‘गीता-कृष्ण’ पर प्रतिक्रियाएं: वेद-विज्ञान का बेहतरीन वैचारिक दृष्टिकोण

गीता के माध्यम से वेद विज्ञान की गूढ़ता और उसके मर्म पर प्रकाश डालते पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी के विज्ञान वार्ता के तहत अग्रलेख ‘गीता-कृष्ण’ को प्रबुद्ध पाठकों ने वेद-विज्ञान का बेहतरीन दृष्टिकोण बताया है।

By: kamlesh

Published: 21 Nov 2020, 05:20 PM IST

गीता के माध्यम से वेद विज्ञान की गूढ़ता और उसके मर्म पर प्रकाश डालते पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी के विज्ञान वार्ता के तहत अग्रलेख ‘गीता-कृष्ण’ को प्रबुद्ध पाठकों ने वेद-विज्ञान का बेहतरीन दृष्टिकोण बताया है। उन्होंने कहा है कि यह विज्ञान और आध्यात्मिक विज्ञान के बीच संबंधों की खूबसूरत व्याख्या करने वाला अग्रलेख है। पाठकों की प्रतिक्रियाएं विस्तार से

फल की इच्छा किए बिना हो कर्म
राजस्थान पत्रिका के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी का अग्रलेख-"गीता-कृष्ण सटीक व प्रेरक लेख है । उन्होंने आध्यात्मिक व विज्ञान के समन्वय की सटीक व्याख्या की है। आज मनुष्य आधुनिकता की दौड़ में मानवीय मूल्यों को भूल भौतिकता की तरफ बढ़ते हुए मशीनी हो गया है । यह आलेख उसे जीने की सही दिशा देता है । निष्कर्षत: कृष्ण सर्वत्र है अर्थात सुख में भी और दुख में भी। इसलिए हमें फल की चिंता किय बिना कर्म करते रहना चाहिए तभी हम सुखी जीवन जी सकेंगे।
पूरण सिंह राजावत, जयपुर

हर पीढ़ी को वेद-विज्ञान से रूबरू कराना जरूरी
युवा ही नहीं, हर पीढ़ी के व्यक्ति को वेद-विज्ञान से परिचित कराना जरूरी है। खास तौर से ऐसे वक्त में जब हम पश्चिमी सभ्यता की गुलामी में जा चुके हैं। यह सही बात है कि वर्तमान विज्ञान उपकरण आधारित है। वेद विज्ञान में शरीर के भीतर मन, अंत:करण और आत्मा अवस्थित हैं, जो स्वयं प्रयोगशाला है। इस बेहतरीन वैचारिक दृष्टिकोण प्रदान करने के लिए आभार।
डॉ. नलिन जैन, सागर

विज्ञान और आध्यात्मिक विज्ञान में संबंध का विश्लेषण
शरीर के स्वरूप तथा क्रियाकलापों को समझकर सृष्टि रचना एवं गतिविधियों को समझा जा सकता है। कोठारी ने वेद के विज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच के अंतर को बखूबी स्पष्ट किया है। इसमें प्राण, अपान, स्थिति की वैदिक परिभाषा का ज्ञान मिला। प्राण की विभिन्न स्थितियों को इंद्र, विष्णु, ब्रह्म के रूप में बहुत ही आसान तरीके से स्पष्ट किया गया है। विज्ञान और आध्यात्मिक विज्ञान के बारीक अंतर व समानताओं का बहुत अच्छा विश्लेषण किया गया है।
रामपाल सिंह, एडवोकेट, छतरपुर

गति की अनमोल परिभाषा
कोरोना काल में विज्ञान वार्ता पर लिखा गया लेख पढ़ा तो लगा वाकई में आज के समय में इसकी जरूरत है। इसे पढक़र आज की युवा पीढ़ी को काफी कुछ जानने और सीखने का मौका मिलेगा। गति को लेकर जो परिभाषा बताई गई है, वह अनमोल है।
राजेश चौरसिया, भोपाल

अद्भुत जानकारियों वाला लेख
गीता-कृष्ण शीर्षक से कोठारी के विज्ञान वार्ता कॉलम में आलेख में श्रीकृष्ण को लेकर जो जानकारियां शामिल की गई हैं, वह वाकई नई और अद्भुत है। आम जीवन में कृष्ण को शामिल करने को लेकर जो बिंदु दिए गए हैं, उन पर विचार कर सकारात्मकता से आगे बढ़ा जा सकता है।
पुरषोत्तम कोराने, ज्योतिषी, इंदौर

दिल को छूने वाली बात
गीता के माध्यम से श्रीकृष्ण ने जीवन जीने के जो सलीके सिखाए हैं, उन्हें बेहद प्रभावी तरीके से कोठारी ने अपने आलेख में शामिल किया है। जिस तरह कृष्ण ने बताया है बीज बनो, पेड़ बनो, फल की कामना मत करो अर्थात बिना स्वार्थ के अन्य लोगों की मदद करना ही जीवन दर्शन है। वाकई में लेख दिल को छूने वाला है।
विनय सराफ, इंदौर

वेद विज्ञान की संपदा से परिचय
भागवत गीता के महत्व को कोठारी ने बहुत ही बेहतर ढंग से विज्ञान वार्ता के माध्यम से जोडक़र बताया है। वास्तव में आधुनिक विज्ञान मुल्क उपकरणों पर आधारित है। प्रयोगकर्ता प्रयोग का अंग नहीं बनता। वेद विज्ञान में तो शरीर ही उपकरण बनता है। इसका कारण भी स्पष्ट बताया गया है। यह आलेख आज की युवा पीढ़ी को वेद विज्ञान की संपदा से जरूर परिचित कराएगा।
शैलेंद्र त्रिवेदी, बुरहानपुर

गूढ़ और गंभीर बातें
निश्चित तौर पर संस्कृति, धर्म, विज्ञान, पर्यावरण और देश के बारे में चिंतन करने वाले व्यक्ति को इस लेख से नई राह मिलेगी। खासकर युवा अपनी संस्कृति, धर्म, अध्यात्म को समझेंगे। बहुत ही गूढ़ और गंभीर बातें कोठारी ने लिखी हैं। यह विषय मनन और चिंतन का है।
प्रो. सचिन राय, विक्रम विवि, उज्जैन

दूसरों के लिए जीने का संदेश
यह लेख हर पीढ़ी के लिए वर्तमान स्थिति में नए चिंतन वाला है। अग्रलेख में मनुष्य को स्वयं के साथ दूसरों के लिए जीने का संदेश दिया गया है। अपने कार्यों के साथ प्रकृति प्रेम, विद्या, अविद्या के स्वरूप से अवगत कराते हुए कर्म की व्याख्या एक शब्द कर्मण्येवाधिकारस्ते में समेट दिया है।
सरला गेहलोत, रतलाम

नई पीढ़ी को गीता का ज्ञान दें
अग्रलेख में विज्ञान वार्ता के रूप में नई पीढ़ी को गीता के बारे में बताने की स्वागत योग्य पहल की गई है। नवयुवकों को गीता का ज्ञान देना चाहिए, क्योंकि गीता में कर्मों की व्याख्या भगवान श्रीकृष्ण ने बहुत ही विस्तार से की है। अग्रलेख में सही बताया गया है कि सभी कुछ कृष्ण है, अन्यथा कुछ भी नहीं।
डॉ. मयंक ढेंगुला, दतिया

हमें कर्मों पर विश्वास करना चाहिए
गीता की विज्ञान के रूप में व्याख्या करके ही नई पीढ़ी को गीता के महत्व के बारे में बताया जा सकता है। अग्रलेख में सही बताया है कि वृक्ष की कोई भी इकाई अपने लिए कार्य नहीं करती। सब एक दूसरे के लिए कार्य करते हैं। यही स्थिति शरीर की है। यह हम तभी समझ सकते हैं जब हम गीता का अध्ययन करें और कर्म पर विश्वास करें
महेश श्रीवास्तव, योगाचार्य, दतिया

मनुष्य कर्म करे, फल प्रकृति देगी
अग्रलेख में सबसे अच्छी बात यह लिखी है कि मनुष्य को केवल कर्म करना चाहिए। फल स्वयं प्रकृति देगी। कर्म भी प्रकृति से ही प्रवृत्त होता है। इसका आधार पूर्व के कर्म ही होते हैं जो बिना प्रतिक्रिया के भोगने ही पड़ते हैं। फल पूरे भोगने ही पड़ते हैं। यदि हमने अपनी ओर से भिन्न रूप से प्रयास किए, फलों को लक्ष्य बनाकर कार्य किया तो उसके नए फल भोगने के लिए नया जन्म लेना पड़ेगा।
अनिल परसोलवाल, डबरा

श्रीकृष्ण की हर लीला है सीख
कृष्ण सभी जगह है। धर्म और सत्य के लिए सही कर्म करना और समय-समय पर अधर्म के खिलाफ आवाज उठाना ही भगवान कृष्ण द्वारा दिए गए संदेश का सही अर्थ है। हर युग में अधर्म ज्यादा होने पर कृष्ण ने किसी न किसी रूप में अवतार लिया और उसका विनाश किया। भगवान कृष्ण की सभी लीलाओं से कुछ न कुछ सीखने को मिलता है।
दिनेश सिकरवार, समाजसेवी, शिवपुरी

वेद और विज्ञान से रूबरू कराता अग्रलेख
कोठारी ने वेद और विज्ञान के बीच क्या समानता व अंतर है, इसको अच्छा समझाया है। मौजूदा समय में लोगों ने वेद को भुला सा दिया है, जबकि विज्ञान भी वेद के आधार पर चल रहा है। अंतर इतना है आधुनिक विज्ञान उपकरणों पर आधारित है, जबकि वेद में मानव शरीर ही उपकरण होता है। वेद में जो भी व्याख्या होती है वह शरीर को लेकर की गई है, लेकिन विज्ञान में प्रयोग किया जाता है।
पंडित राजेश दुबे, ज्योतिषाचार्य, बालाघाट

श्रीकृष्ण में ही समाहित संसार
श्रीकृष्ण तत्व जीवन का सार है। कृष्ण के आदर्श, कृष्ण के विचार, कृष्ण के उद्देश्य में ही संसार समाहित है। मन के भाव जब उद्वेलित होते हैं तो कृष्ण कहते हैं कि धैर्य रखो। हृदय और नाभि वाकई केंद्र हैं। कोठारी के आलेख का जितनी बार अध्ययन किया जाए, मन को शांति मिलती है। विज्ञान, मन, हृदय जैसे शब्दों का इससे अधिक स्पष्टीकरण या यूं कहें सार और कहीं नहीं मिल सकता। मन भावुक है और विचार विस्तृत हो गए हैं।
एलआर शर्मा, गुना

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