कहानी -फ्री हैंड

'ऑर्डर लेना है तो सुबह आ जाना। पूरे पचास प्रतिशत के साथ।' कहकर वे सो गए। सहीराम जी की सभी सही बातों को भ्रष्टाचार निरोधक विभाग वालों ने रिकॉर्ड कर ली थी।

By: Chand Sheikh

Published: 20 Nov 2020, 01:03 PM IST

कहानी
फ्री हैंड

राजेन्द्र जोशी

'सर सभी दफ्तर बंद कर दिए गए हैं। कोई भी व्यक्ति घर से नहीं निकल सकेगा। सरकार का फरमान है। हम सभी एक-दूसरे से दूर-दूर रहेंगे।'
'कहां है आदेश। दिखाओ मुझो। तुम्हें किसने बताया। इस दफ्तर का अधिकारी मैं हूं।' मन-ही-मन प्रफुल्लित होते सहीराम साहब कहने लगे। 'अरे बाबूजी, आप क्या कर रहे हो? मेल देखिए। सरकार के आदेशों की पालना हमारी जिम्मेदारी है।'

स्टाफ में प्रहलाद राय जो है तो बहुत जूनियर परन्तु साहब का खासमखास है। साहब के घर से दफ्तर तक आने वाले सप्लायर, ठेकेदार और ट्रांसफर के लिए आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को साहब से मिलने से पहले प्रहलाद राय से हरी झांडी लेनी होती है।
'सर लाइट चली गई है। लाइट आने पर ही मेल की कॉपी निकल सकेगी।'

गुस्से में पैन पटकते हुए साहब बोले - 'प्रहलाद राय, मैं घर जा रहा हंू। लाइट आने पर आदेश की कॉपी घर ले आना। हां सुनो मैडम से पूछ लेना वह जो बताए वह सामान भी लेते आना।' लाइट आते ही आदेश की प्रति निकाल कर वह साहब के घर पहुंच गया।
'यह क्या तुम तो कह रहे थे सभी दफ्तर बंद कर दिए गए हैं? हमारे ऑफिस में तो काम रहेगा। ऊपर से यह वायरस, कौनसी बीमारी आई है। हमने तो पहले कभी पढ़ा नहीं, तुमने कभी सुना प्रहलाद राय।' साहब ने झाुंझालाते हुए कहा। 'नहीं सर।'
'अब ठीक है सुनो, मैं घर से ही काम करूंगा। कोई विशेष बात हो तो तुम मुझो तुरन्त बताना। सुनो, कार्यालय में किसी को कोई छुट्टी नहीं मिलेगी। कोई भी मेल आए तो तुरन्त बताना। फोन पर तुम खुद रहना। मेरे बारे में पूछे तो बताना अभी-अभी गए हैं। कलक्टर साहब या निदेशालय से कोई फोन हो तो तुरन्त सूचित करना। शाम को घर आकर दिनभर की रिपोर्ट देना।'
'ठीक है सर, मैं दफ्तर में ही जमा रहूंगा।' साहब के पैरों में नत मस्तक हुआ इजाजत लेता बाबू बोला।
बाहर निकलते ही प्रहलाद राय मानो खुद अधिकारी हो गया था। गाड़ी की हॉट सीट पर बैठकर वह ऑफिस पहुंच गया। सभी को साहब का फरमान सुनाया।

वायरस का दायरा दुनियाभर में बढ़ता जा रहा था। देश में वायरस के संक्रमण से निपटने के लिए हर स्तर पर प्रयास किए जा रहे थे। सरकार और अवाम अपने-अपने सामथ्र्य से काम करते हुए जरूरतमंदों की मदद के लिए आगे आ रहे थे। सरकार ने यह भी ऐलान कर दिया कि स्वास्थ्य महकमे के पास समुचित मात्रा में उपकरण, दवाइयां एवं अन्य जरूरी सामान की आपूर्ति होनी चाहिए। इसके लिए चाहे जितना धन लगे। कार्यालयों में निष्ठा से काम करने वालों की कमी नहीं रहती तो हर काम में अपना फायदा ढूंढने वाले भी मिल जाते हैं।
'क्या लाए प्रहलाद राय? सब कुछ कुशल तो है न?'
'कोई परेशानी नहीं है सर। रोग फैलता जा रहा है। सरकार दिन-रात काम कर रही है। अब आप ऑफिस आइए।'
प्रहलाद राय आगे कहने लगा - 'साहब आप यह आदेश तो देख लेते तो मैं दिन में टेण्डर की प्रक्रिया कर लेता।'
'टेण्डर किस चीज का? कहां है बजट..'
'सर वही तो कह रहा था। मैंने सप्लायर से बात कर रखी है।'

संयमित आवाज एवं खुशनुमा वातावरण बनाते हुए साहब बोले- 'बताओ प्रहलाद राय कौनसा बजट आवंटन हुआ है। अच्छा एक करोड़ के पीपीई किट, सेनेटाइजर, मास्क, दवाइयां सब तुरन्त लेना होगा। भयंकर संक्रमण फैल सकता है। सीमित कोटेशन करने होंगे। सप्लाई जल्दी से जल्दी होनी चाहिए।'
'प्रहलाद राय तुरन्त काम करना होगा। सरकारी आदेश की पालना करना बहुत जरूरी है।'
'सप्लाई अच्छी क्वालिटी की होनी चाहिए। लोगों की जिन्दगी और मौत का सवाल है। महकमे में लोग सामग्री की मांग कर रहे हैं। सर्वे और इलाज में बड़ी दिक्कत हो रही है।'
'हम गांव तक सामग्री नहीं देंगे तो वे लोग काम कैसे करेंगे? आखिर वे हमारे विभाग के निष्ठावान कर्मचारी हैं। उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी विभाग का मुखिया होने के नाते मेरी है। गाड़ी लगाओ, दफ्तर चलना होगा।'
'सर कपड़े बदल लेते।'
'तुम्हें कपड़ों की पड़ी है। इतने बड़े भयानक रोग से लडऩे के लिए काम करना है।'
दफ्तर में अफरा-तफरी का माहौल बना दिया गया। सभी लोगों को किसी-न-किसी काम में लगा दिया गया। दौड़-भाग के कामों में मुस्तैदी से ड्यटी लगा दी गई। खरीद-फरोख्त के लिए प्रहलाद राय के साथ किसी को शामिल नहीं किया गया।
'प्रहलाद राय, मेरे पास ऊपर से नीचे तक फोन आ रहे हैं। सप्लाई जल्दी ली जाए। बजट की कोई कमी नहीं है। काम होना चाहिए।'
'सर मैं उसी काम में लगा हुआ हूं। कल कोटेशन खोलने का समय है। आप चिंता न करें। दो-तीन दिन में फील्ड में सामग्री वितरण कर दी जाएगी। मैं शाम को हाजिर होता हूं सर।'
साहब का 'वर्क एट होम' बजट प्राप्ति की सूचना के बाद से तुरन्त समाप्त हो गया। पूरे महकमे में सबसे अन्य जिलों की तुलना में अधिक सक्रियता केवल सहीराम जी की लग रही थी।

निदेशक महोदय दूसरे जिले के अधिकारियों को सहीराम से काम करने की सीख लेने को कहते। जगह-जगह से सहीराम जी के पास जानकारी के लिए फोन आने लगे।
'बोलो प्रहलाद राय क्या कहना चाहते हो, इतनी रात को फोन क्यों किया। सब ठीक-ठाक तो है न।'
'सर सब कुछ ठीक है, परन्तु एक मुश्किल आ गई है।'
'क्या परेशानी है भई प्रहलाद राय, हमने तुमको फ्री हैंड कर रखा है।'
'वह समस्या नहीं है सर। सप्लायर कह रहा है कि प्रमाणित मानकों के अनुसार किट उसके पास फिलहाल नहीं है, जो मानक हमें चाहिए उसको सप्लाई करने में थोड़ा वक्त लगेगा और उसमें ज्यादा कमीशन भी नहीं दे पाएगा।'

कमीशन में कमी सुनकर साहब की नींद उड़ गई। गुस्सा और तेज हो गया।
'भइया जब इतनी बड़ी महामारी आई हुई है और तुम सामग्री के मानक में उलझा रहे हो, तुरन्त सप्लाई चाहिए।'
'मुझो नहीं पता प्रहलाद राय। वह कौनसी किट देता है। हम तुम्हें साफ-साफ कह देते हैं।' सहीराम गुस्से में आगे कहने लगे-'बात सही होनी चाहिए। मैं पहले पचास प्रतिशत राशि लेने के बाद ही ऑर्डर पर साइन करूंगा। समझो।'
'आप गुस्सा न करें साहब। जो सामान वह दे रहा है उसके लिए वह मना नहीं कर रहा।'
'अरे प्रहलाद राय मुझो सोने दो। उसमें क्या फर्क पड़ता है कैसी भी किट क्यों न हो। बिना किट कोई मरा तो नहीं। फिर किट तो किट होती है न। ऑर्डर लेना है तो सुबह आ जाना। पूरे पचास प्रतिशत के साथ।' कहकर वे सो गए।
सहीराम जी की सभी सही-सही बातों को भ्रष्टाचार निरोधक विभाग वालों ने रिकॉर्ड कर ली थी।

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