यहां चाक पर घूम रही जिंदगी !

-सरकारी प्रोत्साहनों व कद्रदानों को तरस रहे कुंभकार

-वर्षों से सहेज रहे कला को, बेचने जाना पड़ रहा सैकड़ों किलोमीटर

By: Deepak Vyas

Updated: 22 Mar 2020, 07:56 PM IST

नोख. मिट्टी के बर्तन बनाकर अपनी आजीविका चलाने वाले कुंभकार कद्रदान नहीं मिलने से मायूस है। निराशा इसलिए भी है कि अब मिट्टी के बर्तनों को उनके कद्रदान भी कम मिल रहे हैं । ऐसे में पीढिय़ों से इस कला को जीवित रख कर अपना पेट पालने वालों को अब आजीविका चलाने के लिए भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है । ऐसा ही कुछ जिले के अंतिम छोर पर स्थित 9 ग्राम पंचायत मुख्यालय पर देखने को मिल रहा है, जहां पर कुम्हार जाति के लोग अपनी आजीविका चलाने के लिए चौक पर मिट्टी के बर्तन बनाकर इस कला को जीवित रखने का प्रयास कर रहे हैं। बावजूद इसके परिस्थितियां उनके प्रतिकूल बनी हुई है । ऐसे ही हालात बने रहे तो यह कला लुप्त हो जाए कहना भी अतिशयोक्ति नहीं होगा ।
मिट्टी को देते हैं कई रूप
कुम्हार जाति से जुड़े इन कलाकारों से चर्चा करने पर उन्होंने बताया कि मिट्टी को भिगोकर कड़ी मेहनत कर परम्परागत पत्थर की चाक पर रखकर बर्तन सहित उसे विभिन्न आकार देते हैं जिसमें मटकी घड़ा दीपक सहित कई अन्य बर्तनों और आम दिनचर्या में काम आने वाले संसाधनों का निर्माण करते हैं । वर्तमान समय में लोगों की जीवन शैली में आधुनिकता के चलते बड़ा परिवर्तन होने के कारण घरों में मिट्टी के बर्तनों का उपयोग दिनोंदिन कम होता जा रहा है । जिसका असर कुम्हारों की कला व आजीविका पर भी देखा जा रहा है । पूर्व में गांव में पानी के लिए जहां मटका तो रसोई में भी दूध और दही सहित अन्य उत्पादन के लिए मिट्टी के बर्तनों का उपयोग किया जाता था, लेकिन अब शहरों में ही नहीं गांवों में भी ठंडे पानी की मशीनें फ्रिज और स्टील के बर्तनों ने मिट्टी के बर्तनों की जगह ले ली है । ऐसे में अब मिट्टी के बर्तन घरों में दिनोंदिन कम होते जा रहे हैं । बुजुर्गों का कहना है कि मिट्टी के बर्तन का अन्य कघ बजाय अधिक स्वास्थ्य वर्धक है ।
जाना पड़ता है सैकड़ों किलोमीटर
मिट्टी से बर्तन बनाने के बाद इसे परंपरागत औजारों से पीट-पीटकर मूर्त रूप दिया जाता है, जिसके बाद इन्हें पकाने के लिए नाई ;कच्चे बर्तन पकाने की भठ्ठी में आग के हवाले किया जाता है । कई बार बारिश होने की वजह से खुले में नाई होने की वजह से कुंभकार परिवार की मेहनत पर पानी फिर जाता है और उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है । मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कुंभ कारों ने बताया कि मिट्टी के बर्तन बनाने के बाद उन्हें इनको बेचने के लिए सैकड़ों किलोमीटर दूरी तय करनी पड़ती है । इसके लिए वह ऊंट गाड़ी व गाडिय़ों का इस्तेमाल कर रहे है । ऐसे में बर्तन बनाने के साथ ही उन्हें बेचने के लिए लम्बी दूरी तय करने की वजह से लागत बढ जाने से उन्हें आज भी उचित कीमत नहीं मिल पाती है, लेकिन पारंपरिक व्यवसाय होने की वजह से आज भी यहां के वाशिंदे इससे जुड़े हुए हैं । पूरे परिवार के साथ होने की वजह से इन का कार्य हो जाता है । सरकारी सहायता आज भी ना के बराबर देखी जा सकती है । इन लोगों के अनुसार चाक पर कार्य धीमी गति से होता है और इसकी जगह इलेक्ट्रिक और अन्य संसाधन यदि उन्हें सरकारी सहायता के तौर पर मिल जाए तो उनके उत्पादन में बढ़ोतरी होगी। इसके साथ ही लोगों में इन परंपरागत बर्तनों व अन्य साधनों के प्रति जागरूकता लाने की आवश्यकता है ।

मुहैया करवाएं सुविधाएं
हमें बर्तन पकाने के लिए अलग से स्थान आवंटित किया जा कर अन्य सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाए ।
-हनुमानराम, युवा कुम्भकार, नोख ।

सरकारी नजरें हो इनायत
इस परम्परागत व्यवसाय को पीढियों से सहेज कर रखे हुए हैं। जीवित रखे हुए हैं, लेकिन कोई सरकारी सहायता नहीं मिल रही है । ऐसे हालात में यह कला लुप्त हो सकती है ।
-दिनेश प्रजापत, अध्यक्ष कुम्हार समाज, नोख

Deepak Vyas Bureau Incharge
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