राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह ने की लीक से हटकर पहल, वर्षों पुरानी परिपाटी पर लगाया विराम

pushpendra shekhawat

Publish: Jun, 14 2018 05:11:07 PM (IST)

Jaipur, Rajasthan, India
राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह ने की लीक से हटकर पहल, वर्षों पुरानी परिपाटी पर लगाया विराम

राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह नहीं लेंगे गार्ड ऑफ ऑनर

शैलेन्द्र अग्रवाल / जयपुर। राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह अब जिलों के दौरे के समय गार्ड ऑफ ऑनर नहीं लेंगे। उन्होंने राज्यपाल को गार्ड ऑफ ऑनर देने के वर्षों पुराने नियम के बावजूद राज्य सरकार को पत्र भेजकर इच्छा जाहिर की है कि उनके लिए गार्ड ऑफ ऑनर नहीं दिया जाए। इस बीच 9 जून को जोधपुर यात्रा के समय से उन्होंने इस पहल का पालन भी शुरु कर दिया। इससे पहले राज्यपाल सिंह विश्वविद्यालयों में दीक्षान्त समारोह में अतिथियों व छात्रों के वर्षों से गाउन पहनने की परम्परा को खत्म करा चुके हैं और समारोह में गुलदस्ता के बजाय केवल एक फूल लेने की भी शुरुआत कर चुके हैं। राज्यपाल सिंह ने गार्ड ऑफ ऑनर से स्वयं को अलग करने का ऐतिहासिक निर्णय लेकर प्रोटोकॉल की परिपाटी की लीक से हटकर नजीर पेश की है।

 

1 जनवरी को सरकार को भेजा था पत्र
राज्यपाल सिंह ने गार्ड ऑफ ऑनर नहीं लेने की इच्छा व्यक्त करते हुए राज्य सरकार को एक जनवरी 2018 को पत्र भेजा था। पत्र में पूछा था कि क्या राजभवन में आगमन व प्रस्थान के वक्त और जिलों के दौरे के समय उनको सम्मान के लिए दिए जाने वाले गार्ड ऑफ ऑनर के प्रोटोकॉल को समाप्त किया जा सकता है, इस पर गृह विभाग ने 11 मई जवाब भेजा था कि राज्यपाल की इच्छा पर गार्ड ऑफ ऑनर की प्रथा को समाप्त किया जा सकता है।

 

उपराष्ट्रपति व पीएम भी नहीं लेते गार्ड ऑफ ऑनर
राजभवन को राज्य सरकार की ओर से यह भी कहा कि जिस तरह उपराष्ट्रपति वैंकेया नायड़ू व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नियमों में प्रावधान के बावजूद गार्ड ऑफ ऑनर नहीं लेतेए उसी तरह राज्यपाल सिंह चाहे तो वे भी गार्ड ऑफ ऑनर लेने से मना कर सकते हैं। इसके बाद गार्ड ऑफ ऑनर की प्रथा समाप्त करने के लिए 13 जून को राज्यपाल सिंह ने सहमति दे दी और गुरुवार को इसके लिए सरकार को पत्र भेज दिया।

 

यह पहल भी की

उत्तर प्रदेश के दो बार मुख्यमंत्री व देश के कद्दावर राजनीतिज्ञ माने जाने वाले कल्याण सिंह ने मुख्यमंत्री के रूप में उत्तरप्रदेश में परीक्षाओं में नकल रोकने का कानून बनवाकर एतिहासिक कार्य किया था। प्रदेश में राज्यपाल रहते विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक व्यवस्था में सुधार के साथ ही समय पर डिग्रियां जारी करवाने के लिए दीक्षान्त समारोह रुकवाना शुरु कर दिया। इसका परिणाम यह रहा कि वर्षों से अटकी लाखों डिग्रियों का वितरण हो गया।

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