अपशब्दों और बेतुके बोल से सनी सियासत

अपशब्दों और बेतुके बोल से सनी सियासत
अपशब्दों और बेतुके बोल से सनी सियासत

Rajendra Sharma | Publish: Sep, 18 2019 08:56:05 PM (IST) | Updated: Sep, 18 2019 09:43:49 PM (IST) Jaipur, Jaipur, Rajasthan, India

सियासतदां ( Politicians ) हाल के बरसों में विपक्षियों के लिए जमकर अपशब्दों ( Abusive words ) के प्रयोग से बाज नहीं आ रहे। इतना ही नहीं, खुद को ज्यादा ज्ञानी साबित करने की कोशिश में जमकर बेतुकी बयानबाजी भी कर रहे हैं। सियासत में मर्यादा अब इतिहास की बात हो चुकी है। आलम यह है कि चुनाव आयोग को 2017 में गुजरात ( Gujrat ) विधानसभा चुनाव तक में दखल देना पड़ा था। तो, ऐसे कुछ मामले अदालतों तक पहुंच चुके हैं।

राजेंद्र शर्मा। अपशब्दों ( Abusive words ) और बेतुकी बयानबाजी ( Absurd Statement ) का इस्तेमाल सियासत ( Politics ) में बढ़ने के साथ ही लोकशाही ( Democracy ) को दागदार करने लगा है। चुनाव में तो यह प्रवृत्ति बहुत बढ़ जाती है। बता दें, गुजरात विधानसभा चुनाव-2017 में आयोग ने बीजेपी के विज्ञापन में 'पप्पू' शब्द के इस्तेमाल पर रोक लगाई थी। खैर, चुनावों में तो ऐसा होता ही है, इन दिनों सत्तारूढ़ दल के मंत्री तक बेरोजगारी ( Unemployment ), हेल्थ ( Health ) जैसी समस्याओं पर भी बेतुके बोल का खुलकर प्रयोग करने लगे हैं।

ये बोल बेतुके

हाल ही में केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री रमेश पोखरियाल ने बेरोजगारी की समस्या का दोष उन युवाओं पर थोप दिया जो बीएड करते हैं। बोले, जिसे कोई नौकरी नहीं मिलती वह बीएड कर बेरोजगारों की फौज बढ़ाता है, अब सरकार ऐसे नियम बनाएंगे कि शिक्षक बनना आईएएस बनने से ज्यादा कठिन हो जाएगा। ऐसे ही केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे का बयान 'आयुष मंत्रालय गोमूत्र से दवाई बनाने का काम कर रहा है' भी चर्चा का विषय रहा। तो, लोकसभा चुनाव में एक साध्वी का अपने प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार का 'आतंकी' कहना, मुंबई आतंकी हमले में शहीद हेमंत करकरे की शहादत को अपने 'श्राप' बताना, भिक्षाटन को आय का जरिया बताना, नाली और शौचालय की साफ करवाने के लिए सांसद नहीं बने बोलना...बेतुके पर की हदें पार करता है। ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं। हो भी क्यों न, इन लोगों का नेतृत्व भी ऐसी बयानबाजी से इन्हें प्रेरणा जो देता है। यथा...राज्यसभा में रेणुका चौधरी पर 'रामायण के बाद ऐसी हंसी...', पूर्व पीएम मनमोहन सिंह पर 'बाथरूम में रेनकोट पहन कर नहाने...' जैसे कटाक्ष इन्हें प्रेरित जो करते हैं।

सिर्फ सोशल मीडिया नहीं दोषी

सियासत में गिरते भाषा के स्तर के लिए दोष सोशल मीडिया पर थोपा जाता है। यह उचित नहीं, क्योंकि जब चर्चिल ने गांधी जी के लिए 'अधनंगा फकीर' और शिशुपाल ने श्रीकृष्ण के लिए सौ अपशब्दों का प्रयोग भरी सभा में किया था...तब और, दुर्योधन को 'अंधे का बेटा अंधा' कहकर द्रौपदी ने उपहास उड़ाया...तब और द्रौपदी को दुशासन और दुर्योधन ने भरी कौरव सभा में निम्न स्तरीय अपशब्दों से संबोधित किया था...तब, सोशल मीडिया नहीं था। वर्तमान में देखें तो कुछ वर्ष पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए वाजपेयी सरकार में वरिष्ठ मंत्री रहे नेता द्वारा 'शिखंडी' शब्द का जब प्रयोग किया गया, तब भी सोशल मीडिया अपने रंग में नहीं था। जाहिर है, सोशल मीडिया अकेला अपशब्दों के लिए दोषी नहीं है। अलबत्ता, हाल ही के वर्षों में सियासी दलों ने जो आईटी सेल गढ़े हैं और उनमें युवाओं की फौज को रोजगार दिया है, इसी काम के लिए। स्पष्ट है, सोशल मीडिया नहीं सियासत का गिरता स्तर है दोषी। शब्द निकलते तो नेताओं के मुखारविंद से हैं, सोशल मीडिया की शोभा तो बाद में बढ़ाते हैं। और हां, सोशल मीडिया पर अपशब्दों का प्रयोग बिना शह के तो नहीं होता न! चाहे, वह 'कुतिया की मौत पर पिल्लों के बिलबिलाने' का ट्वीट हो या फिर कुछ और...। अब तो शहादत को भी 'श्राप' का नाम दिया जाने लगा है।


कब-कब...कैसे-कैसे शब्द

गौर करें तो सबसे पहले ऐसे शब्दों की शुरूआत हुई इंदिरा गांधी के जमाने में, खासकर 1977 के चुनाव में। जब चुनाव के दौरान विपक्ष के कार्यकर्ता 'गली-गली में शोर है...चोर है' और 'नसबंदी के तीन दलाल...' के साथ ही तमाम तरह के अपशब्दों से भरे नारे इंदिरा गांधी, उनकी नीतियों और उनके निकटवर्तियों के लिए प्रयोग करते दिखे थे। वर्तमान में देखें तो 2002 में चुनाव टालने को लेकर चल रहे आरोप-प्रत्यारोप के दौर में गुजरात के तत्कालीन कार्यवाहक मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुख्य चुनाव आयुक्त लिंगदोह के निर्णय को उनके घर्म से प्रेरित बताया था और साथ ही आरोप लगाया था कि वे कांग्रेस अध्यक्ष के करीब हैं। तब लिंगदोह ने इसे घृणित और शर्मनाक बताया था। इसके बाद तो निरंतर अपशब्दों का प्रयोग होता रहा है। बात 'विदेशी बहू' से लेकर 'मौत के सौदागर' के रास्ते होती हुई सियासत को कई अमर्यादित शब्दों का सफर करा लाई। वर्ष 2014 में हुए आमचुनाव में तो यह स्तर रसातल तक गिर गया। इस चुनाव और इनके बाद हुए चुनावों में 'डीएनए', 'बेटी सेट करने', 'पाकिस्तान में पटाखे', 'शहजादा', 'शाहजादा', 'चौकीदार या भागीदार', 'जंगली', 'बदनसीबवाला', 'राक्षस', 'हरामजादे' जैसे अपशब्दों पर रैलियों में जितनी तालियां बजती गई, लोकतंत्र की गरिमा भी उतनी ही गिरती गई।

बहरहाल, बेतुके बोल और अपशब्द ...सोशल मीडिया पर मिलने वाले 'छद्म' समर्थन के कारण राजनीति के शॉर्टकट कम, स्वयं की खामियों को उजागर न होने देने की कोशिश की कुण्ठित निराशा का द्योतक मात्र हैं। कुछ भी हो, इससे न सिर्फ सियासत सन रही है, बल्कि लोकतंत्र के लिए भी यह प्रवृत्ति घातक है।

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