58 वर्ष बाद भी दिलोदिमाग पर अमिट है परिवारजनों के जख्म

-21नवंबर 1962 को थमा था भारत-चीन युद्ध
-शहीद सूबेदार बलवंतसिंह खींची के परिवार को नहीं मिली उनकी पार्थिव देह
-शहीद के पौत्र व रामगढ़ थानाधिकारी महेन्द्रसिंह खींची ने पत्रिका के साथ बांटे अनुभव

By: Deepak Vyas

Published: 22 Nov 2020, 07:28 PM IST

जैसलमेर. '21 नवंबर 1962, यह दिन भारत के इतिहास में वह तारीख है, जब आज से करीब 58 वर्ष पहले आज ही के दिन भारत-चीन युद्ध समाप्त हुआ है। युद्ध तो समाप्त हो गया, लेकिन इसके निशान कुछ परिवारों के दिलोदिमाग पर अभी भी बरकरार है। यह कहना है उस युद्ध में भाग लेने वाले शहीद सूबेदार बलवंतसिंह खींची के पौत्र व जिले के सरहदी रामगढ़ क्षेत्र के थानाधिकारी महेन्द्रसिंह खींची का। वे मूलत: जोधपुर जिले के हैं। राजस्थान पत्रिका से खास बातचीत में उन्होंने कहा कि हालांकि उनका जन्म इस युद्ध के बाद हुआ और वे शहीद की तीसरी पीढ़ी से हैं, लेकिन युद्ध के बाद के घटनाक्रमों को उन्होंने नजदीक से देखा है। उनके दादा शहीद सूबेदार बलवंतसिंह खींची ने इस युद्ध में अपना बलिदान दिया। त्रासदी यह रही कि युद्ध के बाद उनका पार्थिव शरीर उनके परिवाजनों को नहीं मिला। इस युद्ध में कई लोगों को गुमसुदा (मीसिंग इन एक्शन) माना गया। बाद में सरकार ने उन्हें युद्ध में शहीद (किल्ड इन एक्शन) माना। शहीद सूबेदार बलवंतसिंह भारतीय सेना के एक तोपखाना रेजिमेंट में थे।
अब तक रहस्य बना रहा कि कैसे हुई मौत
उन्होंने बताया कि बचपन से कई किस्से-कहानियां सुनी कि शहीद सूबेदार बलवंतसिंह को पैर में गोली लगी व उनके साथी उन्हें लेकर जा रहे थे तो न चलने की स्थिति में उन्होंने यही कहा कि उन्हें वहीं छोड़ दिया जाए तो किसी ने कहा कि वे चीन में बतौर भारतीय युद्धबंदी में देखे गए। कुछ यह भी सुना कि सेना जब नाला पार कर रही थी तो एक बड़ा पुल चीनी सेना के तोप के गोले से टूट गया और कई सैनिक बह गए। उन्होंने कहा कि ऐसे कई सवाल उनके मन में थे। जब उनका पदस्थापन बतौर जैसलमेर जिले में थानाधिकारी व निरीक्षक पुलिस थाना रामगढ़ में हुआ तो उनके मन में यह ख्याल भी मन में था कि आखिर उस दिन क्या हुआ? यही जानने की इच्छा के चलते उन्होंने पता किया कि उस युद्ध में रेजिमेंट के कई लोग जैसलमेर जिले के भी थे। पता करने पर जानकारी मिली कि लुणाखुर्द गांव के शहीद लांसनायक अग्रसिंह और शहीद नायक पर्वतसिंह भी इसी रेजिमेंट में थे, लेकिन दोनों शहीदों के परिवार जनों की भी स्थिति यही थी कि उन्हें भी नहीं पता था कि आखिर हुआ क्या था?
थानाधिकारी खीची आगे बताते हैंं कि सेना के एक कर्नल ने अपने प्रयासों दो सैनिकों रिटायर्ड सूबेदार छतुसिंह शेखावत व रिटायर्ड ओनरेरी कैप्टन विजयसिंह से संपर्क कराया। ये दोनों भी युद्ध में शामिल उसी रेजीमेंट में शामिल थे। उन्होंने उस समय युद्ध की समूची कहानी बताई कि आखिर उस दिन हुआ क्या था? उन्होंने बताया कि शहीद सूबेदार बलवंतसिंह उस दिन एक ओपी टावर पर खड़े थे और उनकी टुकड़ी द्वारा दुश्मन पर फैंके जा रहे गोलों की सटीकता का आंकलन किया जा रहा था। तभी एक एमएमजी मशीन गन का बस्र्ट फायर उनके सीने पर लगा और वे घायल हो गए। फिर उन्हें बचाने के लिए कुछ सैनिक उन्हें एक से डेढ़ किलोमीटर पीछे लाए, लेकिन तब तक वे शहीद हो चुके थे। इसके बाद परिस्थितिवश उन्हें बर्फ पर छोड़ दिया गया और रेस्क्यू टीम लौट गई। उन्होंने यह भी बताया कि सीज फायर के बाद भारतीय सेना वहां गई और कुछ सैनिकों की देह तो बर्फ में दब गई और कुछ भारतीय सैनिक वहां सैन्य वेश में मिले, उनका वहीं सामूहिक दाह संस्कार कर दिया।
किताबों का भी किया अध्ययन
दादा की मौत की वजह को जानने के लिए कई किताबें पढ़ी, लेकिन जिज्ञाासा शांत नहीं हुई। उन्होंने युद्ध में राजस्थान के वीरों का पराक्रम अतुलनीय था। शहीद बलवंतसिंह खींची गांव का नाम रखा गया।
शहीद का परिवार
शहीद सूबेदार बलवंतसिंह की शहादत के दौश्रान परिवार के ज्येष्ठ पुत्र हुनवंतसिह( सेवानिवृत्त समादेष्टा सीसुब) केवल 16 वर्ष के थे।
-शहीद सूबेदार बलवंतसिंह के दो भाई थे। उनके छोटे भाई रिटायर्ड सूबेदार मंगलसिंह की वर्ष 1971 के भारत-पाक युद्ध में पंजाब बॉर्डर पर हाथ पर गोली लगी थी, जिससे वे घायल हुए थे।
-शहीद के पुत्र हनवंतंिसंह भी वर्ष 1971 के युद्ध में गुजरात सीमा पर लड़े।
-शहीद के दूसरे पुत्र शेरसिंह बैंक प्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त।
-तीसरे पुत्र जनरसिंह उप निरीक्षक आरएसी व चौथे पुत्र भवानीसिंह अध्यापक के पद से सेवानिवृत्त।
-शहीद की तीसरी पीढ़ी में महेन्द्रसिंंह खींची रामगढ़ थानाधिकारी व उनके बड़े भाई रविन्द्रसिंह खींची निरीक्षक पुलिस थानाधिकारी सुमेरपुर कार्यरत है।

Deepak Vyas Bureau Incharge
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