इको-फ्रेंडली साधनों से प्लास्टिक मुक्त शहर बना रहीं हैं चेन्नई की सहेलियां

इको-फ्रेंडली साधनों से प्लास्टिक मुक्त शहर बना रहीं हैं चेन्नई की सहेलियां

Mohmad Imran | Updated: 20 Jul 2019, 06:48:24 PM (IST) Jaipur, Jaipur, Rajasthan, India

इको-फ्रेंडली साधनों से प्लास्टिक मुक्त शहर बना रहीं हैं चेन्नई की सहेलियां
-घर में इस्तेमाल होने वाली आम ज़रूरत की चीज़ों को भी इको-फ्रेंडली संसाधनों में बदल रही हैं

हर साल समुद्र में खपाई गई प्लास्टिक के कारण 1 लाख से ज्यादा स्तनधारी जीव, मछलियां, शार्क, डॉल्फिन, व्हेल, सील, समुद्री कछुए और अन्य समुद्री जीव मारे जाते हैं। इतना ही नहीं करीब 10 लाख समुद्री पक्षी भी हमारी प्लास्टिक की चपेट में आने या प्लास्टिक से बने सामानों में फंस जाने के कारण दम तोड़ देते हैं। प्लास्टिक से जलीय जीव-जंतुओं के संहार की ये एक बानगी भर है। शहरों में भी कचरे के ढेर से आवारा पशु प्लास्टिक की थैलियां खाकर बीमार पड़ जाते हैं और अंत में दम तोड़ देते हैं।

 

प्लास्टिक से होने वाली इस भयावह परिणीति को रोकने के लिए चेन्नई की दो सहेलियों वीणा बालकृष्णनन और सुदर्शना पई ने प्लास्टिक-मुक्त दुनिया का सपना देखा है। इसे पूरा करने के लिए दोनों पर्यावरण के अनुकूल प्लास्टिक विकल्पों के रूप में इको-फे्रंडली उत्पाद बना रही हैं। इसमें कागज से बने पेन से लेकर बांस से बने टूथब्रश तक शामिल हैं। दोनों ने बीते साल जून में 'एवरवाड्र्स इंडिया' के नाम से एक स्टार्टअप की शुरुआत की है जहां दैनिक उपयोग में आने वाली प्लास्टिक के सामानों के 40 से ज्यादा इको-फ्रेंडली विकल्प उपलब्ध हैं।


प्लास्टिक के विकल्प अधिक महंगे
वीणा और सुदर्शना का कहना है कि प्लास्टिक का ज्यादा इस्तेमाल इसलिए हो रहा है क्योंकि यह सस्ती है। जबकि इसके विकल्प के रूप में मिलने वाले जूट या कपड़े के थैले महंगे हैं। कागज के लिफाफे में भी हर सामान नहीं लाया जा सकता। घर में टूथब्रश से लेकर पेन और बैग तक प्लास्टिक से बने हुए हैं। इन छोटे लेकिन उपयोगी सामानों के बिना दैनिक जीवन की कल्पना भी मुश्किल है। लेकिन यह न केवल पर्यावरणविदों के लिए बल्कि सरकारों और नीति निर्माताओं के लिए भी एक बड़ी चिंता का विषय है। क्योंकि प्लास्टिक बायोडिग्रेडेबल नहीं है इसलिए इससे गंभीर स्तर का प्रदूषण होता है। इसका सामाधान यही है कि हम ऐसे उत्पादों का उपयोग करें जो आसानी से नष्ट हो सकें। लेकिन यह एक चुनौती बनी हुई है क्योंकि ऐसे उत्पाद आमतौर पर प्लास्टिक की तुलना में अधिक महंगे हैं।

 

प्लास्टिक कचरा है जानलेवा
ब्रिटेन के प्लायमाउथ विश्वविद्यालय के अनुसार, प्लास्टिक हर साल 700 समुद्री जीव-जंतुओं की प्रजातियों को प्रभावित करता है। कुछ अध्ययनों का मानना है कि प्लास्टिक से हर साल 10 करोड़ समुद्री स्तनधारी मारे जाते हैं। प्लास्टिक की एक बोतल को नष्ट होने में 450 साल और प्लास्टिक के तंतुओं से बने जाल को नष्ट होने में 600 साल का समय लगता है। एक अनुमान के मुताबिक दुनिया भर के महासागरों में 10 करोड़ टन प्लास्टिक मौजूद है।

 

फैशन इंडस्ट्री से मिली प्रेरणा
दोनों फैशन तकनीक की छात्रा थीं इसलिए फैशन इंडस्ट्री में उत्पादित होने वाले गैर-बायोडिग्रेडेबल औद्योगिक कचरे के बारे में भली-भांति जानती थीं। एवरवाड्र्स इंडिया शुरू करने की प्रेरणा उन्हें इसी से मिली थी। वीणा बताती हैं कि पढ़ाई के दौरान उन्हें हमेशा स्थानीय सामग्री का उपयोग करने, स्थानीय अर्थव्यवस्था को एकीकृत करने और कार्बन एत्सर्जन को कम करने के लिए प्रेरित किया जाता है। आज दशकों पहले इस्तेमाल की जाने वाली चीजें फिर से ट्रेंड में आ रही हैं। हमारी कंपनी के माध्यम से, हम शारीरिक रूप से विकलांग, आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के लोगों और कारीगरों के लिए भी रोजगार पैदा कर रहे हैं।

 

क्या-क्या बनाती है दोनों की कंपनी
एवरवाड्र्स ग्रेफाइट और अखबार के मिश्रण से पेंसिल बनाती हैं जिसकी कीमत 49 रुपये है। जबकि इनके टूथब्रश बांस से बने होते हैं और बांस फाइबर से। एवरवाड्र्स फिलहाल 40 उत्पाद बनाता है जो रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक के उत्पादों के लिए पर्यावरण के अनुकूल विकल्प हैं। इन सभी की कीमत 49 रुपए से शुरू है और अधिकतम 799 रुपये तक हैं। दोनों उप्ताद की गुणवत्ता जांचने के लिए खुद भी इन्हें उपयोग करती हैं। इसके अलावा वे टॉयलेट-बाथरूम में उपयोग किए जाने वाले स्क्रब, ब्रश, बॉटल क्लिीनर्स भी नारियल के रेशे छिलके से बनाते हैं। इतना ही नहीं दोनों अनुपयोगी कपास का उपयोग कर नैपकिन, पाउच बनाते हैं।

 

अन्य उत्पादों में प्राकृतिक तेल से बाम और नहाने के लिए खास बाथ साल्ट बनाते हैं। मासिक धर्म के लिए भी दोनों ने खास कप बनाए हैं जो बिल्कुल इको-फ्रेंडली हैं। इसकी कीमत 590 रुपए है। वीणा और सुदर्शना काऊफी स्क्रब बनाने के लिए कॉफी ग्राउंड का इस्तेमाल करती हैं। ऐसे ही ड्रॉस्टिंग बैग और अन्य ज़रूरी सामान बनाने के लिए कपड़े को स्क्रैप करते हैं। इसके अलावा नारियल के छिलके का उपयोग चायपत्ती, कटलरी और साबुन के अलावा व्यंजन बनाने के लिए भी किया जाता है। दोनों कार्बन फुटप्रिंट्स को कम करने का प्रयास कर रही हैंं। दोनों कार्यशाला का आयोजन भी करती हैं जहां वे जीरो वेस्ट लिविंग का संदेश भी देती हैं।

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