scriptDevothani Ekadashi and Tulsi Vivah along with three-day Tulsi program | देवोठनी एकादशी व तुलसी विवाह के साथ ही तीन दिवसीय तुलसियों का कार्यक्रम संपन्न | Patrika News

देवोठनी एकादशी व तुलसी विवाह के साथ ही तीन दिवसीय तुलसियों का कार्यक्रम संपन्न

- तुलसी व सालिगराम का विवाह करवाकर की सुख समृद्धि की कामना

जैसलमेर

Published: November 15, 2021 01:53:48 pm


पोकरण. गोपाष्टमी से प्रारंभ हुआ तीन दिवसीय धार्मिक पर्व देवोठनी एकादशी पर तुलसी विवाह समारोह के साथ रविवार को संपन्न हुआ। इस पर्व के अंतिम दिन स्थानीय मंदिरों में विशेषकर महिला श्रद्धालुओं की भीड़ देखी गई तथा कस्बे के चारभुजा मंदिर, गोवर्धननाथ जी की हवेली, सत्यनारायण भगवान के मंदिर व बाबा रामदेव की कोटड़ी में देर रात तक महिला श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। गौरतलब है कि गोपाष्टमी से तुलसी पर्व शुरू होता है तथा महिलाएं परिवार में सुख समृद्धि व सुहाग की लम्बी उम्र व स्वास्थ्य के लिए तथा कुंवारी कन्याएं सुयोग्य वर की कामना को लेकर प्रार्थना करती है। ये महिलाएं व कन्याएं तीन दिन तक निराहार रहकर उपवास रखकर घर में लगाए गए दीपक के दिन में कई बार दर्शन करती है व उसके समक्ष हरिकथा व कीर्तन करती है। एकादशी के दिन विशेष पूजा-अर्चना का कार्यक्रम किया जाता है। सुहागिनें अपने घरों में लक्ष्मी के रूप में तुलसी के पौधे व विष्णु भगवान के प्रतीक के रूप में सालिगराम के विवाह कार्यक्रम का आयोजन करती है। इसके पश्चात् बारस को सुबह पूजा-अर्चना के बाद चौथे दिन ब्राह्मण भोजन के पश्चात् वे महिलाएं स्वयं भोजन कर परिवार में सुख समृद्धि के लिए प्रार्थना करती है। देवोठनी एकादशी के मौके पर रविवार को दिनभर कस्बे के मंदिरों में चहल पहल रही। शाम के समय महिलाएं व कन्याएं सजधज कर मंदिरों में पहुंची तथा मंदिरों की मुंडेर पर दीपक लगाकर उसे दीपमाला से सजाया। कई मंदिरों को आकर्षक रोशनी से भी सजाया गया। देर रात तक कस्बे के मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ रही। इस मौके पर विभिन्न मंदिरों में कथा व भजनों का कार्यक्रम आयोजित किया गया।
देर रात तक रही तुलसी-सालिगराम विवाह की धूम
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अपने जीवन में कन्यादान का विशेष महत्व है। जिस दम्पति के घर में कन्या का जन्म नहीं होता है, वे तुलसी के पौधे को लक्ष्मी के रूप में अपने घर में लगाकर उसकी देखभाल करती है तथा सालिगराम के रूप में भगवान विष्णु की पत्थर की मूर्तियां बनाकर उसका आपस में विवाह रचाकर कन्यादान की रस्म अदा की जाती है। इसी परंपरा के चलते रविवार रात में कई घरों में विवाह के मंडप सजाए गए, मंगल गीत गाए गए तथा गाजे बाजे के साथ सालिगराम की बारात का स्वागत कर विवाह समारोह का आयोजन किया गया। इसको लेकर देर रात तक कई घरों में विवाह कार्यक्रम की धूम रही। देवोठनी एकादशी के बाद मान्यताओं के अनुसार चौमासा खत्म हो जाता है, शुभ कार्यक्रमों की शुरूआत हो जाती है तथा लोग एकादशी से विवाह व नए कार्यक्रमों की शुरुआत करते है।
देवोठनी एकादशी व तुलसी विवाह के साथ ही तीन दिवसीय तुलसियों का कार्यक्रम संपन्न
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