जन्मदिन विशेष: दिलचस्प थी पायलट की सियासत में एन्ट्री, 26 साल की उम्र में बन गए थे सबसे युवा सांसद

जन्मदिन विशेष: दिलचस्प थी पायलट की सियासत में एन्ट्री, 26 साल की उम्र में बन गए थे सबसे युवा सांसद

nakul devarshi | Publish: Sep, 07 2018 10:15:26 AM (IST) | Updated: Sep, 07 2018 11:18:51 AM (IST) Jaipur, Rajasthan, India

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जयपुर।

राजस्थान के सबसे लोकप्रिय नेताओं में से एक और इंडियन यूथ आइकन माने जाने वाले पॉलिटिशियन सचिन पायलट आज अपना जन्मदिवस मना रहे हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पायलट को उनके जन्मदिन पर शुभकामनाएं देने वालों का तांता लगा हुआ है। पार्टी नेता और कार्यकर्ता उनकी दीर्घायु के लिए कई तरह के आयोजन भी कर रहे हैं।

 

गुर्जर समुदाय से आने वाले पायलट कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे स्वर्गीय राजेश पायलट के पुत्र हैं। लिहाज़ा बचपन से ही उन्होंने सियासत को करीब से जाना है। लेकिन शुरूआती दिनों से ही वे पढ़ने-लिखने में ही लगे रहे। पायलट की प्रारंभिक शिक्षा नई दिल्ली के एयर फोर्स बाल भारती स्कूल में हुई। उन्होंने अपने स्नातक की डिग्री भी दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंट स्टीफेंस कॉलेज से हासिल की। स्टीफंस से पढ़ाई पूरी करने के बाद गुडगांव स्थित एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में ढ़ाई-तीन साल काम किया। इसके बाद पायलट ने अमरीका स्थित पेंसिलवानिया विश्वविद्यालय के व्हॉर्टन स्कूल से एमबीए की डिग्री भी हासिल की। भारत लौटने पर साल 2002 में अपने पिता के जन्मदिन 10 फरवरी को सचिन कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए। इस अवसर पर एक बड़े किसान सभा का आयोजन भी किया गया था।

 


ऐसे जीता था पहला चुनाव

13 मई 2004 को पायलट चौदहवीं लोकसभा के लिए दौसा सीट से चुने गए जिसमें उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी को 1.2 लाख मतों से हराया। 26 साल की उम्र में वे भारतीय सांसद बनने वाले सबसे युवा व्यक्ति थे। पायलट केंद्र सरकार के गृह विभाग के स्टैंडिंग कमिटी के सदस्य एवं नागरिक उड़्डयन मंत्रालय के सलाहकार समिति के सदस्य भी हैं।


... इसलिए रोचक और दिलचस्प थी सचिन की चुनाव में जीत
राजस्थान के दौसा लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में पूर्व केन्द्रीय मंत्री स्वर्गीय राजेश पायलट के पुत्र सचिन पायलट कांग्रेस की परम्परागत सीट और अपने परिवार की राजनीतिक विरासत बचाने के लिए चुनाव मैदान में उतरे थे। चुनाव में जीत हासिल करना पायलट के लिए आसान नहीं था।


सचिन पायलट के सामने उस समय इस क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी से करतार सिंह भडाना, इंडियन नेशनल लोकदल इनेलो से रोहिताश्व कुमार, बहुजन समाज पार्टी से राकेश कुमार, समाजवादी पार्टी से मुकर्रम अली सहित नौ उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमा रहे थे। भाजपा के बागी इनेलो प्रत्याशी रोहिताश्व ने इस मुकाबले को और ज़्यादा दिलचस्प बना दिया था। ऐसे में इन सभी को हराना पायलट के लिए भी किसी चुनौती से कम नहीं था।

 

चुनाव में सचिन पायलट के सामने कांग्रेस और इनेलो प्रतयाशी दौसा क्षेत्र के लिए नए नहीं थे। भाजपा उम्मीदवार हरियाणा में सहकारिता मंत्री पद से त्यागपत्र देकर चुनाव लड़ने आए थे इसलिए भाजपा ने यहां राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार की उपलब्धियों और प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व को मुद्दा बनाया था।

 

दरअसल, इससे पहले वर्ष 1984 में हुए चुनाव में कांग्रेस के राजेश पायलट ने यहां से अपना खाता खोला था और इसके बाद फिर पांच बार दौसा का प्रतिनिधित्व किया। वर्ष 1989 में भरतपुर से चुनाव लड़कर उन्हें पराजित होना पड़ा। बाद के चारों चुनाव पायलट ने दौसा से जीते।


वर्ष 1999 में हुए चुनाव में लगातार चौथी बार चुनाव जीते राजेश पायलट की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई। उपचुनाव में उनकी पत्नी रमा पायलट को सहानुभूति जीत मिली लेकिन वह अपने कामकाज और व्यवहार से मतदाताओं के दिल में जगह नहीं बना सकी। लिहाजा उन्हें अपने पुत्र के लिए मैदान छोड़ना पड़ा था।

 

व्यक्तिगत जीवन

पायलट का विवाह सारा अब्दुल्लाह से साल 2004 में हुआ, जो कश्मीरी नेता फारूक अब्दुल्ला की सुपुत्री हैं। सचिन आैर सारा की प्रेम कहानी किसी फिल्म की कहानी से कम नहीं है। विदेश में हुई मुलाकात प्यार में और प्यार कब शादी बंधन में बदल गया। इस बात का पता ही नहीं चला। सचिन पायलट ने जब सारा से शादी करने की बात अपने घर में की तो उसका जबरदस्त विरोध हुआ। सारा को भी इस शादी के लिए अपने परिवार से इजाजत नहीं मिली। क्योंकि फारूक अब्दुल्ला को डर था कि इसका नैशनल कांफ्रेंस के लिए गंभीर राजनीतिक परिणाम होंगे।

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