यहां सर्दी में कोई भूखा नहीं सोता और रात को रोजाना बंटती थी रजाइयां

शीत ऋतु आगमन के साथ ही दान पुण्य महकमा हरकत में आ जाता। शहर के दरवाजे बंद हो जाते तब रात आठ बजे बाद घुड़सवार पुलिस के साथ बैलगाड़ी चलती जिसमें खीचड़ा, गुड़, बाजरे की रोटी, मोठ की दाळ और सर्दी में ठिठुरते लोगों के लिए जेल में बनी कंबल व रजाइयां रहती। मावठ होती तब बेघरबारों को त्रिपाल भी बांटे जाते...

By: dinesh

Published: 02 Jan 2020, 12:08 PM IST

- जितेन्द्र सिंह शेखावत

जयपुर। शीत ऋतु आगमन के साथ ही दान पुण्य महकमा हरकत में आ जाता। शहर के दरवाजे बंद हो जाते तब रात आठ बजे बाद घुड़सवार पुलिस के साथ बैलगाड़ी चलती जिसमें खीचड़ा, गुड़, बाजरे की रोटी, मोठ की दाळ और सर्दी में ठिठुरते लोगों के लिए जेल में बनी कंबल व रजाइयां रहती। मावठ होती तब बेघरबारों को त्रिपाल भी बांटे जाते।

सियाशरण लश्करी के मुताबिक पुण्य महकमा के हाकिम और पुलिस वाले इस बात का ध्यान रखते कि रात को काई भूखा न सोये और रजाई के अभाव में सर्दी में परेशान नहीं होवे। सवाई रामसिंह ने सूद सदावर्त फंड बनाया था जिसका मूल मकसद रहा कि उनके शहर में कोई भी आदमी भूखा नहीं रहे। महाराजा मानसिंह तो रात को खुले में सोने वालों को कंबल बांटने खुद ही जीप चलाकर निकलते। मिर्जा इस्माइल के समय में बेघरबार लोग रात को बरामदों में सोते थे।

बालानंदी मठ से जुड़े देवेन्द्र भगत ने बताया कि जलेब चौक, छोटी-बड़ी चौपड़ ,घोड़ा निकास रोड के अलावा तीनों चौपड़ों पर राहत शिविर लगते। इनमें कोई भी आदमी खाने और ओढऩे की वस्तु मांग सकता था। इसके लिए जाति या धर्म नहीं पूछा जाता था। सर्दी में अलाव जलाकर तापने के लिए मोहल्लों में पुण्य महकमा लकड़ी डलवा देता। बारह भाइयों का चौराहा, धाभाईजी और लुहारों का खुर्रा, बद्रीनारायणजी का चौक, ब्रह्मपुरी आदि में अखाड़ों से जुड़े ढंूढाड़ी कवि देर तक अपनी रचनाएं सुनाते। मंदिरों में भजनों के अलावा गोर्वधन लीला, दान लीलाएं होती। भक्त कवि युगल किशोर चतुर्वेदी एक नया भजन रच कर गोपीनाथजी को सुनाते। प्रेम भाया मंडल और आजाद मंडल से जुड़े राधेलाल चौबे आदि लोग रात को मंदिरों में भजनों का आयोजन करते और दाळ के बड़े, बाजरे की रोटी के अलावा गुलगले, हलवा, लापसी का भोग लगाकर राहगीरों को बांटते। पुष्ठी मार्गी और अष्ठायाम पूजा के मंदिरों में राग मल्हार, भैरव, मालकोस आदि राग में भजन होते और मीठी खीचड़ी और गुलगले का भोग लगता।

पुरोहितजी का कटला के दर्जी, सर्दी में रुई की बनी सदरी और आतम सुख की बेहतरीन सिलाई करते। पहले पूरी सर्दी में दाल के गरमा-गरम बड़ों का मंदिरों में भोग लगता था। पिछले साठ-सत्तर साल से ज्यादातर पौष माह में ही पौष बड़ों का आयोजन होने लगा है।

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