फिर नया गीत गाना है

कोरोना के इस निराशाजनक माहौल में उम्मीद और आशाओं के दीप जला रही है यह रचना।

By: Chand Sheikh

Published: 07 Jul 2020, 07:21 PM IST

कविता
भवानी सिंह देपावत

इस बुरे समय को नमस्कार
जनजीवन कर दिया तार-तार !

ये कैसी आवाजें हैं
सन्नाटों के डर से भरी,
सारी दुनिया ही लगती है
अब डर के मारे मरी-मरी !

अब मानव, मानव से कतराता
जो मिलने पर था इतराता,
बरत रहा सबसे दूरी
यह क्या जीवन, क्या मजबूरी !

क्लांत-क्लांत एकांत हुआ
जग का कोलाहल अब शांत हुआ,
एक डर ने ऐसा भरमाया
प्रबुद्ध मनुज मन भ्रांत हुआ !

सूनी सड़कें, सूनी गलियां
सूने-सूने से चौराहे,
अपनी बांहों से मिलने में
डरती हैं अपनी बांहें !

दिन लगते बासी रोटी से
और रातें जैसे बुझे दीये,
बंद घरों में पड़े लोग यों
जीकर भी जैसे नहीं जीए !

लावारिस से भटक रहे
सड़कों पर श्रमिक और मजदूर,
लालायित घर पहुंचने को
चलते थककर हुए चूर !

पर होश-जोश नहीं खोना है
यह पलभर का बस रोना है,
फिर गीत नया इक गाना है
धरती को स्वर्ग बनाना है
इस कोरोना को हराना है !

Chand Sheikh
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