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जयपुर

26 वें हफ्ते में दो प्रीमेच्योर बच्चों ने लिया जन्म, सीरियस कंडीशन में किया गया रैफर, डॉक्टर्स ने बचाई जान

दोनों केस में बच्चे प्रीमेच्योर पैदा हुए। जिससे उनकी हालत गंभीर थी।

जयपुरJun 23, 2024 / 09:33 pm

Manish Chaturvedi

जयपुर। राजधानी जयपुर में प्रेग्नेंसी से जुड़े दो ऐसे केस सामने आए है। जिनमें सातवें महीने यानी की सिर्फ 26 वें हफ्ते में ही दो बच्चों ने अलग अलग जगह जन्म लिया। दोनों केस में बच्चे प्रीमेच्योर पैदा हुए। जिससे उनकी हालत गंभीर थी। क्योंकि इस समय न तो नवजातों का श्वसन तंत्र पूरी तरह विकसीत हुआ था और न ही शरीर के अन्य अंग पूरी तरह काम कर रहे थे। यहां तक की ब्लड प्रेशर मेटेंन करना भी डॉक्टर्स के लिए चुनौती बन गया था। एक बच्चा जयपुर में जन्मा तो दूसरा बांदीकुई में। दोनों केस को बाद में गंभीर हालत में जयपुर रैफर किया गया। जहां पर सी के बिरला हॉस्पिटल में डॉक्टरों ने दोनों केस को संभाला।
डॉ जेपी दाधीच ने बताया कि जब दोनों शिशुओं को यहां रैफर किया गया तो हमने उन्हें तुरंत वेंटीलेटर पर लिया। क्योंकि उन्हें सांस लेने में दिक्कत हो रही थी। उनके अंग भी पूरी तरह से विकसित नहीं थे। फेफड़ों को विकसित करने के लिए कुछ जीवनरक्षक दवाएं दी गई। शिशुओं को करीब 70 दिन तक अलग अलग तरीकों से रेस्पिरेटरी सपोर्ट दिया गया। उन्होंने बताया कि इस दौरान शिशु की खुराक को भी संतुलित बनाए रखना बड़ी चुनौती थी। क्योंकि 26 हफ्ते में शिशु की आंतें पूरी तरह से विकसित नहीं होती हैं। इसलिए शुरू में माँ का दूध कम मात्रा में दिया गया एवं उन्हें कई हफ्तों तक नसों के माध्यम से भी खुराक दी गई। कुछ समय बाद शिशुओं को मां का दूध ज्यादा मात्रा में दिया जाने लगा और नसों के माध्यम से दी जाने वाली खुराक धीरे धीरे बंद कर दी गई।
एक और चुनौती शिशुओं का कैल्शियम व फॉस्फोरस सही स्तर पर बना कर रखना एवं उनकी हड्डियों को सुदृढ़ बना कर रखना था। विभिन प्रकार के इंजक्शन व सप्लीमेंट के द्वारा इसे सफलता पूर्वक किया गया। एक शिशु को जांघ पर हर्निया भी हुआ। जिसे सर्जरी के द्वारा ठीक किया गया।
डॉ. ललिता कनोजिया ने बताया कि इतने कम समय में शिशु के शरीर में अपने आप खून नहीं बन पाता है। इसीलिए उन्हें बीच-बीच में कई बार रक्त भी चढ़ाया गया। वे अपना ब्लड प्रेशर भी अपने आप मेंटेन नहीं कर पा रहे थे। जिसे डॉक्टर्स ने दवाओं के माध्यम से नियंत्रित किया। इस दौरान शिशुओं की आंखों की जांच करने पर सामने आया कि उनकी आंखों में रैटीनोपैथी ऑफ प्रीमेच्योरिटी नामक बीमारी भी थी। जिसका लेजर थैरेपी से इलाज किया गया।
जब दोनों बच्चे 100 दिन के हुए और उनका वजन 1.7 किलो तक आ गया तो उन्हें हॉस्पिटल से डिस्चार्ज कर दिया गया। डिस्चार्ज के वक्त शिशु पूरी तरह से मां का दूध पी रहे थे और अब पूरी तरह से स्वस्थ हैं।

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