JAISALMER #KhulkeKheloHoli बादशाह-शहजादा की परम्परा बनाती है जैसलमेर की होली को खास

By: jitendra changani

Updated: 25 Feb 2018, 11:08 PM IST

Jaisalmer, Rajasthan, India

Rajasthan patrika

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बादशाही बरकरार, शहजादा सलामत... जैसलमेर की होली को विशिष्ट पहचान दिलाती है परंपरा

सोनार दुर्ग में लगता है बादशाह का दरबार और निकाली जाती है सवारी
जैसलमेर. पाक सीमा से सटे सरहदी जैसलमेर जिले में होली पर्व को लेकर उल्लास, उत्साह व मस्ती से युक्त माहौल है तो भक्ति के साथ परंपराओं का भी निर्वहन भी होता है। इन सबके बीच एक ऐसी परंपरा है जो जैसलमेर की होली को अन्य स्थानों की होली से कुछ अलग बनाती है, वह है बादशाह-शहजादे की पंरपरा। वर्षों से इस परंपरा का निर्वहन आज भी किया जाता है। समय बदला, लोग बदले, माहौल बदले और स्वर्णनगरी में विकासात्मक बदलाव हुए, बावजूद इसके बादशाह-शहजादे की परंपरा आज भी निभाई जा रही है। होली के दिन माहौल में जब बदशाही बरकरार, शहजादा सलामत... के जयकारे गूंजते हैं तो यह लगने लगता है कि बादशाह व शहजादे की की सवारी आ रही है। सोनार दुर्ग में धुलंडी के दिन बादशाह और शहजादा का स्वांग होता है। इसमें एक बादशाह बनाया जाता है। इसी तरह शहजादों के स्वांग के लिए बालकों को तैयार कर बिठाया जाता है। एक दिन के बादशाह बनने का गौरव पुष्करणा समाज के व्यास जाति के विवाहित व्यक्ति को ही मिलता है। सोनार दुर्ग स्थित बिल्ला पाड़ा में बादशाह का दरबार लगता है और
गैरों से गहराता है होली का रंग
परंपरागत रुप से पुष्करणा समाज की ओर से निकाली गई गैरों से होली का रंग और गहरा हो जाता है। गुलाल, अबीर उड़ाते और होली के उन्माद में मचलते व तबले की थाप पर थिरकते बच्चे, युवा और बुजुर्ग बादशाह के दरबार में शामिल होते हैं और उसके बाद निकाली जाने वाली सवारी में भी फाग गीत गाते हुए साथ चलते हैं। यह नजारा देखने दूर-दराज से लोग आते हैं। लक्ष्मीनाथ मंदिर पहुंचकर जब बादशाह से पूछा जाता है कि बादशाह क्या फरमाता है तो बादशाह बना व्यक्ति अपनी श्रद्धानुसार राशि या फिर गोठ की घोषणा करता है। जिस घर का सदस्य बादशाह या शहजादा बनता है, उनके यहां बधाइयोंं का तांता लग जाता है। इस मौके पर सैकड़ों कैमरे की नजर इस अनूठी प्रथा पर रहती है। इस तरह की होली को देखने सात-समंदर पार से भी सैलानी आते हैं।
क्या है कहानी
वर्षों पहले हुई बादशाह-शहजादा की प्रथा के पीछे, वैसे तो कई कहानियां प्रचलित है। जो कहानी ज्यादा प्रचलित है वह यह है कि जैसलमेर से दूर किसी बाहरी क्षेत्र से एक व्यास जाति का ब्राह्मण अपने धर्म परिवर्तन के भय से भाग कर जैसलमेर आया था। उस दिन होली का अवसर था। जैसलमेर आकर जब उसने अपनी पीड़ा यहां के लोगों को बताई तो उन्होंने होली पर्व के स्वांग के तौर पर उसे बादशाह का स्वांग कर तख्त पर बिठा दिया। जब ब्राह्मण को खोजने संबंधित क्षेत्र के बादशाह के लोग यहां आए तो वे खुश हो गए कि ब्राह्मण का धर्म परिवर्तन हो गया है, जबकि यह होली का स्वांग था। उसके बाद वे यहां से खुश होकर लौट गए। इसके बाद से यहां बादशाही बरकरार, शहजादा सलामत...की परंपरा का निर्वहन किया जाता है।

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