भाषाई गुलामी से मुक्त होने का वक्त है, क्योंकि विश्व का सिरमौर है हमारी हिंदी

किसी भी स्वतंत्र देश की एक भाषा होती है। भाषा उस देश का न सिर्फ गौरव है बल्कि उस राष्ट्र की एकता और स्थायित्व का अनिवार्य अंग है। महात्मा गांधी ने भी कहा है कि राष्ट्र भाषा के बिना एक देश गूँगा होता है।

By: kamlesh

Updated: 10 Jan 2021, 03:36 PM IST

जयपुर। किसी भी स्वतंत्र देश की एक भाषा होती है। भाषा उस देश का न सिर्फ गौरव है बल्कि उस राष्ट्र की एकता और स्थायित्व का अनिवार्य अंग है। महात्मा गांधी ने भी कहा है कि राष्ट्र भाषा के बिना एक देश गूँगा होता है। कालांतर में संविधान सभा ने हिंदी भाषा को भारत संघ की राजभाषा के रूप में मान्यता दी। वयोवृद्ध हिंदी भाषा की बढ़ती लोकप्रियता को देखे तो यह लगता ही नहीं है कि इस भाषा की उत्पत्ति 1000 साल पहले हुई। हिंदी अनुवाद की नही बल्कि संवाद की भाषा है। यह न सिर्फ एक भाषा है बल्कि हमें स्नेह, ममता, प्रेम, करुणा और प्यार करना सिखाती है। पिछले करीब 10 वर्षों में हिंदी बोलने वालों की संख्या में इजाफा हुआ है।

हालांकि 1980 और 1990 के दशक में जब उदारीकरण, वैश्वीकरण तथा औद्योगीकरण की प्रक्रिया तेज हुई तो परिणामस्वरूप अनेक विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत में आईं जिसकी वजह से हिंदी के लिए एक खतरा दिखाई दिया था, क्योंकि वे अपने साथ अंग्रेजी लेकर आई थीं। इसके अलावा औपनिवेशिक काल में भी अंग्रेजों ने भारत के लिए अंग्रेजी भाषा को ही माध्यम बनाना स्वीकार किया। लेकिन वर्तमान में विश्व के 25 से भी अधिक देशों की आधिकारिक भाषा के रूप में हिंदी ने अपनी अलग पहचान बनाई है। इसे इस भाषा कि सुंदरता ही कहेंगे की देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी माना है कि अगर वो हिंदी नहीं सीखे होते तो शायद प्रधानमंत्री नहीं बन पाते।

इसका एक उदाहरण सोनिया गांधी भी है, जिन्हें पूर्व सांसद रत्नाकर पांडेय ने हिंदी की कक्षाएं दी। 'सोनिया: अ बॉयोग्राफी' में रशीद किदवई ने लिखा है कि, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ग्रीन पार्क के हिंदी इंस्टिट्यूट से एक ट्यूटर सोनिया के लिए लगवाया था। विश्व भर में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने साल 2006 से प्रतिवर्ष विश्व हिंदी दिवस मनाने का एलान किया था, जिसके परिणामस्वरूप बीते वर्षों में हिंदी के पाठकों और बोलने वालों की संख्या में लगातार इजाफा देखा जा रहा है। हिंदी के विकास के लिए दुनिया भर की 3500 से भी अधिक विदेशी कृतियों का हिंदी में अनुवाद किया जा चुका है।

विश्व के अनेक देशों में हिंदी संस्थान संचालित किए जा रहे है जो इसके प्रभाव को बेहतर मुल्यांकित करते है। चीन, जर्मनी, ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, रूस, इटली, हंगरी, फ्रांस और जापान जैसे विकसित देशों के उच्चतर शिक्षण संस्थानों का भी हिंदी से जुड़ाव जगजाहिर है। हिंदी ने न सिर्फ अपने अस्तित्व को बरकरार रखा है बल्कि अपने भाषाई महत्व से दुनियाभर के लोगों का ध्यान अपनी और खींचा है। प्रधानमंत्री ने भी भाषायी गुलामी से मुक्त होने की पहल करते हुए ‘मन की बात’ कार्यक्रम को हिंदी में ही शुरू किया। ऐसा लगता है मानो हिंदी को नई ऊर्जा मिल रही हो। लेकिन वैश्वीकरण के बढ़ते प्रभाव, गांवों से होता पलायन और शहरों की बढ़ती आबादी से भाषा में क्लिष्टता भी पैदा होने लगी है।

दुनियाभर में कई भाषाओं ने विलुप्ती का दौर देखा है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर की जाने वाली साजिशों की वजह से कई आंचलिक व लोक भाषाएं दम तोड़ रही है। विश्व भर में 2500 से भी अधिक बोलियां समाप्त होने के कगार पर है। संस्कृत भाषा का इस्तेमाल भी न के बराबर होता है। इसके अलावा ग्रीक व लैटिन भाषाएं भी अब प्रचलन में नहीं है। कहीं न कहीं भाषाओं का विलुप्तीकरण इस बात का संकेत भी है कि अगर समय रहते भाषा को संरक्षण और उसके महत्व पर कई बड़े स्तरों पर चर्चा नहीं हुई तो आने वाला दौर भयंकर होगा। युनेस्कों के सर्वेक्षण से भाषाई विलुप्तता के कई कारणों का उल्लेख मिलता है लेकिन ये भाषाई लोप एक इकाई के खत्म होने जैसा नहीं है बल्कि एक सभ्यता, संस्कृति, आचार-विचार, लोकवार्ता, संगीत, नृत्य, कला व साहित्य के साथ इतिहास का भी पतन होने जैसा है।

हम जिस तरह से विकसित हो रहे है हमारी भाषाई सजीवता भी खत्म होती जा रही है। महात्मा बुद्ध और भगवान महावीर के लेख प्राकृत और पाली भाषा में लिखे गए है लेकिन क्लिष्ट होने और आम जन के रूझान की निंरतर कमी के चलते यह लोगों के जीवन से पूर्णतया कट से गए है। युनेस्को ने विश्व की तमाम भाषाओं के खतरे को तीन श्रेणियों में विभाजित किया है। इनमें सेफ, वल्नरेबिल और एनडैंजर्ड है, अर्थात सुरक्षित, वेध्य और संकटग्रस्त। जहां तक भारतीय भाषाओं का संबंध है युनेस्कों के सर्वेक्षण में 150 से भी अधिक भाषाओं को खतरे के दायरे में रखा गया है और इस फेहरिस्त में अंगिका, गढ़वाली, कुमाउँनी जैसी भाषाएं है जिन्हें हिंदी क्षेत्र की राजस्थानी, ब्रज, अवधी, भोजपूरी, मैथीली जैसी भाषाओं के साथ समझा जाता था। ये सभी भाषाएं हिंदी का प्रतिनिधित्व करने वाली ही है ऐसे में भाषिक स्तर पर देखा जाए तो हिंदी के लिए भी खतरा बढा है।

लेकिन दिनोंदिन बढती हिंदी की लोकप्रियता से यह स्पष्ट हो चुका है कि हिंदी ने कभी भी उर्दू और अंग्रेजी भाषा को अपना प्रतिद्वंदी माना नही, बल्कि हिंदी ने इनके साथ भी स्वस्थ प्रतियोगिता को ही अपनाया। आज भी हिंदी भाषी सिनेमा कई सौ करोड़ रूपए कमाकर शीर्ष पर काबिज दिखता है। इसके अलावा छोटे परदे की हिन्दी चैनलों की संख्या अंग्रेजी चैनलों की तुलना में और हिन्दी भाषा में प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों की टीआरपी अंग्रेजी प्रोग्रामों की तुलना में कई अधिक है। कार्यक्रमों के साथ ही हिन्दी में प्रसारित विज्ञापन अंग्रेजी में प्रसारित विज्ञापनों की तुलना में ज्यादा लिखे व पढ़े जाते है।

यहां तक की कई विदेशी उत्पादों का प्रचार भी हिन्दी माध्यम से ही हो रहा है। अब जरूरत है तो भाषा की जीवंतता को बरकरार रखने की, क्योंकि भाषा वही जीवित रहती है जिसका प्रयोग जनता करती है। इसके लिए जरूरी है की मौलिक सोच की भाषा को एक-दूसरे में प्रचारित किया जाए। हिंदी आम आदमी की भाषा के रूप में देश की एकता का सूत्र है। इसके प्रसार से हम इसे अक्षुण्ण बना कर रख सकेंगे।

सुनील कुमार शर्मा (लेखक एवं सहायक आचार्य)

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