कहानी-बुआ जी

बुआ जी पूरे गांव की बुआ थी । बुआ जी की खुद की संतान नहीं थी लेकिन अब कई नवजातों को अपने हाथ से घुट्टी पिलाकर वे अपने आपको धन्य मान रही थीं।

By: Chand Sheikh

Published: 22 Nov 2020, 01:17 PM IST

बुआ जी

भूप सिंह

पत्नी गीता ने फोन पर जोर देकर कहा-'शाम को ऑफिस से समय पर आ जाना बुआजी की तीये की बैठक में चलना है।' 'हां याद आया, जरूर चलेंगे।' मैंने कहा। घड़ी की तरफ देखा तीन ही बजे हैं। अभी तो साढ़े पांच में अढ़ाई घंटे बाकी हंै। कोई विशेष कार्य नहीं था। मैं बुआ जी के बारे में सोचते-सोचते अतीत में चला गया....।

जब मैं सात-आठ साल का था तभी से बुआ जी का हमारे घर आना-जाना था। हालांकि जाति से हम माली हंै और बुआ जी कुम्हार समाज से थी लेकिन फिर भी उनमें सभी के प्रति अपनत्व था। मैं ज्यों-ज्यों बड़ा हुआ पता चलने लगा कि बुआ जी यहीं क्यों रहती हैं। अपने ससुराल क्यों नहीं जाती। अपने बच्चों के पास क्यों नहीं रहती है। 10-12 साल पहले ही मुझो पूरी कहानी मालूम हुई। बुआ जी की शादी जब वे 16 साल की थीं, खूब धूमधाम से गांव से 40 किमी दूर एक गांव में हुई थी। ससुराल में देवर, जेठ, ननद भरा पूरा परिवार था। बुआ जी घर-परिवार के कार्यों में निपुण थीं। शीघ्र ही ससुराल में सबका मन मोह लिया। शादी के समय फूफा जी अपने तीन भाइयों के साथ संयुक्त परिवार में रहते थे, लेकिन धीरे-धीरे सबने अलग-अलग घर बसा लिए। शादी के चार-पांच साल बाद भी बुआ जी के कोई संतान नहीं होने से बुआ जी थोड़ी चिड़-चिड़ी रहने लगी। पचास बीघा खेती की जमीन और गाय-भैंस आदि की देखभाल बुआ जी और फूफा जी दोनों ही करते। कई डॉक्टरों आदि से इलाज कराया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। फूफा जी भी निराश हो गए।

इस बीच फूफा जी को टी.बी. ने जकड़ लिया और 55 वर्ष की उम्र में फूफा जी का निधन हो गया। एक तो संतान नहीं ऊपर से पति का चले जाना, बुआ जी काफी टूट गईं। बारह दिन के बाद ही बुआ जी के पास सहानुभूति के लिए देवर-जेठ के पुत्रों ने आना जाना शुरू कर दिया। बुआ जी कुछ दिन यहां तो कुछ दिन ससुराल में रह कर समय व्यतीत करने लगीं। अब बुआ जी को लोग देवर-जेठ के किसी बच्चे को गोद लेने की सलाह देने लगे। जेठ का लड़का कानुड़ा होशियार था। वह बुआ जी के घर ज्यादा आने-जाने लगा। बुआ जी के लिए सुबह - शाम खाना, चाय, नहाने का पानी सब समय पर देता। उसने पत्नी व बच्चों को समझा दिया कि बुआ जी की सेवा मां की तरह करो। बुआ जी तो कानुड़ा की सेवा से अभिभूत हो गईं और एक दो साल में ही उसे अपना मान लिया। अब बुआ जी के दिन ठीक गुजरने लगे। समय पर बना-बनाया खाना मिलने लगा तो सभी को लगने लगा कि अब बेचारी का बुढ़ापा ठीक गुजर जाएगा।

पीहर से भी भाई-भातीजे जाते तो कहते 'बुआ जी जमीन जायदाद अभी किसी के नाम मत करना।' बुआ जी कहतीं, 'नहीं भई, कानुड़ा मेरी सेवा खूब कर रहा है।' लेकिन बुआ जी को यह सुख 2-3 साल से ज्यादा नहीं मिला। होली पर बुआ जी 20-25 दिनों के लिए पीहर आई तो पीछे से कानुड़ा ने फर्जी कागज तैयार करके सारी खेती व घर की जमीन अपने नाम करा ली। बुआ जी जब वापस गई तो देखा कि कानुड़ा, उसकी पत्नी व बच्चे सीधे मुंह बात भी नहीं कर रहे थे। बुआ जी अनिष्ठ की आशंका से कांप गईं। पता चला कि कानुड़ा ने बिक्रीनामा अपने नाम लिखवा लिया है। उनके पीहर से गए लोगों ने इस मामले में दबाव बनाया तो कानुड़ा ने जिंदगी भर बुआ जी की मां के समान सेवा करने का वादा किया। पंचायत हुई तो बुआ जी ने भी हामी भर ली कि मुझो तो दो रोटी चाहिए बस। कुछ ही दिनों बाद कानुड़ा को बुआ जी बोझा लगने लगी। अब बुआ जी की किस्मत कड़ी परीक्षा ले रही थी। अब तो बहू-बच्चे सभी बुआ जी को ताने भी देने लगे। बुआ जी चाहती तो केस कर देती लेकिन अब बुढ़ापे में क्या करना।

धीरे-धीरे बुआ जी का वहां रहना दूभर कर दिया और अन्तत: बुआ जी पीहर आ गईं। भतीजों ने खूब गुस्सा किया। कानुड़ा को मारने दौड़े लेकिन भाई ने रोक दिया। बड़े भाई ने समझााया कि तुम्हारी बुआ जी की किस्मत ही ऐसी है, इसलिए भगवान न्याय अपने आप कर देगा। अब बुआ जी ने ससुराल न जाकर पीहर में ही एक कमरे में रहना शुरू कर दिया और इधर-उधर या थोड़ा बहुत घर में काम कर के समय गुजारने लगी
65 वर्ष की उम्र में भी बुआ जी जितनी सक्रिय थी उतने हम भी इस उम्र में नहीं हंै। अब बुआ जी ने अपनी निश्चित दिनचर्या बना ली। सुबह पांच बजे उठकर स्नान - ध्यान के बाद पूजा और फिर मौहल्ले में सभी के घरों का हाल-चाल पूछना, सुख:दुख को बांटना आदि। किसी गर्भवती का ध्यान रखना, उसका टीकाकरण, उसकी खुराक, उसकी सुबह-शाम दवाएं लाना, प्रसव के समय दाई या नर्स के साथ रहना, प्रसव के बाद दो-तीन महीने तक जच्चा-बच्चा की नियमित देखभाल आदि। अब बुआ जी की धीरे-धीरे पूरे गांव में चर्चा होने लगी। शादी-ब्याह का काम, पूजन आदि से सम्बन्धित कार्य, कोई भी समूहिक रिति-रिवाज का कार्य गांव में हो तो पहले बुआ जी। अब बुआ जी गांव की बुआ तो थीं ही बल्कि सगुन की प्रतीक माने जाने लगीं। बुआ जी की खुद की संतानें नहीं थीं लेकिन अब कई नवजातों को अपने हाथ से घुट्टी पिलाकर अपने आप को धन्य मान रही थी। अब तो गांव में कोई भी शुभ कार्य बिना बुआ जी के सम्पन्न ही नहीं होता था। मुझो याद है कि जब मेरी पत्नी को दूसरे बच्चे के जन्म से छह महीने पहले ही बुआ जी ने अपनी निगरानी में ले लिया था। '

बुआ जी की मेहनत के कारण उसकी प्रथम सिजेरियन के बाद भी यह दूसरा प्रसव साधारण ही हो पाया था। यही नहीं बेटा गोलू को भी दो साल एक दिन भी अंग्रेजी दवा नहीं देने दी, केवल काढे या हरड की घूंटी से इलाज किया।
अचानक फिर फोन बजने से तन्द्रा भंग हुई। गीता ने कहा-'चलोग नहीं क्या?'
'मैंने कहा- हां हां आ रहा हूं।' आधे घंटे में हम बुआ जी के गांव पहुंच गए। वहां देखा तो आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। पूरा गांव ही नहीं बल्कि आसपास के लोग भी इस बैठक में शमिल थे। लोगों की 90 साल की उम्र तक जी जान से सेवा करने वाली बुआजी के प्रति यह सबका सम्मान था।

गांव की बहुओं, बेटियों, पुत्रों सभी में बुआ जी ने शुद्ध सात्विक संचार का प्रवाह उत्पन्न कर दिया था। इस दौरान मुझो पता चला कि कानुड़ा के एक हाथ और एक पैर के लकवा मार गया और वह खाट पर से उठ ही नहीं सकता है। उसकी पत्नी भी टीबी का शिकार हो गई है। दोनों बच्चों की शराब की लत के कारण सारी खेती की जमीन को बेचनी पड़ी। उसकी बेटी भी ससुराल से आकर घर ही बैठी है। दूसरी तरफ बुआ जी गुजरने पर सारा गांव रो रहा है। लगता है बुआ जी अपने जाने के बाद एक नहीं कई बुआ जी तैयार कर चली गई हैं, जो उनसे आगे बढ़कर लडकियों की शिक्षा, उनसे भेदभाव, उनके बाल विवाह को रोकना, उनमें अधिकारों के प्रति जागरूकता और अपने पैरों पर खड़े करने जैसे कार्यों में जुटी हुई हैं। मैं और गीता बुआ जी की एक फोटो लेकर भावुक होते हुए वापिस आ गए।

Chand Sheikh Desk
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