जिंदगी बचाने की मुहिम में महिलाएं भी आगे, न उम्र, न पद बना रुकावट, बन गईं महादानी

जिंदगी बचाने की मुहिम में महिलाएं भी आगे, न उम्र, न पद बना रुकावट, बन गईं महादानी

Priyanka Yadav | Publish: Jun, 14 2018 12:48:08 PM (IST) Jaipur, Rajasthan, India

इन्होंने बढ़-चढ़कर निभाई सामाजिक सरोकार में भूमिका

जयपुर. महिला इंसान की जननी तो है ही, अब गंभीर मरीजों और घायलों के लिए रक्तदान कर जीवनदायिनी भी बन रही है। ब्लड बैंकों से लगातार जुड़कर रक्तदान करने वाली और रक्तदान जागरूकता बढ़ा रही महिलाएं बड़ी संख्या में है। हर जाति और धर्म की महिलाओं की सूची शहर के ब्लड बैंकों में है। इनमें पुलिस अधिकारी, नामी जनप्रतिनिधी, समाजसेवी और गृहिणियां भी शामिल हैं।

 

इन्होंने बढ़-चढ़कर निभाई सामाजिक सरोकार में भूमिका
महादान को बढ़ाने में तिहरी भूमिक

शास्त्री नगर निवासी कमल राठौड़ वर्ष 2004 से रक्तदान से जुड़ी हैं। अब तक 15 बार वे रक्तदान कर चुकी हैं। अपने स्कूल के माध्यम से वे हर साल रक्तदान शिविर आयोजित करती हैं।

 

खिदमत के साथ यह फर्ज भी

सांगानेर निवासी नईद खान अब तक 6 बार रक्तदान कर चुकी हैं। उनके पति जयपुर के एक नामी अस्पताल में डॉक्टर हैं। वे कुछ समय से लगातार हर महीने रक्तदान कर रही हैं। साथ ही वे समाजसेवा से भी जुड़ी हुई हैं।

 

पूरा परिवार कर रहा दान

पूर्व महापौर ज्योति खंडेलवाल अब तक 19 बार रक्तदान कर चुकी हैं। परिवार की ओर से उनकी ननद शशिकला की स्मृति में हर वर्ष रक्तदान शिविर लगाते हैं। उनके पति भी इस मुहिम में उनके साथ हैं। वे भी अब तक 40 से अधिक बार रक्तदान कर चुके हैं।

 

मां-बेटी दोनों ही रक्तदानी

बनीपार्क के अग्रवाल परिवार की 22 वर्षीय साक्षी अग्रवाल और उनकी मां 47 वर्षीय कौशल्या अग्रवाल लगातार रक्तदान कर रही हं। कौशल्या 10 साल में 10 बार रक्तदान कर चुकी है। बेटी साक्षी भी ५ साल से लगातार रक्तदान कर रही है। साक्षी अग्रसेन ब्लड बैंक से जुड़ी हैं। पिता भी लगातार रक्तदान कर रहे हैं।

 

हालत देख विचलित, लग गईं सेवा में

मनीषा शांडिल्य ने वर्ष 1994 से रक्तदान शुरू किया। डॉक्टर पति नागौर में नारी उन्मूलन परियोजना में कार्यरत थे। खून के अभाव में महिलाओं को दम तोड़ते देखा है। इससे विचलित शांडिल्य ने पति के साथ खून का महत्व समझाया। वे 20 बार रक्तदान कर चुकी हैं।

 

परिवार से मिला माहौल

मिलाप नगर निवासी कल्पना अग्रवाल अब तक 10 बार रक्तदान कर चुकी हैं। उनके पति ब्लड बैंक सेवा से जुड़े हैं। घर में रक्तदान के प्रति सकारात्मक माहौल व पति भी नियमित रक्तदान करते हैं।

 

डॉक्टर भी कर रहीं नियमित रक्तदान

जवाहर सर्किल के पास रहने वाली डॉ. अंशू एस कोटिया कुछ समय से लगातार रक्तदान कर रही हैं। उनका कहना है कि आमतौर पर डॉक्टर्स की जीवन शैली काफी व्यस्त होती है। लेकिन उन्होंने रक्तदान का प्रण किया।

 

थैलेसीमिया पीडि़त मासूमों की कहानी

कसी के दान से ही मिला इन्हें जीवन

रक्तदान का महत्व समझना है तो थैलेसीमिया पीडि़त बच्चे से मिल लीजिए, जिसकी जिंदगी में एक दो नहीं, बल्कि सैंकड़ों बार रक्त चढ़ चुका है। ये ऐसे बच्चे हैं, जिन्हें महीने में एक या दो बार या हर सप्ताह ब्लड चढ़ाना पड़ता है। वो जिंदा ही इसलिए हैं कि लोग रक्तदान कर रहे हैं।

 

साहिल: रक्तदाताओं का आभार, जल्द घर लौटेगा

साहिल का बोनमैरो ट्रांस्प्लांट हो चुका है। वो अब जल्दी घर लौटने वाला है। नन्हे से बच्चे को मलाल है कि वो उन लोगों से कभी मिल नहीं सका जिनका रक्त उसके काम आया। बोनमैरो ट्रांसप्लांट के समय भी उसे प्लेटलेट्स डोनेट की गई थी। वो उन सभी लोगों को धन्यवाद कहना चाहता है, जिन्होंने कभी न कभी रक्तदान किया है। साहिल की सभी स्वस्थ्य लोगों से अपील है कि वो रक्तदान करें, ताकि उसके जैसे बच्चे जी सकें।

 

सिद्धार्थ एक हजार बार चढ़ चुका रक्त

राजधानी के जवाहर सर्किल स्थित प्रेम निकेतन परिसर स्थित साउथ ईस्ट एशिया इंस्टीट्यूट फॉर थैलेसीमिया (एसइएआइटी ) के आइसीयू में कई बच्चे भर्ती हैं। इस ट्रांसप्लांट के सफल होने पर ये सामान्य जिदंगी जी सकेंगे। इन्हें में से एक हैं 11 साल का सिद्धार्थ। सिद्धार्थ के पिता अशोक रक्तदाताओं का आभार जताते जताते रो पड़े। उन्होंने बताया कि सिद्धार्थ जब साढ़े चार महीने का था, तब से उसे ब्लड चढ़ रहा है। अब तक 1000 बार उसे ब्लड चढ़ चुका है। एसइएआइटी की डॉक्टर प्रिया के अनुसार ज्यादा से ज्यादा ब्लड डोनेशन की जरूरत है।

 

राजस्थान की धरती को दिया धन्यवाद

यहीं पर महाराष्ट्र के अमरावती से आई पूनम मिश्रा के दो बच्चे हैं। दोनों को थैलेसीमिया है। वो राजस्थान की शुक्रगुजार हैं, जहां उसके बच्चों का बोनमैरो ट्रांसप्लांट हो रहा है। साथ ही सभी रक्तदाताओं को भी वो बजार-बार धन्यवाद कहतीं नहीं थकती।

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