प्रतिबंधित संगठन सिमी एक बार फिर चर्चा में

प्रतिबंधित संगठन सिमी एक बार फिर चर्चा में
प्रतिबंधित संगठन सिमी एक बार फिर चर्चा में

Sanjay Kaushik | Updated: 14 Sep 2019, 01:49:54 AM (IST) Jaipur, Jaipur, Rajasthan, India

प्रतिबंधित संगठन(Banned Organisation) स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी)(SIMI) के पूर्व अध्यक्ष शाहिद बद्र फलाही शुक्रवार को गुजरात के भुज(Bhuj) की एक अदालत(Court) में 19 साल पुराने एक मामले में पेश हुए।

-सिमी के पूर्व अध्यक्ष गुजरात कोर्ट में पेश, गिरफ्तारी की इजाजत नहीं

-शाहिद बद्र फलाही 19साल पुराने मामले में पेश


भुज। प्रतिबंधित संगठन(Banned Organisation) स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी)(SIMI) के पूर्व अध्यक्ष शाहिद बद्र फलाही शुक्रवार को गुजरात के भुज(Bhuj) की एक अदालत(Court) में 19 साल पुराने एक मामले में पेश हुए। यहां अप्रेल, 2001 में उनकी एक सभा के दौरान पुलिस के साथ हुई झड़प के मामले में सितंबर, 2012 में जारी एक वारंट के आधार पर गत पांच सितंबर को उनको उनके पैतृक गांव उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के मनचोबा से पकड़ा गया था, पर वहां की एक अदालत ने उन्हें जमानत देते हुए 13 सितंबर यानी शुक्रवार को भुज की अदालत में पेश होने के आदेश दिए थे।

-तीन दिन रोजाना जांच अधिकारी के समक्ष पेश होने के आदेश

फलाही शुक्रवार को यहां मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट यानी सीजीएम की अदालत में पेश हुए और पुलिस ने उन्हें हिरासत में दिए जाने का आग्रह किया, जिसे ठुकराते हुए सीजीएम ने शनिवार से लेकर तीन दिन तक फलाही को रोज सुबह 11 बजे से शाम पांच बजे तक मामले के जांचकर्ता अधिकारी के समक्ष पेश होने के आदेश दिए।

-फलाही के वकील की दलीलें

फलाही के वकील ने कहा कि यह 19 साल पुराना मामला है, जिसमें आजमगढ़ की अदालत ने उन्हें जमानत दी है और उसके आदेश का पालन करते हुए वह पेश भी हुए हैं। ऐसे में उन्हें हिरासत में लेने की जरूरत नहीं है। यह मामला यहां ए डिवीजन थाने में भारतीय दंड संहिता की धारा 353 (सरकारी कर्मी के काम में बाधा डालने) तथा बलवा करने और गैरकानूनी ढंग से भीड़ जुटाने से जुड़ी धारा 143 और 147 के तहत दर्ज किया गया था।

-सिमी 2001 में प्रतिबंधित

पुलिस ने आजमगढ़ की अदालत में फलाही को मिली जमानत को भी चुनौती दे रखी है, जिस पर सुनवाई अभी लंबित है। ज्ञातव्य है कि सिमी को पहले वर्ष 2001 के सितंबर माह में प्रतिबंधित किया गया था, जिसे 2008 में संक्षिप्त समय के लिए हटाए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फिर से इसे प्रतिबंधित कर दिया था।

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