कहानी-गुजरा वक्त

उसने बहुत संघर्ष किया। आखिरकार उसकी मां का सपना पूरा हुआ। वंदन आज आई.एस. ऑफिसर बन चुका था। बीती जिंदगी के बारे में सोचते-सोचते उसकी आंखें भर आईं।

By: Chand Sheikh

Published: 20 Nov 2020, 12:50 PM IST

कहानी

गुजरा वक्त
रीना मनेरिया

खुदा कसम मीनू मेरी मां को बाबूजी ने धक्का नहीं दिया। मां टिण्डे तोडऩे कुएं के पास आई थी और पैर फिसल गया। मेरे बाबूजी ने उन्हें पहले भी समझााया कि कुआं अभी बंधवाया नहीं मिट्टी सरक सकती है। उसके पास न जाना और मवेशियों पर भी नजर रखना। पर टिण्डे की वह बेल मां की मौत का कारण बन गई। .. यह कहता वह चुप हो गया। कुछ देर चुप्पी रही।

वह फिर बोला, 'मेरे पिता की जमीन हथियाने के लिए मेरे अपने ही रिश्तेदारों ने झाूठी गवाही दे कर उन्हें अंदर करवा दिया। तुम तो जानती हो न! मां से बाबूजी ने कभी ऊंची आवाज में बात तक नहीं की। मैंने मां और पिता दोनों को खो दिया मीनू। कहता वंदन बिलख पड़ा।
'मुझो तुम्हारी बातों पर पूरा विश्वास है वंदन। पर गांव वाले क्या-क्या नहीं कह रहे तुम्हारे बाबूजी के लिए? तुम्हारे पिताजी छूट भी आए तो भी अब मेरे पिताजी कतई हमारा रिश्ता नहीं करेंगे। कहते हुए उसने बंद मु_ी वंदन की ओर बढ़ाई। आंसू पोंछता वह बोला,'क्या है इसमें? कहीं तुम भी अमित की तरह शहर भाग जाने का भाड़ा तो नहीं दे रही हो?

'पायजेब है यह! तुम्हारी मां ने मुझो पिछली होली पर पहनाई थी। पर अब इनकी जरूरत नहीं।' कहती वह वंदन की हथेली पर अपनी मु_ी खाली कर चलती बनी। अब तो उसके पास सिर्फ और सिर्फ गांव वालों के कड़वे बोल और अपनों के तरकश तीर रह गए। कोई हिकारत की नजर से देखता तो कोई हत्यारे के बेटे का संबोधन देता। मीनूू भी मुसीबत में साथ छोड़ गई। कितना लाड़ लड़ाती थी मेरी मां इसे। अभी तो महज कच्चा रिश्ता हुआ जो दोनों परिवार के सिवाय शायद ही कोई जान पाया। घर एक गली छोड़कर ही था। आ जाती वह अक्सर उसे चिढ़ाने कि देख! तेरी मां की तुझासे भी लाड़ली हूं मैं। वंदन की मां और मीनू की मां दोनों सहेलियां थी तो अधिकांश औरतें यही सोचती कि सहेलियों में प्रेम इतना है कि वंदन की मां मीनू को ही अपनी बेटी मानती है।

वंदन का रिश्ता अभी पक्का नहीं हुआ पर जल्दी ही कर दिया जाएगा बोर्ड क्लास पास करते ही। ऐसा एक रोज उसने अपनी मां के मुंह से सुन ही लिया। मीनू ने भी एक रोज कह ही दिया-वंदन ! मेरा दूल्हा तू ही बनेगा। मेरे बाबूजी कह रहे थे। यह देख दीपावली के मेले में मां ने पिताजी का नाम गुदवाया हाथ पर तो मैंने भी तेरा नाम लिखवा दिया। उसने कुर्ते की बांह ऊपर खींच गुदा हुआ नाम दिखाया।
वंदन शर्माता हुआ वहां से भागा। पीछे से मीनू ने जोर से आवाज लगाई, 'ऐ सुन! किसी से कहना मत। मां ने मुझो भी मना किया और यह नाम भी छिपाए रखने को बोला है।'
'होय ! नहीं कहूंगा।' कहता वह हवा हो गया। किसी को न कहूंगा पर अमित से तो दगा नहीं कर सकता न। वह भी तो मुझासे कोई बात नहीं छिपाता। यह सोचकर वह पूरी बात अपने खास दोस्त अमित को सुना आया था।

इन बातों को याद कर उसकी आंखों से अविरल पानी झरने लगा।
मीनू के पिताजी उसे जुकाम भी हो जाता तो दौड़े-दौड़े वैद्य को बुला लाते। आज वे सहारा देने से मुकर गए। बाबूजी जाने कब छूटेंगे। क्या पता छूटेंगे भी कि नहीं। बुआ और उसके बेटे तो यही चाहते हैं कि छूटे ही नहीं, ताकि जमीन पर कब्जा कर ले। मां को गुजरे हुए आज सात दिन हो गए तो बाबूजी को जेल हुए चार दिन।
फुफेरे भाइयों ने बढ़-चढ़कर गवाही दी थी, यह उससे छिपा नहीं था। अमित कह रहा है कि कहीं वे लोग मुझो न मार दे। तभी वह मुझो शहर भाग जाने को कह रहा था। मां - बाप जैसी अमानत खो चुका हूं तो जमीन का क्या करूं पर यह मवेशी हंै कि मानते नहीं। बाहर तक दौड़ाकर आता हूं और फिर खूंटे आ खड़े होते हैं। वह मोटा सा ल_ लेकर सारी गायों को दौड़ा आया था उस दिन नदी तक।

हठात् उसके कानों में आवाज पड़ी, 'बेचारी के बारहवें का धूप देने वाला भी कोई नहीं। उस हत्यारे के कारण। यह कहकर दोनों औरतें उसकी ओर सहानुभूति से देखने लगीं। औरतें आगे निकल ली और वह भीतर आ गया। अब तो टिका रहूंगा बारह दिन। कुछ भी हो जाए। मेरी मां को धूप देकर ही जाऊंगा। तेरह साल के वंदन ने डेकची में दलिया चढ़ाया। घी -गुड़ डालकर मीठा दलिया मां अक्सर बनाया करती। ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी। मां को धूप लगाया और बेटे का फर्ज निभाते हुए अनमने मन से कुछ निवाले आंख, नाक के झारते पानी के साथ खुद ने गले उतारे।

दूसरे दिन भोर होने से पहले उठ गया। मां की पेटी की चाबियां खोजी और वह पोटली निकाली जो मां उससे ही छिपाए रखती थी। चल दिया शहर की ओर। पहुंच गया शहर। नया शहर, नए लोग। किसी को किसी से लेना देना नहीं।

इस मासूम बच्चे को अकेला देख वहीं पास खड़ी एक औरत को समझाते देर नहीं लगी कि यह बच्चा अकेला है और इस अकेले बच्चे को यहां से कोई अगवा कर सकता है। इसी आशंका के कारण वह औरत उसके पास पहुंची और बोली-'शहर में नए आए लगते हो? यहां बहुत उचक्के हैं, ले जाएंगे तुम्हें उड़ाकर।' यह कहती हुई औरत उसे कुछ ही दूर बनी अपनी झाुग्गी में ले गई। ऊपर एक आसमानी तिरपाल बंधा था। तो तीन ओर प्लास्टिक के कट्टे से टंगे थे दीवार के नाम पर। भीतर कीचड़ हो रहा था। वंदन को नजरें दौड़ाता देख औरत बोली-'पानी भर जाता है बरसात में। बस दो महीने की बात है। तुम उस खाट पर बैठो। अब बताओ घर से क्यों भागे? यहां कोई रिश्तेदार हो तो छोड़ आंऊ उनके पास?' औरत का अपनापन देखकर वंदन ने सारी बात कह दी। औरत कहने लगी,'तुम्हारी ही उम्र का मेरे भी एक बेटा है कुंदन, वह कचरा बीनने गया है, अभी आता ही होगा।'

'माई तुमने मुझो शहर में इधर-उधर ठोकरें खाने से तो बचा लिया पर मैं जाऊं कहां? मुझो अपने साथ यहां रहने दो न।' वंदन ने आंखों की कोरों पर जमे खार को पोंछते हुए कहा।
'आज से मेरे एक नहीं दो बेटे हैं।' वंदन को गले लगाती औरत बोली। फिर तो हर रोज सुबह होते ही वंदन भी निकल पड़ता अपने उस मुंह बोले भाई के साथ कचरा बीनने। पर इस काम को करने का उसका दिल नहीं करता। उसे अपनी मां का बेटे के अफसर बनने का सपना जो पूरा करना था। वह अब शहर के कई मोहल्लों से वाकिफ हो चुका था। एक बुक स्टोर पर उसे काम मिल गया। काम के समय काम करता और खाली समय में वह जमकर पढ़ता। उसने बहुत संघर्ष किया। आखिरकार उसकी मां का सपना पूरा हुआ। वंदन आज आई.एस.ऑफिसर बन चुका था।

यह सब बीती बातें और जिंदगी के बारे में सोचते-सोचते आंखें भर आईं। वह अपने गांव लौट आया था। उसने खिड़की से बाहर देखा उसके गांव के लोग किसी निर्दोष को न्याय दिलाने की गुहार करते धरने पर बैठे थे। कौन हंै यह लोग? जानने के लिए वंदन ने बाबू को बाहर भेजा तो पता चला कि जिसे गांव वाले न्याय दिलाना चाहते वह कोई नहीं उसके पिता थे।

Chand Sheikh Desk
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