क्या मृतका को जीने का अधिकार लौटा सकते हैं?

Tasneem Khan

Updated: 04 Dec 2019, 06:53:57 PM (IST)

Jaipur, Jaipur, Rajasthan, India

जयपुर। कितना भी क्रोधित होकर या धैर्य से सोच लें। इन सवालों के जवाब मिलना मुश्किल है। तेलगांना रेप केस के बाद यह सवाल हमारे सामने रखे हैं लेखिका देवयानी भारद्वाज ने। वे कहती हैं इस वक्त देश की संवेदना हिली हुई है। देश बहुत आक्रोश में है। वह हैदराबाद की पशु चिकित्सक युवती के अपराधियों को फांसी के तख्ते पर झूलते देखना चाहता है। पुलिस, प्रशासन और अदालत जितना जल्दी यह फैसला सुनाए उतने इत्मिनान के साथ हम वापस अपने-अपने रोज़मर्रा के संसार में लौट सकें। तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चन्द्र शेखर राव ने भी कह दिया है की इस मामले में शीघ्र सुनवाई के लिए फास्ट ट्रेक अदालत बैठाई जाये और शीघ्र फैसला सुनाया जा सके। सवाल यह है कि क्या कोई भी फैसला मृतका के साथ न्याय कर सकता है? उसका जीवन का अधिकार उससे छीन लिया गया। क्या कोई फैसला यह अधिकार उसे लौटा सकता है? यही नहीं उस व्यक्ति से मृत्यु कि गरिमा भी छीन ली गयी। क्या कोई अदालत यह गरिमा उसे लौटा सकती है?

हर बरस बढ़ रहे हैं अपराध

यहाँ मेरा मकसद इस अपराध के हो जाने के बाद की जाने वाली कानूनी प्रक्रियाओं को पर संदेह जताना नहीं है। कानून तो अपना काम करेगा ही। ऐसे जघन्य अपराध के लिए दंड के प्रावधान भी सख्त होने चाहिए, इससे इंकार नहीं। मृत्युदंड क्या सबसे सख्त दंड है, यह एक अलग बहस है। मेरा सवाल यह है कि एक समाज के रूप में हमारी स्मृति कितनी छोटी होती जा रही है और हमारे सवाल कितने तात्कालिक? वर्ष 2013 में राष्ट्रीय अपराध रेकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के आधार पर यह अनुमान लगाया गया कि देश में लगभग हर 20 मिनट में एक बलात्कार की घटना होती है। एनसीआरबी प्रतिवर्ष यह आंकड़े जारी करता है, लेकिन आंकड़ों कि व्याख्या हर बरस अलग-अलग तरह से की जाती है। वर्ष 2013 में निर्भया और मुंबई में पत्रकार के साथ बलात्कार कि घटना के बाद इन आकांडों के विश्लेषण क आधार पर यह बताया गया कि देश में प्रत्येक 20 मिनट में एक बलात्कार कि घटना होता है। एनसीआरबी की ताज़ा रिपोर्ट यह बताती है कि वर्ष 2017 में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में महज़ 6 प्रतिशत कि बढ़ोत्तरी हुई जबकि वर्ष 2016 में यह बढ़ोत्तरी 9 प्रतिशत थी। यानि औरतों के साथ होने वाले अपराध कम होंगे फिलहाल उसकी उम्मीद तो छोड़ ही दी जाए, उनमें बढ़ोत्तरी की दर पर यदि यह देश नियंत्रण रख ले तो औरतें खैर मनाएँ।

सवा सौ करोड़ की आबादी वाले देश में यदि राष्ट्रीय अपराध रेकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े यह कहते हैं कि हर 20 मिनट में एक बलात्कार होता है तो कौन औरत कब तक बची रहेगी इस बात की क्या कोई गारंटी यह समाज दे सकता है। वर्ष 2013 से 2017 के दौरान औरतों के खिलाफ हिंसा की घटनाओं में ऑन रेकॉर्ड 17% वृद्धि हुई है। जबकि हम जानते हैं कि औरतों के खिलाफ हिंसा के सभी प्रकरण हमारे यहाँ दर्ज नहीं होते। तो कल्पना की जा सकती है कि यह वास्तविक आंकड़ा किन भयावह ऊंचाइयों को छू रहा होगा।

औरत के आज़ादी के मायने

जब भी बलात्कार जैसा संगीन जुर्म होता है दो बातें ज़ोर-शोर से दोहराई जाने लगती हैं कि बच्चियों को बहुत कम उम्र से अपनी सुरक्षा के बारे में जागरूक बनाया जाये, जबकि प्रत्येक घटना खुद इस बात की गवाही देती है कि यह सारी बातें कितनी बेमानी है। हम थोड़ी पड़ताल उन सुझावों की कर लें कि वे कितने सार्थक हैं

बच्चियों को अच्छे और बुरे स्पर्श में फर्क बताना निश्चय ही ज़रूरी है, लेकिन यह फर्क लड़कों को भी समझना उतना ही ज़रूरी है क्योंकि किशोर होने तक लड़के और लड़कियां दोनों ही यौन उत्पीड़न के शिकार हो सकते हैं। बल्कि आंकड़े बताते हैं कि कई बार लड़कियों से ज़्यादा लड़के अपने ही घरों में यौन उत्पीड़न के शिकार होते हैं। बच्चियों के प्रति जिस तरह की हिंसा हो रही है, कहीं किसी सड़क पर, बारात में, बाज़ार में कोई अंजान व्यक्ति उन्हें दबोच ले ऐसे में छह माह, तीन साल, पाँच साल, सात साल की बच्ची या हैदराबाद की पशु चिकित्सक जैसी युवा महिला को भी क्या यह जानकारी कोई मदद कर सकती है? बच्चों को अपने आस-पास मोलेस्ट होने से बचाने के लिए यह जानकारी निश्चय ही ज़रूरी है, लेकिन बलात्कार की घटनाओं के बाद इस बातों को दोहराना मूलतः समस्या को सुलझाने में मदद करने के बजाय उससे ध्यान भटकाना मात्र होगा।
लड़कियों को अपनी सुरक्षा के प्रति सतर्क रहने की सलाह अक्सर दी जाती है। आप कब, कहाँ जा रही हैं इसके बारे में सजग रहने की सलाह दी जाती है। जेब में पेपर स्प्रे, नुकीला हथियार, मिर्ची का पाउडर लेकर चलने की सलाह दी जाती है। जबकि हाल की घटना में यह भी बताया गया कि युवती की जेब में पेपर स्प्रे था, लेकिन क्या अपराध की तैयारी के साथ निकले चार पुरुषों से अकेली अपने रोज़मर्रा से रास्ते से जा रही औरत की मदद इनमें से कोई भी औज़ार कर सकता है। यहाँ तक कि लड़कियों को यदि आत्मरक्षा का प्रशिक्षण (कमांडो ट्रेनिंग) भी दी गई हो तो क्या वाकई वह चार पुरुषों से एक साथ मुक़ाबला कर सकती है। यदि ऐसा होता तो निश्चय ही इस तरह की घटनाओं को होने से रोका जा सकता था। इसके अलावा इस बात की कल्पना कीजिये कि यदि देश के हर लड़की हर समय अपने आस-पास आने वाले हर पुरुष से सतर्क रहे, जेब में हथियार लेकर चले तो क्या हम एक स्वस्थ समाज बना सकेंगे? यह भय और असुरक्षा कहीं समाज की तमाम औरतों को मानसिक रूप से बीमार नहीं कर देंगे? ऐसे क्या स्त्री-पुरुष मिल कर एक स्वस्थ समाज की रचना कर सकेंगे?
यह भी सलाह दी गयी कि लड़कियां तुरंत पुलिस की मदद लें। एक विधायक ने भी कहा कि बहन की बजाय लड़की को पहले पुलिस को फोन करना चाहिए था। कम से कम हैदराबाद की घटना में यह सलाह भी बेमानी हो जाती है क्योंकि युवती ने अपने परिवार को आगाह कर दिया था कि वह सुरक्षित महसूस नहीं कर रही है और परिवार तुरंत पुलिस की मदद लेने पहुँच गया था। यदि पुलिस ने अपनी जिम्मेदारी निभाई होती तो लड़की की जान बचाई जा सकती थी। शायद उसे बलात्कार से भी बचाया जा सकता था। जान भी बचाई जाती तो वह अपने साथ हुई हिंसा के खिलाफ अपनी लड़ाई खुद लड़ पाती, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बल्कि इस घटना से डरी और दुखी एक अकेली लड़की जब संसद मार्ग पर अपने गले में तख्ती लटका कर अपना गुस्सा व्यक्त करने बैठी कि “मैं अपने भारत में सुरक्षित क्यों नहीं महसूस कर सकती” तो किसी वरिष्ठ अधिकारी या नेता ने उस लड़की से मिल कर उसे सुरक्षा का आश्वासन देने की ज़रूरत नहीं समझी। बल्कि पुलिस ने लड़की को जबरन इस जगह से उठा कर उसके साथ बदसलूकी की। उससे उसकी तख्ती छीन ली गयी और यह लिखवाया गया कि वह कभी संसद के पास प्रदर्शन नहीं करेगी। ऐसी पुलिस और ऐसे व्यवस्था से क्या उम्मीद की जाये?
इस तरह की घटनाएँ एक बार फिर औरतों को घर से निकलने को लेकर डर और असुरक्षा को बढ़ा देती हैं। औरतें खुद डरने लगती है, परिवार के लोग ज़्यादा चिंतित रहने लगते हैं, लड़कियों के घर से निकालने के तर्क कमजोर पड़ने लगते हैं। इस समाज में औरतों ने बहुत संघर्ष करके घर से निकलने की यह थोड़ी से आज़ादी पाई है। इस आज़ादी का एक अर्थ यह भी है कि औरतों ने पुरुषों के इरादों पर भरोसा किया है कि वह हमेशा उन पर हमला करने की घात में ही नहीं रहता है। आरतों का यह भरोसा हमें एक बेहतर समाज बना सकता था, लेकिन इधर बढ़ती हिंसा की घटनाएँ उस भरोसे को लगातार तोड़ रही हैं।

न्याय की मांग और आपकी पक्षधरता

यह बात सुनने में बिलकुल वाजिब लगती है कि औरतों को सुरक्षित महसूस होना चाहिए। वे रात और दिन किसी भी वक़्त कहीं भी आने-जाने में डर महसूस न करें। एक ऐसे समाज में यह कैसे सुनिश्चित हो जिसमें प्रत्यके 20 मिनट पर एक बलात्कार होता है, लेकिन देश कि संवेदना तीन या चार बरस में एक बार उबाल मारती है। क्या इसलिए यह घटनाएँ बलात्कार के बाद हुई हिंसा को झेल नहीं पाती या इसलिए कि जब मध्यम वर्ग, शहरी, पढे-लिखे तबके पर यह आघात होता है तो हमारी वर्ग चेतना यह झेल नहीं पाती कि एक पढ़ी-लिखी लड़की के साथ अशिक्षित, गरीब पुरुषों ने यह अपराध किया।

वही समाज जो उन्नाव की बलात्कार पीड़िता का साथ देने की बजाय विधायक कुलदीप सिंह सेंगर के पक्ष में रैली निकलता है और अपने विधायक को निर्दोष घोषित किए जाने के लिए कानूनी प्रक्रिया तक का इंतज़ार नहीं करता, आसाराम बापू के लिए सड़कों पर लोट-लोट कर अपना समर्थन व्यक्त करता है, राम-रहीम के बचाव में चक्काजाम कर देता है वह निर्भया या हैदराबाद की घटनाओं पर बलात्कारियों के लिए फांसी की मांग को लेकर सड़क पर उतर आता है। वह समाज जो कठुआ और उन्नाव को अलग-अलग नज़र से देखना चाहता है, जिसने मौका मिलते ही इस घटना को भी सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की। क्या वाकई यह समाज औरत की सुरक्षा को लेकर चिंतित है?

सिर्फ माता-पिता पर अपने लड़कों को बेहतर संस्कार देने की ज़िम्मेदारी डाल कर समाज और व्यवस्था अपना दामन नहीं छुड़ा सकते। सोशल मीडिया पर सक्रिय लोग जब अपने लड़कों को बेहतर संस्कार देने की बात करते हैं तब वे भूल जाते हैं कि वे सिर्फ अपने ही वर्ग को संबोधित हैं। जबकि इस देश में अधिकांश आबादी को जीवन की न्यूनतम गरिमा किसे कहते हैं यह पता नहीं है। इस वर्ग की स्त्री का बलात्कार खबर नहीं बनता और इस वर्ग का पुरुष जब संगीन जुर्म करता है तो फांसी की मांग के साथ सड़कों पर जुलूस निकल पड़ते हैं। अपराध कोई भी करे अपराध है और अपराध किसी के भी प्रति हो, अपराध ही है। जब तक हम यह फर्क करना बंद नहीं करेंगे हम समाज को सुरक्षित बना सकेंगे इस पर मुझे संदेह है।

इस बात की पूरी उम्मीद है कि हैदराबाद की घटना के आरोपी जो पकड़ लिए गए है, उन्हें जल्दी ही कड़ी से कड़ी सजा भी सुनाई जाएगी। संभव है इस घटना के दोषियों को भी मृत्यु दंड या आजीवन कारावास की सजा मिले। लेकिन क्या यह सजा औरतों के प्रति समाज को सुरक्षित बना सकेगी? आखिर औरत को क्या एकमात्र भय बलात्कार का है? क्या कोई व्यक्ति एकाएक बलात्कार जैसा संगीन जुर्म कर सकता है या उस व्यक्ति के अपराधी बनने के कारण समाज में कहीं और गहरे दबे हैं? ऐसा भी कहीं पढ़ा कि चार में से दो अभियुक्त दूसरे दिन सुबह यह देखने गए कि लड़की का शरीर ठीक से जला है कि नहीं, कहीं उसकी कोई शिनाख्त बाकी तो नहीं रह गई है। यह संवेदना के मर जाने का चरम उदाहरण है। लेकिन यह याद रखने की ज़रूरत है कि यह इस तरह का इकलौता उदाहरण नहीं है। यदि समाज में इस कदर विकृतियाँ व्याप्त हैं तो इन कारणों की पड़ताल करने की ज़िम्मेदारी किसकी है? यदि प्रत्येक बीस मिनट में एक बलात्कार होता है तो यह देश चैन की नींद सो कैसे पाता है?

राजस्थान पत्रिका लाइव टीवी

खबरें और लेख पढ़ने का आपका अनुभव बेहतर हो और आप तक आपकी पसंद का कंटेंट पहुंचे , यह सुनिश्चित करने के लिए हम अपनी वेबसाइट में कूकीज (Cookies) का इस्तेमाल करते हैं। हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति (Privacy Policy ) और कूकीज नीति (Cookies Policy ) से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned