यह है राजधानी जयपुर का जीरो वेस्ट कैम्पस

कचरे से बनाई जा रही है खाद
पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक पहल
कैम्पस में सिंगल यूज प्लास्टिक पर भी है बैन

By: Rakhi Hajela

Updated: 24 Jul 2020, 06:16 PM IST

राजधानी जयपुर स्थित वन्यजीव और वानिकी प्रशिक्षण संस्थान एक एेसा परिसर बन चुका है जो पूरी तरह से जीरो वेस्ट है कैम्पस है। यानी कैम्पस से निकलने वाले कचरे का निपटान यहीं पर किया जा रहा है। यानि कचरे के निस्तारण में जो लाखों रुपए खर्च होते हैं वह यहां नहीं हो रहे। इससे पर्यावरण सरंक्षण को भी बढ़ावा मिल रहा है। यह सब संभव हुआ है संस्थान के निदेशक एवं भारतीय वन सेवा के वरिष्ठ अधिकारी डॉक्टर एनसी जैन के प्रयासों से। जिन्होंने कुछ ही माह में परिसर को जीरो वेस्ट कैम्पस के रूप में तब्दील करने में सफलता प्राप्त की है।
उठाए यह कदम
कम्पोस्ट पिट में गार्डन वेस्ट
प्रशिक्षण संस्थान की ओर से प्रयास किए गए कि पूरे परिसर में एेसी कोई सामग्री नहीं जाने दें जो वेस्ट में जाए। इसके लिए संस्थान में एेसी सामग्री जो फूल पत्ते और पेड़ पौधों से निकलती है, उसका उपयोग खाद बनाने में किया गया। परिसर में कम्पोस्ट पिट बनाई गई। जिसमें यह सारा सामान डाला जाता है। पिट में गार्डन वेस्ट डालने से २० से २५ दिन में खाद तैयार हो जाती है। संस्थान अपनी नर्सरी में इसी खाद का उपयोग में ले रहा है। जिससे एक पंथ दो काज वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। यहां तक कि छोटे से छोटे लिफाफे और अन्य कागजों को भी वेस्ट में नहीं डाला जाता। जो कागज रिसाइकिल करने या दोबारा उपयोग करने के लायक नहीं हैं उन्हें खाद बनाने के लिए ही उपयोग में लिया जाता है और उन्हें भी इस पिट में ही डाल दिया जाता है। आपको बता दें कि खाद बनाने के लिए परिसर में उन्नत विधियों जैसे नाडेप कम्पोस्ट और वर्मी कम्पोस्ट का उपयोग किया जाता है।

सिंगल यूज प्लास्टिक पर बैन
संस्थान ने अपने परिसर में सिंगल यूज प्लास्टिक को पूरी तरह से बैन कर दिया है। यहां तक संस्थान में आए दिन होने वाली ट्रेनिंग प्रोग्राम्स में भाग लेने वाली प्रतिभागियों और शामिल होने वाले संस्थानों को भी इस संबंध में पहले से ही सूचित कर दिया जाता है कि वह प्लास्टिक की बोतल या कोई अन्य सामान साथ में नहीं लाएं। किसी भी प्रकार की नॉन बायोडिग्रेडेबल वस्तुओं का यथा संभव उपयोग निषिद्ध कर दिया गया है। यहां तक कि संस्थान परिसर में प्लास्टिक के फोल्डर्स और एेसी कोई बुकलेट भी उपयोग नहीं ली जाती जिनका कवर प्लास्टिक का हो।
पत्राचार के लिए ईमेल सेवा
कैम्पस को जीरो वेस्ट बनाने के लिए ऑफिस में पत्राचार का काम भी ईमेल के जरिए किया जाता है। फिर भी यदि कभी कोई कागज उपयोग में आता है तो उसके लिए ऑफिस में स्टाफ ने अपनी अलमारी में अलग से रखा जाता है जिससे उसे रिसाइकिल किया जा सके। कैम्पस में बने हॉस्टल में हर कमरे में दो डस्टबिन रखवाए गए हैं। एक डस्टबिन में बायोडिग्रेडबल वेस्ट सामान जबकि दूसरे में नॉन बायोडिग्रेडबल सामान डाला जाता है। इसमें से बायोडिग्रेडबल वेस्ट मैटेरियल को कम्पोस्टिंग के लिए भेजा जाता है।

यह हो रहा फायदा
: कैम्पस से निकलने वाले कचरे का ठेका अब किसी को देने की आवश्यकता नहीं रहती। एेसे में कचरा डम्प करने पर होने वाली लाखों रुपए का खर्च बच रहा है।
: कैम्पस की साफ सफाई के लिए मैनपावर की जरूरत नहीं है।
: कम्पोस्ट पिट में कचरे से खाद बन रही है। इसी खाद का उपयोग नर्सरी में किया जा रहा है। संभावना है कि भविष्य में कचरा से बनाए गए खाद से भी आमदनी भी हो सकेगी।
: कम संसाधन में सफाई व्यवस्था में भी सुधार हुआ है। कैम्पस में इधर उधर कचरा पड़ा नहीं मिलता।

इनका कहना है,
मैं इस क्षेत्र में सालों से काम कर रहा हूं। अगर हम अपने कैम्पस को जीरो वेस्ट के रूप में तब्दील करवाते हैं तो हम पर्यावरण सरंक्षण तो कर ही रहे हैं साथ ही सरकार का लाखों रुपया भी बचा रहे हैं। मेरा प्रयास है कि मैं इस इंस्टीट्यूट को एक एेसे कैम्पस में रूप में तब्दील कर संकू जिससे दूसरों को प्रेरणा मिल सके।
डॉ. एनसी जैन, निदेशक,
वन्यजीव एवं वानिकी प्रशिक्षण संस्थान, जयपुर।

Rakhi Hajela Desk
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