बारिश की सुबह

प्रकृति के मनोहारी दृश्य के साथ मानवीय संवेदनाओं और उम्मीद के महत्व को व्यक्त कर रही हैं ये कविताएं

By: Chand Sheikh

Published: 08 Aug 2020, 01:13 PM IST

कविताएं
हरीश करमचंदाणी

सुबह सुबह
हल्की हल्की तो कभी तेज होती बूंदाबादी
बदल जाती जो रिमझिाम में
सुबह जब अपनी चाय और बिस्कुट के साथ
बैठा ले रहा था चुस्कियों का सुख
निहारते पेड़ पौधों को उन पर पड़ती बूंदों को
बूंदों का पत्तों से टपक कर ओझल हो जाना
अद्भुत था ये सब प्रकृति का कारोबार
कि एक मरियल सा श्वान डरा डरा सा
आ खड़ा हुआ छोटे गेट के पास
बहुत भूखा लगा
सलाखों के पार बिस्कुट के दो टुकड़े करके रख दिए
पर वह एकदम भाग गया भय से
बहुत सताया गया होगा मुहल्ले के शैतान बच्चों से
आते जाते राहगीरों से भी बहुत भयग्रस्त
मैं भीतर चला आया
देखा जालीदार दरवाजे की ओट
वह लपक कर आया मुंह में भरकर भगा
थोड़ी देर में फिर आ कर ले गया दूसरा टुकड़ा भी
भीतर कटोरदान को टटोला
एक रोटी पड़ी थी बासी शायद उसी के लिए
में भी खुश हुआ बहुत
टुकड़े टुकड़े कर फिर धर दिए वहीं
वह फासले पर सहमा सा
देख रहा था टुकुर टुकुर
जानता था मैं जब तक खड़ा रहूंगा
न आएगा खाने को रोटी
भूख पर डर भारी था
मैं चला आया भीतर
सोचता हुआ कि कुछ तो है
आदमी में
जिससे कोई डर भी सकता है
इस तरह मनुष्य होने पर लज्जित हुआ
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उम्मीद
अथाह अंधकार
अकूत दुख
अनगिनत विडंबनाएं
असख्य त्रासदियां
...बस उम्मीद थी तो बस उम्मीद से ही
जो सिसक रही थी क्षत विक्षत बुझाी सहमी
मैंने तब भी उसे पुकारा
आखिर वह उम्मीद थी जो कभी मिटती नहीं

Chand Sheikh Desk
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