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Three Years Of Rajasthan Government: राइट टू हैल्थ का क्या हुआ सरकार?

Three Years Of Rajasthan Government:

तीन साल में भी नहीं बना ‘राइट टू हैल्थ कानून‘
143 की जगह 13 जनता क्लिनिक ही शुरू
सिर्फ दावों में रहे सरकार के वादे
तीन साल के कार्यकाल में भी नहीं आए धरातल पर

जयपुर

Updated: December 18, 2021 12:24:44 pm

प्रदेश की कांग्रेस सरकार जब दिसंबर 2018 में सत्ता में आई तब घोषणापत्र के अनुसार राज्य के प्रत्येक व्यक्ति तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने के लिए राइट टू हैल्थ कानून लाने का दावा किया गया, लेकिन तीन साल बाद भी यह कानून धरातल पर नहीं आ पाया है। और भी कई योजनाएं कोरोना महामारी की आड़ में सरकार का चिकित्सा महकमा पूरी नहीं कर पाया है।
What happened to the Right to Health government?
What happened to the Right to Health government?
साल 2019 में सरकार का एक साल पूरा होने के अवसर पर भी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा था कि राजस्थान ऐसा पहला राज्य होगा, जहां पर राइट टू हैल्थ कानून लाया जा रहा है। इसका मसौदा तैयार किया जा रहा है और जल्द ही यह विधानसभा में पास हो सकेगा। उसके बाद से अब तक इस कानून पर दोबारा चर्चा नहीं हुई हैं।
इसे अब तक विधानसभा के पटल पर नहीं लाया गया है, पास करना तो दूरी की बात है। कहा जा रहा था कि इस कानून की मदद से गरीब से गरीब व्यक्ति भी जरूरत पड़ने पर प्राइवेट अस्पताल में भी निशुल्क इलाज ले पाएगा। हालांकि चिरंजीवी स्वास्थ्य बीमा योजना से इस कानून की चर्चा को ढकने की कवायद की गई है।
इस बीमा योजना में भी प्रत्येक लाभार्थी परिवार को कैशलेस इलाज के दावे सरकार कर रही है। जबकि प्राइवेट अस्पतालों में आज भी इस योजना का लाभ लेने के लिए आम लोगों को भटकना पड़ रहा है। यह योजना इसी साल एक मई से शुरू की गई है। इसमें अब तक 13,334,656 परिवारों का पंजीकरण हो चुका है।
सिर्फ 13 जनता क्लिनिक
अन्य निशुल्क स्वास्थ्य सेवाओं की बात करें सरकारी अस्पतालों में मुफत दवाइयों की योजना तो गहलोत सरकार के पिछले कार्यकाल से ही शुरू कर दी गई थी। अब इसमें दवाइयों की संख्या बढ़ाकर 700 से ज्यादा दवाइयों को निशुल्क योजना में शामिल किया गया है। वहीं राज्य के हर वार्ड में जनता क्लिनिक खोलने का दावा करने वाली सरकार सिर्फ 13 जनता क्लिनिक ही शुरू कर पाई है। इनमें से 12 जयपुर में है तो एक जालौर जिले में है। इस साल राज्य में 143 जनता क्लिनिक खोले जाने थे। जबकि बजट साल खत्म होने में अब तीन महीने ही रह गए हैं और 143 जनता क्लिनिक का वादा पूरा नहीं किया जा सका है।
यह सुविधाएं भी अधूरी
राज्य के सबसे बड़े अस्पताल एसएमएस में टेली मेडिसिन की सुविधा शुरू कर दी गई, इसके जरिए एक लीवर ट्रांसप्लांट कर सुर्खियां भी बटोरी गई, लेकिन यह सुविधा भी बहुत काम ना आ सकी। टेली मेडिसिन सेवा आज भी रफतार नहीं पकड़ सकी है। इसके प्रचार-प्रसार की कमी के कारण यह बस कहने को सुविधा रह गई। इसका एक बड़ा कारण विशेषज्ञ डॉक्टर्स की कमी भी है। राज्यभर के अस्पतालों में चिकित्सकों और अन्य स्टाफ की कमी साफ दिखाई देती है। राज्य सरकार इस साल 5 हजार चिकित्सकों की भर्ती के दावे कर रही है, इसके बावजूद अस्पतालों में मरीजों को उपचार के लिए घंटों इंतजार करना पड़ रहा है।
दूरस्थ इलाकों को अभी भी सेवाओं की दरकार
घोषणा पत्र में हर गांव तक उच्च स्तरीय स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को क्रमोन्नत भी करना था। वहीं उप जिला अस्पतालों की संख्या भी बढ़ानी थी। अभी 33 जिलों में सिर्फ 19 उप जिला अस्पताल ही हैं। कोरोना जैसी महामारी के बाद भी इन अस्पतालों और उप जिला केंद्रों की सुविधाएं नहीं बढ़ाई गई हैं। सरकार भले ही कोरोना की संभावित तीसरी लहर के लिए पर्याप्त ऑक्सीजन के दावे कर ले, लेकिन रूटीन के मरीजों को इलाज के लिए कई सारी सुविधाओं की आज भी दरकार है। सरकार को उस मूलभूत स्वास्थ्य अधिकार को पूरा करने को प्राथमिकता देनी होगी।

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