गुमनानी का दंश झेल रहा तीन जिलों की त्रिवेणी पर बसे नोख क्षेत्र का ऐतिहासिक किला

जिस किले ने बाढ़ में बचाई सैकड़ों जान, उसी पर नहीं ध्यान
-13 वर्ष पहले कराई मरम्मत, फिर सार-संभाल करना भूले

By: Deepak Vyas

Published: 15 Jun 2021, 10:40 AM IST

जैसलमेर/नोख. सरहदी जैसलमेर जिले से करीब 224 किलोमीटर दूर स्थित अंतिम छोर पर आया नोख गांव को जैसलमेर, जोधपुर व बीकानेर जिलों की त्रिवेणी पर होने का गौरव प्राप्त है। इस दूरस्थ जिले को ख्याति मिली, इसके गौरवशाली किले के कारण भी, जो वर्ष 1996 व 2000 में बाढ़ के दौरान शरणस्थली बना और शरण देकर जान की रक्षा भी की। आज यही ऐतिहासिक किला गुमनानी का दंश झेलने को मजबूर है। इस किले की दीवारें दरकने लगी है, नीवें हिलने लगी है और छतें झूलने लगी है।
जिम्मेदारों की ओर से इसकी मरम्मत की ओर लम्बे समय से ध्यान नहीं दिया जा रहा है । गांव के बीचों बीच स्थित इस ऐतिहासिक धरोहर में उप तहसील कार्यालयए डाकघर व टेलीफोन एक्सचेंज के कार्यालय संचालित हो रहे हैं तो वर्षों पहले यहां पर टीडी विभाग के कार्यालय का संचालन भी हो चुका है । करीब 13 साल पहले इसके अगले भाग की मरम्मत जरूर हुई थी, लेकिन बाकी का हिस्सा जर्जर हाल व बदहाल अवस्था में है । इसकी समय रहते मरम्मत व सार संभाल करने से यह किला भविष्य में बहुपयोगी साबित हो सकता है। नोख गांव के इस ऐतिहासिक किले का निर्माण आजादी से पहले हुआ था । शुरूआती दौर में ये रियासतों के कब्जे में था तो आजादी के बाद यह सरकारी सम्पत्ति हो गया है । इस किले के निर्माण में पत्थर व चूने का प्रयोग किया गया था । चारो तरफ कमरों का निर्माण सुरक्षा दीवार के साथ किया गया था।
ग्रामीणों के लिए शरणगाह
प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इस किले में उप तहसील क्षेत्र के लोग अपनी समस्याओं के समाधान के लिए पहुंचते हैं तो उप पंजीयन कार्यालय का संचालन भी यहाँ पर होने से हर वक्त लोगों की आवाजाही बनी रहती है । इसके अलावा यह किला मुसीबतों के समय नोख वासियों की शरण स्थली के रूप में काम आता रहा है । वर्ष 1996 व 2000 में नोख में अतिवृष्टि के कारण आई बाढ के समय यह किला लोगों की शरणस्थली बना था । ऊंचाई वाली जगह पर होने से लोगों ने बाढ से बचाव के लिए यहां पर शरण ली थी । वर्ष 1996 में तो कई परिवारों ने तो करीब एक महीने तक यहां पर शरण ली थी। नोख सरपंच सुमन छंगाणी बताती है कि ऐतिहासिक किले की स्थिति जर्जर हो रही है। समय रहते इसकी मरम्मत करने की जरूरत है। भविष्य में यह किला काफी उपयोगी साबित हो सकेगा।
अब ऐसा हो गया किला
-किले के जिस हिस्से में उप पंजीयन कार्यालय का संचालन किया जा रहा है वहां पर तो एक तरफ के बरामदे की छत में पट्टी टूटी हुई है।
-बरामदे में पंजीयन के लिए आने वाले लोग व उनके परिजन बैठे रहते हैं। ऐसे में किसी हादसे की आशंका है।
-किले के भवन व उनके खिड़की दरवाजे भी धीरे धीरे क्षतिग्रस्त हो रहे हैं। किला परिसर में ही करीब तीस साल पहले एक बड़ा सा कमरा अधूरा ही पड़ा है।
-इस कमरे की दीवारें खड़ी की गई थी लेकिन इसकी छत व खिड़की दरवाजे आज भी नहीं लगाए गए है। अधूरा भवन किले का सौंदर्य बिगाड़ रहा है ।
अब तक यह हुए प्रयास
-करीब 20 वर्ष पहले इस ऐतिहासिक किले की अकाल राहत कार्य के मजदूरों से सफाई करवाई गई थी।
-राजस्व विभाग के कर्मचारियों ने कड़ी मेहनत कर किला परिसर में पेड़ पौधे लगाकर इसे हराभरा व रमणीक स्थल बना दिया था ।
-उनके लगाए पेड़ पौधों की छाया आज भी यहां आने वाले लोगों को सकून प्रदान करती है ।
- करीब 13 साल पहले तत्कालीन जिला कलेक्टर डॉ. केके पाठक ने 5 लाख रुपए से इसके अगले हिस्से की मरम्मत करवाई थी। इसके बाद इसकी बदहाली का दौर बना हुआ है।

Deepak Vyas Bureau Incharge
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