अपनी सूझबूझ से बनें शेयर बाजार के बादशाह

11 साल की उम्र में ही जेब खर्च निकालने के लिए उन्होंने घर-घर जाकर पत्र-पत्रिकाएं बांटना शुरू किया। आज उनकी गिनती दुनिया के अरबपतियों में होती है। वे सफल इंवेस्टर और एंटरप्रेन्योर होने के साथ ही मोटिवेशन स्पीकर भी है।

By: Archana Kumawat

Published: 18 Apr 2020, 06:42 PM IST

इस व्यक्ति का जन्म ऐसे परिवार में हुआ, जहां उन्होंने बचपन में ही समझ लिया था कि शेयर बाजार की हलचल क्या है। पिता शेयर बाजार में निवेशक और सलाहकार के रूप में काम किया करते थे। पिता का काम उन्हें बहुत मजेदार लगा। बचपन में ही इन्होंने ठान लिया कि बड़ा होकर शेयर बाजार में ही कारनामे दिखाने हैं। निवेश करने की कला तो उन्हें पिता से विरासत में ही मिल गई थी। 11 साल की उम्र में ही जेब खर्च निकालने के लिए उन्होंने घर-घर जाकर पत्र-पत्रिकाएं बांटना शुरू किया। कुछ दिनों बाद उन्होंने अखबार के साथ ही खाने-पीने की चीजें एवं गोल्फ बॉल और स्टाम्प बेचना भी शुरू कर दिया था। इस आमदनी का उपयोग उन्होंने शेयर बाजार में किया। पैसे कमाने में अब मजा आने लगा था। केवल 13 साल की उम्र में ही उन्होंने अपना पहला आयकर रिटर्न भर दिया था।
नहीं मिला हॉवर्ड में प्रवेश
वॉशिंगटन डीसी से हाई स्कूल करने के बाद इन्होंने पेंसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया लेकिन यहां केवल दो साल ही पढ़ाई की। इसके बाद नेब्रास्का लिंकन यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन पूरा किया। अपने बिजनेस ज्ञान को बढ़ाने के लिए उन्होंने हावर्ड विश्वविद्यालय में आवेदन किया लेकिन यूनिवर्सिटी की ओर से उनकी एडमिशन एप्लीकेशन को रद्द कर दिया गया। आगे चलकर उन्होंने कोलंबिया बिजनेस स्कूल से इकॉनोमिक्स में एमएस की डिग्री ली। यहां इन्हें स्टॉक मार्केट की बारीकियों को समझने में मदद मिली।
शेयर बाजार की दुनिया में रखा कदम
कोलंबिया में उनकी मुलाकात प्रभावशाली मूल्य निवेशक बेंजामिन ग्राहम से हुई। ग्राहम के व्यक्तित्व से ये इतना अधिक प्रभावी हुए कि उनकी कंपनी ग्राहम-न्यूमैन के लिए काम करने लगे। नौकरी के दौरान उन्हें यह समझने में मदद मिली कि शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव को समझने के लिए किस तरह की तकनीक का उपयोग किया जाता है लेकिन उन्होंने दो साल बाद ही कंपनी से इस्तीफा दे दिया। ग्राहम के रिटायर्ड होने के बाद अब कंपनी से जुड़े रहने में उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं थी और वे ओमाह चले गए। यहां मित्र, परिवार और सहयोगियों में सीमित निवेश फण्ड आरंभ किया। यहां उन्होंने एक निवेश फर्म बनाई।
फिर पलटकर नहीं देखा कभी
अपनी सूझबूझ और रणनीति से उन्होंने फंड निवेशकों को 10 साल में ही 10 गुना रिटर्न दिया। इसके बाद इन्होंने कभी कॅरियर में पीछे मुडक़र नहीं देखा। 1962 में उनकी कंपनी के शेयर्स की नेटवर्थ 7 करोड़ 17 लाख डॉलर थी। तीन साल बाद ही उन्होंने शेयर कंपनी बर्कशायर हैथवे की कमान अपने हाथों में ले ली थी। उनके नेतृत्व में इस कंपनी ने काफी कामयाबी हासिल की। इससे पहले कंपनी डुबने के कगार पर थी। इनके कौशल में कंपनी को कामयाबी के एक नए मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया था। यह व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि निवेश की दुनिया के बादशाह वॉरेन बफेट है। आज उनकी गिनती दुनिया के अरबपतियों में होती है। वे सफल इंवेस्टर और एंटरप्रेन्योर होने के साथ ही मोटिवेशन स्पीकर भी है। साथ ही उन्हें 21वीं सदी का सबसे दानबीर माने गए। उन्होंने अपनी कुल संपति का लगभग 85 फीसदी हिस्सा मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन के नाम कर दिया।

Archana Kumawat Desk
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