मजदूर हूं मजबूर नहीं

मजदूर के परिश्रम और उनकी मेहनत को प्रभावी तरीके से प्रस्तुत करती रचना।

By: Chand Sheikh

Published: 22 Jun 2020, 02:00 PM IST

देखा गया है कि मजदूर की मेहनत को कम करके आंका जाता है, जबकि सच्चाई यह है कि मजदूर समाज की एक महत्वपूर्ण इकाई जिसके बिना सफल समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

कविता

मदन सिंह सिन्दल 'कनक'

तन दुबला पर मन मजबूत है,
महल अटारी निर्माता का,
कम मत आंको कृश काय देख,
मनोबल, सजे शहरों के निर्माता का,

कर्म अपना करते रहना,
सदा पूर्वजों से सीखा है,
दो रोटी दो वक्त मिले बस,
सादा जीवन को परखा है,

परिवार जिसका परमेश्वर है,
मजदूरी जिसका कर्म सदा,
गरीबी में भी आनन्द लुटा ले,
देश हित में खड़ा सदा,

अर्थ तन्त्र का मार चाहे,
फटे वस्त्रों में झलक अमीरी की,
कीमत उनकी क्या आंकोगे,
तुम, शहरों के विश्वकर्मा की,

मजदूर बना मजबूर नहीं मैं,
अमीरी के आशियाने का,
बिन मेरे तुम भोगोगे कैसे,
आनन्द महल, अटारी का,

सुनो सभ्य, असभ्य समझते,
कम कपडे किलकारी को,
मजदूर हूं मजबूर नहीं मैं,
शर्म तुम्हारी समझदारी को ।।,

कवि पेशे से शिक्षक हैं

Chand Sheikh Desk
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