Jaisalmer पत्रिका अभियान- सोनार को बचाना है डिस्प्ले के चक्कर में ढंकता जा रहा किला

By: jitendra changani

Published: 19 Sep 2017, 09:52 PM IST

Jaisalmer, Rajasthan, India

Rajasthan patrika

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सोनार दुर्ग के विभिन्न हिस्सों में इस तरह प्रदर्शित किया जाता है सामान।

जैसलमेर . सोनार किले का दीदार करने आने वाले सैलानियों को आकर्षित करने के लिए दुकानदारों की ओर से सामान का किया जाने वाला प्रदर्शन (डिस्प्ले) पिछले कुछ वर्षों से अपने आप में एक समस्या बन गया है। दुर्ग की प्राचीन दीवारों और कलात्मक स्थानों पर हैंडीक्राफ्ट के चदरों, कालीनों को लटकाकर रखने की प्रवृत्ति इतनी बढ़ गई है कि, इस कारण सोनार किले संबंधित हिस्सा ही छिप जाता है। ऐसे ही गलियों-कुचों में आई दुकानों का सामान इतना फैलाकर रखा जाता है कि, पहले से संकरे मार्ग और सिकुड़ गए हैं। सैलानियों के अलावा दुर्ग के बाशिंदों को भी इस कारण आवाजाही में समस्याएं होती हैं। विगत अर्से के दौरान इस तरफसे प्रशासन ने आंखें मूंद कर रखी है। एक तरह की अराजकता चारों तरफ हावी है।
प्रवेश के साथ ही प्रदर्शन शुरू
दुर्ग की अखे प्रोल में जैसे ही प्रवेश किया जाता है, वहां आई हुई विभिन्न सामानों की प्रदर्शनियां सजी दिखाई देती है। इनमें हैंडीक्राफ्ट वस्तुओं के साथ टोपी, चश्में, खिलौने और अन्य सामान भारी तादाद में प्रदर्शित किए हुए हैं। सैलानियों को आकर्षित करने के लिए दुकानदार किले के आकर्षण को ही छिपा रहे हैं। अखे प्रोल के बाहर भी आए दिन कोई न कोई कार्यक्रम संबंधी बैनर अथवा हॉर्डिंग टंगा रहता है। इससे किले के प्रवेश द्वार का ढंग का फोटो तक नहीं खींचा जा सकता। दुर्ग की सूरज प्रोल के पास की विशाल प्राचीर पर भी इसी तरह की प्रचार सामग्री नजर आती है। किले की चढ़ाई खत्म होते-होते दोनों तरफ की दीवारें बैडशीट्स व ऐसे ही सामान से भरी रहती हैं तो दुर्ग के दशहरा चौक में चारों तरफ बेची जाने वाली वस्तुओं की नुमाइश का मंजर दिखाई देता है। देशी-विदेशी सैलानी इस ‘बाजारवाद’ को देख हैरान होते हैं तो प्रबुद्ध दुर्गवासी खुद को शर्मसार महसूस करते हैं। किले की भीतरी गलियों में भी हालात जुदा नहीं हैं। कुछ दुकानों व होटलों पर रंग-बिरंगे फ्लेक्स बैनर किले के नैसर्गिक सौन्दर्य पर भारी पड़ रहे हैं।
कुछ सार्थक कोशिशें भी हुई
किले को साफ-सुथरा दिखाने के लिए पूर्व में कुछेक सार्थक कोशिशें की गई। इनमें 1997-98 के दौरान तत्कालीन जिला कलक्टर सुधांश पंत का नाम आज भी किले के लोगों के जेहन में ताजा है। पंत ने किले की सुंदरता को उभारने के लिए दुकानदारों को सामान का डिस्प्ले नहीं करने के लिए पाबंद किया था। वह स्वयं लगभग रोजाना किले पर पैदल चढ़ते और व्यवस्थाओं को देखते। उनके स्थानांतरण के बाद शायद ही किसी कलक्टर ने इस दिशा में काम करने की जहमत उठाई हो। बीच में कभी कभार नगरपरिषद सक्रिय दिखाई दी, लेकिन इसका कोई असर नहीं पड़ा। चंद वर्ष पहले ‘आई लव जैसलमेर’ नामक संस्था ने इस दिशा में कदम उठाए और उसकी प्रेरणा से कई प्रतिष्ठानों के साइनबोर्ड जैसलमेरी पत्थर पर खुदवाकर लगवाए गए। सामान को फैला कर रखने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने का प्रयास भी हुआ। जिसका असर कुछ लोगों पर पड़ा।
हद कायम करनी आवश्यक
सोनार किला के सभी दुकानदारों व अन्य प्रतिष्ठान संचालकों को डिस्प्ले के संबंध में संयम बरतने की आवश्यकता है। आम मार्ग व प्राचीन दीवारों पर इनका प्रदर्शन नहीं किया जाए तो दुर्ग ज्यादा आकर्षक नजर आएगा। इससे उनका व्यवसाय स्वत: बढ़ जाएगा।
-पुष्पेंद्र व्यास, रिसोर्ट संचालक
जेएस190920 से जेएस190922 पत्रिका

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