पदोन्नति नई, कायदे पुराने, गेंद सरकार के पाले में

पदोन्नति नियमों (Promotion rules) के फेर में उलझे शिक्षक संगठनों (Teacher organizations) ने ज्ञापन (Memorandum) सियासत की मुहिम तेज कर दी है। दरअसल, शिक्षा विभाग (education Department) में प्रधानाध्यापक (headmaster) से प्रिसिंपल और व्याख्याता से प्रिसिंपल (Principal) के पदों पर पदोन्नति होनी है। इसके अनुपात को लेकर दोनों संगठनों के अपने-अपने दावे है।

By: vinod

Published: 16 May 2020, 12:16 AM IST

सीकर। पदोन्नति नियमों (Promotion rules) के फेर में उलझे शिक्षक संगठनों (Teacher organizations) ने ज्ञापन (Memorandum) सियासत की मुहिम तेज कर दी है। दरअसल, शिक्षा विभाग (education Department) में प्रधानाध्यापक (headmaster) से प्रिसिंपल और व्याख्याता से प्रिसिंपल (Principal) के पदों पर पदोन्नति होनी है। इसके अनुपात को लेकर दोनों संगठनों के अपने-अपने दावे है। अब गेंद पूरी तरह सरकार के पाले में है। प्रधानाध्यापकों और प्राध्यापकों के पदोन्नति को लेकर अपने-अपने तर्क है। इसमें बड़ा पेंच विधि व वित्त विभाग से फंसा है, क्योंकि व्याख्याता 4800 पे ग्रेड पर कार्यरत है, इससे बीच की 5400 की पे-ग्रेड के कायदे भी टूटते है। यदि वह संख्या में ज्यादा प्रिंसिपल बनते है तो सरकार को बड़ा आर्थिक झटका भी लगता है। लेकिन व्याख्याताओं का तर्क है कि वह संख्या में 54 हजार है और प्रधानाध्यापक महज 3450 है। इसलिए सरकार को संख्यात्मक अनुपात को ठीक करना चाहिए। दूसरी तरफ प्रधानाध्यापकों का कहना है कि उनके पास ज्यादा प्रशासनिक अनुभव है ऐसे में पदोन्नति के लिए ज्यादा सीटों पर उनका हक है। इनका यह भी तर्क है कि पिछली भर्ती में सबसे ज्यादा व्याख्याता ही चयनित होकर आए है यदि संख्यात्मक रुप से छेड़छाड़ हुई तो पूरा ढांचा चरमरा जाएगा।

प्राध्यापकों के यह तर्क
-प्राध्यापकों का कहना है कि वर्तमान में उनकी संख्या लगभग ५४ हजार है, जबकि प्रधानाध्यापकों की संख्या लगभग 3450 है। एेसे में पदोन्नति के नियमों में बदलाव होना चाहिए। संगठन की ओर से पिछले महीने से पदोन्नति का अनुपात 92.8 फीसदी करना चाहिए।
-समय पर पदोन्नति नहीं मिलने के कारण व्याख्याताओं में ठहराव बढ़ गया है। इसलिए सरकार को कई सालों से लंबित नियमों में अब बदलाव करना चाहिए।

प्रधानाध्यापकों के यह तर्क
-पुराने पैर्टन के हिसाब से पदोन्नति के लिए प्रधानाध्यापकों के कई तर्क है। प्रधानाध्यापकों का कहना है कि उनके पास शिक्षक के साथ प्रशासनिक पद का भी अनुभव है। संख्या में भले ही कम हो, लेकिन पदोन्नति का पहला हक उनका है।
-पुरानी गठित समितियों ने इसको जायज माना था। इसलिए सरकार को नई कमेटी बनाकर अध्ययन कराना चाहिए जिससे दोनों पक्षों के साथ न्याय हो सके।
और ऐसे समझे दोनों का दर्द:
केस एक
आधे से ज्यादा व्याख्याता की नौकरी छोड़कर एचएम बने
राजस्थान लोक सेवा आयोग की ओर से आयोजित प्रधानाध्यापक सीधी भर्ती में ३५ फीसदी से अधिक व्याख्याताओं का भी चयन हुआ है। व्याख्याताओं का दर्द है कि जब पदोन्नति में इस तरह का दर्द सहना है तो पुरानी नौकरी ही ठीक थी। व्याख्याता से प्रधानाध्यापक बने अभ्यर्थियों का कहना है कि सरकार को पुरानी समितियों के अध्ययन के आधार पर कोई निर्णय लेना चाहिए। यदि सरकार संख्यात्मक अनुपात में बदलाव करती है तो नए प्रधानाध्यापकों को तो कई सालों तक प्रिंसिंपल बनने का मौका नहीं मिलेगा।
केस दो
संख्या के हिसाब से रिव्यू तो करना चाहिएपदोन्नति के मामले में प्राध्यापकों का अपना अलग दर्द है। प्राध्यापकों का कहना है कि वर्ष 2014 में संख्या कम थी। हम आंकड़ा 54 हजार को पार कर गया है। ऐसे में सरकार को प्राध्यापकों के 54 हजार व प्रधानाध्यापकों के 3450 पदों के हिसाब से रिव्यू करना चाहिए। व्याख्याताओं का यह भी तर्क है कि यदि अब नियमों में बदलाव नहीं किया तो भविष्य में व्याख्याताओं की संख्या और बढऩे पर पदोन्नति की राह काफी कठिन होगी।

उचित निर्णय लेगी सरकार
वित्त विभाग में यह प्रस्ताव 2014 से लंबित है। जल्द ही इस मामले में उचित निर्णय सरकार लेगी। प्रिसिंपल सहित अन्य पदों पर पदोन्नति का मामला प्रक्रियाधीन है।
-गोविंद सिंह डोटासरा, शिक्षा मंत्री

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