्द करते हुए कहा है कि किसी कानून का विरोध करने वालों को गदर या देशद्रोही नहीं कहा जा सकता।

विरोधी नहीं हैं गदर या देशद्रोही...

कोर्ट ने कहा है कि हालांकि धारा-144 का आदेश कई किस्म के धरने-प्रदर्शनों को रोकने के लिए था लेकिन,प्रथमदृष्टया यह नागरिकता संशोधन विधेयक के विरोध को रोकने के लिए ही था और ईमानदार नीयत से जारी नहीं किया था। नागरिकता संशोधन विधेयक के विरोध करने वालों को गदर या देशद्राही नहीं कहा जा सकता और उनके शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के अधिकार पर विचार होना चाहिए।

आजादी भी विरोध से ही मिली....

जस्टिस टीवी नलवाडे और जस्टिस एमजी सेवलीकर ने याद दिलाया है कि देश को आजादी भी ब्रिटिशराज के खिलाफ विरोध से ही मिली थी। लोगों का अपनी ही सरकार का विरोध करना दुर्भाग्यपूर्ण है,लेकिन इस आधार पर विरोध को रोका या कुचला नहीं जा सकता। यदि आमजन को लगता है कि कोई कानून समानता के अधिकार के विपरीत है तो उन्हें संविधान के आर्टिकल-19 के तहत अपनी भावनाएं व्यक्त करने का अधिकार है।

राज कानून का है ना कि बहुसंख्यकों का...

कोर्ट ने कहा है कि हम एक लोकतांत्रिक देश हैं और हमारे संविधान ने हमें कानून का राज दिया है ना कि बहुसंख्यकों का। विरोध करने वाले किसी धर्म विशेष के हो सकते हैं जैसे कि यदि मुस्लिमों को लगता है कि यह उनके हितों के विपरीत है और उन्हें इसका विरोध करना चाहिए। यह उनकी धारणा और विश्वास का मामला है और कोर्ट किसी धारणा या विश्वास को तय नहीं कर सकता कि वह गलत है या सही, लेकिन यह कोर्ट की ड्यूटी है कि वो किसी कानून का विरोध करने वालों के विरोध के अधिकार की रक्षा करे और यदि कोर्ट को लगता है कि यह उनके संविधानिक अधिकार का हिस्सा है तो,यह देखना कोर्ट का काम नहीं है कि संविधानिक अधिकार के प्रयोग से कोई कानून-व्यवस्था की समस्या होगी या नहीं।

अंग्रेजों के कानून का आजाद देश में इस्तेमाल...

कोर्ट ने कहा है कि देश की नौकरशाही की कानूनी शक्तियों का प्रयोग करते समय संवेदनशील होने की ट्रेनिंग होनी चाहिए ताकि वह समझ सकें कि मानवाधिकार संविधान के तहत दिए गए मूलभूत अधिकारों का ही हिस्सा हैं। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि कई कानूनों को आजादी के बाद खत्म कर देना चाहिए था लेकिन यह आज भी मौजूद हैं और आजाद देश के नागरिकों के खिलाफ इनका इस्तेमाल हो रहा है।

विरोध को रोका या दबाया तो...

नौकरशाही को समझना होगा कि यदि नागरिकों को यह लगता है कि कोई कानून विशेष उनके अधिकारों पर हमला है तो उन्हें इसकी रक्षा करनी ही होगी और यदि उन्हें अपने विरोध के अधिकार का इस्तेमाल से रोकने के लिए ताकत का इस्तेमाल किया तो निश्चित तौर पर हिंसा,हंगामा,कानून का ध्वस्त होने की संभावना होगी और अंतत: यह देश की एकता के लिए भी खतरा उत्पन्न करेगी।

कायम रहे भाईचारा वरना...

कोर्ट ने नागरिगकता संशोधन विधेयक के विरोध में सभी धर्मों के लोगों के शामिल होने को देश के लिए अच्छा बताते हुए कहा है कि बहुसंख्यकों का अल्पसंख्यकों के साथ खडे होकर समर्थन करने से साफ है कि हमने संविधान की प्रस्तावना में उल्लेखित भाईचारे की भावना को काफी सीमा तक पूरा किया है। इस भावना के खिलाफ कुछ भी करना देश की एकता को खतरे में ड़ालना होगा। इससे पहले गुरुवार को भी कर्नाटक हाईकोर्ट ने भी बैंगलुरु में सीएए विरोध को रोकने के लिए लगाई गई धारा-१४४ को गैर-कानूनी घोषित कर दिया था।

CAA
Mukesh Sharma
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