पत्रिका सर्वे: राज्य के 200 विधानसभा क्षेत्रों के लोग बोले- एससी-एसटी मुद्दे ने लोगों को बांटा, नहीं होगा भला

पत्रिका सर्वे: राज्य के 200 विधानसभा क्षेत्रों के लोग बोले- एससी-एसटी मुद्दे ने लोगों को बांटा, नहीं होगा भला

kamlesh sharma | Publish: Sep, 09 2018 02:20:35 PM (IST) Jaipur, Rajasthan, India

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जयपुर। राजस्थान में विधानसभा चुनाव से पहले एससी एसटी मुद्दा गरमाया हुआ है। सर्व समाज के बंद के बाद 'राजस्थान पत्रिका' ने राज्य के सभी 200 विधानसभा क्षेत्रों में सर्वे कराया तो नतीजा चौंकाने वाला रहा। प्रदेश की 71 प्रतिशत जनता का कहना है कि इस मुद्दे से राजनीतिक ध्रुवीकरण हुआ है, लेकिन इसके उलट 73 प्रतिशत का मानना है कि जातीय आधारित मतदान से प्रदेश का भला नहीं होने वाला।

विपक्ष के 10 सितंबर को प्रस्तावित बंद से दो दिन पहले हुए इस सर्वे में 57 प्रतिशत जनता की राय है कि एससी-एसटी मुद्दे से सवर्ण और पिछड़ा वर्ग की जुगलबंदी हुई है। लेकिन क्या यह चुनाव तक जारी रहेगी इस पर 51 प्रतिशत लोगों ने असहमति जताई है।

फिसल न जाए वोट, कांग्रेस-भाजपा ने साधी चुप्पी : एससी एसटी के मुद्दे पर भाजपा और कांग्रेस दोनों ही ने चुप्पी साध रखी है। इसका मुख्य कारण इस वर्ग का एक बड़ा वोट बैंक होना है। पार्टियों का मानना है कि प्रदेश में विधानसभा चुनाव हैं, ऐसे में किसी भी प्रकार की बयानबाजी करना भारी पड़ सकता है। कांग्रेस व भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के मुताबिक एससी-एसटी के वोट हवा के साथ रूख करते हैं और इनमें वोट देने को लेकर एकजुटता है। जबकि सामान्य वर्ग में यह नहीं है।

राजस्थान में एससी व एसटी की वोटों के हिसाब से 33 सीटें आरक्षित हैं। इसके अलावा भी लगभग प्रदेश की हर सीट पर इनके वोट अच्छी संख्या में हैं, जो पार्टी उम्मीदवार की हवा बदलने में सक्षम हैं।

आज कांग्रेस के हिसाब से देखें तो प्रदेश में गत चुनावों में आरक्षित सीटों पर भी करारी हार का सामना करना पड़ा था। यही कारण है कि इस वोट बैंक को लेकर कांग्रेस-भाजपा किसी भी नई उलझन में नहीं पडऩा चाहती। सूत्रों की मानें तो दोनों ही पार्टियों के नेताओं को आलाकमान की ओर से चुप रहने के निर्देश हैं।

10-15 फीसदी से अधिक असर नहीं: सुराणा
पांच बार के विधायक 87 वर्षीय माणिक चंद सुराणा का मानना है कि एससी-एसटी का यह मुद्दा चुनाव में 10-15 फीसदी असर डाल पाएगा। चुनाव में क्षेत्रीय मुद्दे समेत कई अन्य फेक्टर काम करते हैं। ऐसे में यह कहना कि क्षेत्रीय मुद्दों पर यह भारी पड़ेगा, सही नहीं होगा। उन्होंने बताया कि वैसे तो कभी भी चुनाव में सवर्ण फैक्टर हावी होते देखने को नहीं मिला, लेकिन आपातकाल के खिलाफ 70 फीसदी जनता एकसाथ कांग्रेस के खिलाफ खड़ी हुई थी। इसमें अगड़े-पिछड़े सभी शामिल थे।


ध्रुवीकरण का नया पहलू
अब तक चुनावों में धर्म आधारित ध्रुवीकरण देखने को मिलता रहा है। सर्वे में यह बात भी सामने आई कि यह इसी का दूसरा पहलू बनकर उभर रहा है। 61 फीसदी लोगों ने माना कि यह ध्रुवीकरण का नया पहलू है।


1. क्या आप मानते हैं एससी/एसटी मुद्दे से राजनीतिक धु्रवीकरण हुआ है?
71 फीसदी हां
17 फीसदी नहीं
12 फीसदी पता नहीं

2. धर्म के बाद धु्रवीकरण का क्या यह नया पहलू है?
61 फीसदी हां
22 फीसदी नहीं
17 फीसदी पता नहीं

3. क्या इससे सवर्ण-पिछड़ा वर्ग जुगलबंदी हुई है?
57 फीसदी हां
35 फीसदी नहीं
08 फीसदी पता नही

4. क्या यह जुगलबंदी मतदान में भी रहेगी?
42 फीसदी हां
51 फीसदी नहीं
07 फीसदी पता नही

5. क्या जातीय आधार पर मतदान से प्रदेश का भला होगा?
17 फीसदी हां
73 फीसदी नहीं
13 फीसदी पता नहीं

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