साक्षरता की अलख जगाने वाले खुद अंधेरे में , कोई बकरी चरा रहा तो कोई सब्जी का ठेला लगाने पर मजबूर

साक्षरता की अलख जगाने वाले खुद अंधेरे में
विश्व साक्षरता दिवस आज

By: Rakhi Hajela

Published: 08 Sep 2021, 01:33 PM IST


जयपुर।
राज्य में साक्षरता का दीप प्रज्वलित करने वाले 17 हजार प्रेरक (17 Thousand prerak) अंधेरे में जीवन जीने वाले को मजबूर हैं। साक्षर भारत मिशन (literate India mission) के तहत संविदा के आधार पर प्रतिमाह 2 हजार रुपए का मानदेय पर सेवा करने वाले प्रेरकों को सरकार बाहर का रास्ता दिखा चुकी है। ऐसे में अब यह गरीबी में दिन काटने को मजबूर है। कोई सब्जी की रेहड़ी लगा रहा है तो कोई बकरी चराकर परिवार का पेट भरने की कोशिश कर रहा है।

बच्चों को पढ़ाना है, बेच रही सब्जी
हनुमानगढ़ जिले के ब्लॉक भादरा के गांव भिरानी निवासी सतवीर वर्मा ने प्रेरक के रूप में 2007 से मार्च 2018 तक अपनी सेवाएं दीं लेकिन साक्षर भारत मिशन बंद होने के साथ ही इनका रोजगार छूट गया। परिवार में पत्नी के अलावा दो छोटे बच्चे भी हैं। जब परिवार का पेट भरने के भी लाले पड़े गए तो मजबूरन रेहड़ी लगाकर सब्जी बेचने का काम शुरू किया। सब्जी बेच कर जो कमाई होती है उसी के परिवार की गुजर बसर हो रही है। सतवीर कहते हैं मजबूरी जो ना करवाए कम है। सरकार ने सारी आस तोड़ दी कोई और रास्ता बचा ही नहीं था।

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कर रहे ई मित्र सेंटर पर 1500 रुपए नौकरी
सिरोही के ब्लॉक रेवदर स्थित गांव भटाणा के अर्जुन राम ने अपने जीवन के 15साल प्रेरक के रूप में महात्मा गांधी सार्वजनिक पुस्तकालय में दिए। कभी सोचा नहीं था कि 1500 रुपए में ई मित्र सेंटर पर नौकरी करनी पड़ी लेकिन क्या करते। साक्षर भारत कार्यक्रम बंद होने के बाद शिक्षा विभाग ने पढऩा लिखना कार्यक्रम में भी प्रेरकों को काम पर नहीं रखा। अर्जुन का कहना कि सरकार के घोषणा पत्र के मुताबिक संविदा कर्मियों को नियमित किया जाना था लेकिन नियमित करना तो दूर बकाया मानदेय तक नहीं दिया गया। परिवार चलाना है इसलिए एक ईमित्र सेंटर पर काम कर रहा हूं।

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बकरी चराना बना मजबूरी
उदयपुर के ब्लॉक खेरवाड़ा की रीना देवी बेरोजगार होने के बाद से जंगल में बकरियां चराकर परिवार का भरण पोषण कर रही हैं। इतना ही नहीं आसपास के घरों में साफ सफाई के काम के साथ मजदूरी भी करती हैं जिससे पति का हाथ बंटा सकें। पति की छोटी सी दुकान है और परिवार में तीन बच्चे हैं, सास ससुर हैं। रीना कहती हैं परिवार का पेट भरना है काम तो करना ही होगा जब साक्षर भारत मिशन में प्रेरक लगे थे तो लगा था कि अब जीवन सुधर जाएगा लेकिन कुछ नहीं हुआ। सरकार ने हमारी सुध तक नहीं ली।

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हो रहे ओवरएज कैसे मिलेगी नौकरी
उदयपुर जिले के ब्लॉक झाड़ोल के बाबूलाल भी बेरोजगार होने के बाद से सब्जी बेच रहे हैं। उनका कहना है कि जब प्रेरक के रूप में नियुक्ति मिली तो सोचा था कि आज संविदा पर हैं कल स्थाई हो जाएंगे।इसी के चलते कोई और नौकरी का प्रयास तक नहीं किया। अब ओवर एज होने जा रहे हैं कहीं दूसरी नौकरी भी नहीं मिलेगी। सरकार ने हम 17 हजार प्रेरकों के सपनों पर कुठाराघात किया है। अगर स्थाई नहीं भी करना था तो कम से कम संविदा पर रखा जाना चाहिए था लेकिन ऐसा भी नहीं किया। हमारा मानदेय भी बकाया है वह भी आज तक नहीं दिया गया।

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ऐसे बंद हुई योजना
आपको बता दें कि देश के 50 फीसदी से कम महिला साक्षरता वाले जिलों में अंतरराष्ट्रीय महिला साक्षरता दिवस पर 8 सितम्बर 2009 को राजस्थान के कोटा को छोड़ सभी जिलों में साक्षर भारत अभियान लागू किया गया। 2001 की जनगणना को आधार माना गया। इसके तहत प्रदेश के 17 हजार प्रेरकों ने 7500 लोक शिक्षा केंद्र पर नौ साल तक असाक्षर महिला पुरुषों को साक्षर करने का दायित्व निभाया। 30 मार्च 2018 को यह अभियान समाप्त कर दिया गया और साथ ही समाप्त हो गया इन 17 हजार प्रेरकों का अनुबंध। जिससे इनकी नौकरी पर संकट खड़ा हो गया। सबसे महत्वपूर्ण है कि महज दो हजार रुपए के मासिक मानदेय पर प्रति पंचायत दो प्रेरक एक पुरुष और एक महिला प्रेरक कार्यरत थे। जो नवसाक्षरों को साक्षर बनाने में जुटे थे।
1985 से कर रहे थे काम
इससे पूर्व प्रदेश में निरक्षरता के कलंक को मिटाने के लिए 1985 में प्रौढ़ शिक्षा योजना लाई गई थी। फिर इसके स्थान पर अनौपचारिक शिक्षा लाई गई। जिसमें प्रेरकों को 105 रुपए मासिक मानदेय दिया जाता था। 31 मार्च 2001 में इसे बंद कर सतत शिक्षा और साक्षरता कार्यक्रम शुरू किया गया। इसके लिए प्रदेश में साक्षरता केंद्र बनाकर प्रेरकों और सहप्रेरकों को लगाया गया। इसके बाद अप्रेल 2011 में साक्षर भारत के नाम से इस कार्यक्रम को शुरू किया
गयाए जिसमें हर ग्राम पंचायत में एक महिला और एक पुरुष प्रेरक को नियुक्ति दी गई। कार्यक्रम के तहत प्रेरकों को 700 रुपए मासिक मानदेय के रूप में दिए जाते थे। इसी बीच तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने 10 जुलाई 2003 को दौसा जिले के बनियाना ग्राम पंचायत से महात्मा गांधी सार्वजनिक पुस्तकालय का उद्घाटन किया और इसे चलाने की जिम्मेदारी प्रेरकों को सौंपी गई। आपको बता दें कि इसके लिए उन्हें कोई मानदेय नहीं दिया जाता था। प्रेरक बिना किसी मानदेय के इन पुस्तकालयों का संचालन करते थे। मार्च 2018 में साक्षर भारत अभियान को भी बंद कर दिया गया।
दो साल से मानदेय भी बकाया
2018 में साक्षर भारत मिशन बंद होने से प्रत्येक शिक्षा केंद्र पर एक पुरुष व एक महिला प्रेरक की सेवाएं भी समाप्त कर दी गईं, लेकिन उनका प्रतिमाह केंद्र सरकार से मिलने वाला दो हजार रुपए का मानदेय अब तक बकाया है। बताया जाता है कि प्रदेश में करीब 17 हजार प्रेरकों का मानदेय अटका हुआ है। करीब दो साल के बकाया मानेदय के लिए प्रेरकों ने कई बार ज्ञापन दिएए लेकिन उन्हें अग्रेषित करने के अतिरिक्त अधिकारियों ने अन्य कोई रुचि भी नहीं दिखाई। फरवरी 2020 में एक बार फिर सरकार ने प्रेरकों का बकाया भुगतान करने के आदेश तो जारी किए लेकिन भुगतान की प्रक्रिया शुरू नहीं हो पाई।

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Rakhi Hajela Desk
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