कम हुआ न बदला गया मरु उद्यान क्षेत्र,जैसलमेर-बाड़मेर के हजारों लोग भोग रहे हैं पीड़ा

कम हुआ न बदला गया मरु उद्यान क्षेत्र,जैसलमेर-बाड़मेर के हजारों लोग भोग रहे हैं पीड़ा

Deepak Vyas | Updated: 04 Jul 2019, 10:37:01 AM (IST) Jaisalmer, Jaisalmer, Rajasthan, India

राज्य पक्षी गोडावण तथा मरुक्षेत्र के अन्य वन्यजीवों की रक्षा और संवद्र्धन के लिए सीमावर्ती जैसलमेर और बाड़मेर जिलों के वृहद क्षेत्रफल को 1980 के दशक में राष्ट्रीय मरु उद्यान के रूप में आरक्षित किए जाने की पीड़ा इस इलाके में निवास करने वाली हजारों की आबादी ने पिछले करीब चालीस वर्षों से भोगी है।

जैसलमेर. राज्य पक्षी गोडावण तथा मरुक्षेत्र के अन्य वन्यजीवों की रक्षा और संवद्र्धन के लिए सीमावर्ती जैसलमेर और बाड़मेर जिलों के वृहद क्षेत्रफल को 1980 के दशक में राष्ट्रीय मरु उद्यान के रूप में आरक्षित किए जाने की पीड़ा इस इलाके में निवास करने वाली हजारों की आबादी ने पिछले करीब चालीस वर्षों से भोगी है। मरु उद्यान के इस 3162 किलोमीटर लम्बे-चौड़े क्षेत्रफल को कम कर परिवर्तित करने की कोई दस साल पहले विशेषज्ञों की कमेटी की ओर से जताई गई जरूरत पर अब तक पहल नहीं हो पाई है। दूसरी ओर राष्ट्रीय मरु उद्यान के अंतर्गत आने वाले सीमावर्ती गांवों को भारतमाला प्रोजेक्ट के तहत मिलने वाली चौड़ी सडक़ की सौगात भी प्रभावित हो रही है।
काश, ऐसा हो उद्यान क्षेत्र
जानकारों की मानें तो जैसलमेर-बाड़मेर जिलों के 3162 किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले राष्ट्रीय मरु उद्यान की बजाय जैसलमेर जिले के सम सैंड ड्यून्स के साथ गोडावण की उपस्थिति वाले सुदासरी क्षेत्र को जोडकऱ उसमें तारबंदी कर मरु उद्यान क्षेत्र बनाया जाए। जिससे मौजूदा समय में दोनों जिलों के दर्जनों गांवों के हजारों लोगों को राहत मिल सकती है। गौरतलब है कि वर्ष 2010 में वाइल्ड लाइफ ऑफ इंडिया के रणजीतसिंह की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय कमेटी जैसलमेर आई थी। उस कमेटी के सभी सदस्यों का यह मानना था कि राष्ट्रीय मरु उद्यान के क्षेत्र को कम करने के साथ उसे परिवर्तित भी किया जाए। तब रणजीतसिंह के नेतृत्व वाली कमेटी ने जैसलमेर के सीमांत क्षेत्र शाहगढ़ में अफ्रीकन चीता सेंचुरी बनाने का प्रस्ताव रखा। जिसका यहां पुरजोर विरोध हुआ, उस हंगामे के बीच मरु उद्यान क्षेत्र की पुनर्सरंचना का मसला भी लम्बित ही रह गया।
पूरा नहीं हुआ उद्देश्य
मरुस्थलीय क्षेत्र के वन्यजीवों को सुरक्षित रखने के लिहाज से बनाए गए मरु उद्यान क्षेत्र ने हजारों की मानव आबादी के साथ गोवंश सहित उनके पालतु पशुओं के लिए उलझनें ही पैदा की हैं। सख्त नियमों के कारण जैसलमेर के सम क्षेत्र से बाड़मेर जिले के हरसाणी तक के विशाल भूभाग में कई सरकारी व विकास योजनाओं का अन्य क्षेत्रों की भांति क्रियान्वयन नहीं हो सका। इस क्षेत्र में निवासरत ग्रामीणों को सडक़, बिजली, पानी, संचार जैसी आधारभूत सुविधाओं के लिए भी लम्बा इंतजार करना पड़ा है। गौरतलब है कि 1980 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के जैसलमेर दौरे के बाद उनके निर्देशानुसार ही मरु क्षेत्र की वनस्पति व जीव-जंतुओं के संरक्षण के लिए दो जिलों के भूभाग को मिलाकर राष्ट्रीय मरु उद्यान बनाया गया।
नहर निर्माण कार्य भी बाधित
राष्ट्रीय मरु उद्यान क्षेत्र के कारण ही पश्चिमी राजस्थान की जीवनरेखा मानी जाने वाली इंदिरा गांधी नहर परियोजना का निर्माण कार्य भी प्रभावित हुआ है। यह परियोजना बाड़मेर के गडरा रोड तक जानी है। ऐसे ही सुरक्षा की दृष्टि से भारतमाला प्रोजेक्ट के अंतर्गत जैसलमेर से म्याजलार तक करीब सौ किलोमीटर सडक़ का कार्य भी नियमों के फेर में उलझकर रह गया। इस क्षेत्र में रहने वाले लोगों के भूमि संबंधी अधिकार भी प्रतिबंधित हुए।

फैक्ट फाइल -
- ’80 के दशक में बना मरु उद्यान
- 3162 किलोमीटर का क्षेत्रफल
- 1900 जैसलमेर व 1262 किमी बाड़मेर का क्षेत्र

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