पुलिस को अदालती आदेश बिना अनुसंधान का हक नहीं

हाईकोर्ट ने असंज्ञेय (नॉन कॉग्निजेबल) अपराधों में पुलिस को मजिस्ट्रेट  आदेश बिना अनुसंधान का अधिकार नहीं माना है

By: शंकर शर्मा

Published: 05 Dec 2015, 11:43 PM IST

जयपुर. हाईकोर्ट ने असंज्ञेय (नॉन कॉग्निजेबल) अपराधों में पुलिस को मजिस्ट्रेट  आदेश बिना अनुसंधान का अधिकार नहीं माना है। साथ ही, कहा कि पुलिस के मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना इस तरह के अपराधों में अनुसंधान पूर्ण कर आरोप पत्र पेश करने से न्यायालयों में मुकदमों का भार बढ़ रहा है। कोर्ट ने अभियोजन निदेशक को आदेश की कॉपी भेजकर पुलिस की विधि विरुद्ध कार्यवाही रुकवाने को कहा है।

न्यायाधीश बनवारी लाल शर्मा ने अलवर निवासी कैलाश चन्द मीणा की याचिका मंजूर करते हुए यह आदेश दिया है। प्रार्थीपक्ष की ओर से अधिवक्ता मोहर पाल मीणा ने कोर्ट को बताया कि अलवर जिले के रेणी में पुलिस ने बिना लाइसेंस ट्रोली से पत्थर ले जाने और अवैध खनन के मामले में प्रार्थी के खिलाफ मामला दर्ज कर ली और वन अधिनियम का अपराध मानते हुए चार्जशीट पेश कर दी। प्रार्थीपक्ष ने कहा कि असंज्ञेय  अपराध में पुलिस को आरोप पत्र पेश करने का अधिकार ही नहीं है, एेसे में कार्यवाही को निरस्त किया जाए।  कोर्ट ने दण्ड प्रक्रिया संहिता का हवाला देकर कहा है कि तीन साल से कम या जुर्माने की सजा वाले अपराध असंज्ञेय श्रेणी में हैं और वन अधिनियम के तहत तीन साल से कम की सजा होने के कारण इससे जुडे अपराध भी इसी श्रेणी में आते हैं। पुलिस को असंज्ञेय अपराध के मामले में मजिस्टे्रट के आदेश बिना अनुसंधान करने का अधिकार नहीं है, एेसे में इस मामले में की गई कार्यवाही निरस्त करने योग्य है।

नहीं मान रही पुलिस : कोर्ट ने कहा कि असंज्ञेय अपराध में मजिस्ट्रेट के आदेश बिना पुलिस को अनुसंधान नहीं करने को कई बार कहा जा चुका है, लेकिन पुलिस इसके विपरीत कार्य कर न केवल अपना कार्य बढ़ा रही है बल्कि अदालत में भी मुकदमों का भार बढ़ रहा है।
शंकर शर्मा
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