जिंदगी की तकलीफों का मुस्कुराते हुए सामना करने की सीख दे रहा नेत्रहीन झबरसिंह

नेत्रहीन झबरसिंह के इष्टदेव दो हैं-रामदेवरा के बाबा रामदेव और सोनार दुर्ग स्थित भगवान लक्ष्मीनाथ। वह वर्ष में दो बार जैसलमेर से करीब 120 किलोमीटर दूर रामदेवरा की पदयात्रा करता है और हर दिन भगवान लक्ष्मीनाथ को ‘शयन’ करवाने पहुंचता है। वह अमूमन यही बुदबुदाता है, ‘म्याळी डोरी हमे इये दोय बाबो रे हाथ में होईं, ऐईज मनो चलावेई।’ वह हर समय मुस्कुराता नजर आता है, किसी से कोई रंज नहीं और सेवा कार्य में ही उसक दिन गुजरता है।

जैसलमेर. नेत्रहीन झबरसिंह के इष्टदेव दो हैं-रामदेवरा के बाबा रामदेव और सोनार दुर्ग स्थित भगवान लक्ष्मीनाथ। वह वर्ष में दो बार जैसलमेर से करीब 120 किलोमीटर दूर रामदेवरा की पदयात्रा करता है और हर दिन भगवान लक्ष्मीनाथ को ‘शयन’ करवाने पहुंचता है। वह अमूमन यही बुदबुदाता है, ‘म्याळी डोरी , ऐईज मनो चलावेई।’ वह हर समय मुस्कुराता नजर आता है, किसी से कोई रंज नहीं और सेवा कार्य में ही उसक दिन गुजरता है। भीड़भाड़ भरे इलाकों में सधे हुए कदमों से यूं चला जाता है मानो उसे सब दिखाई दे रहा हो। नेत्र सुख से वंचित जैसलमेर के ऐतिहासिक दुर्ग निवासी झबरसिंह जब 10 वर्ष का था, तब वह अपनी आंखों की रोशनी खो बैठा। उसने जीने का हौसला कायम रखा। आज उसे बिना किसी का सहारा लिए, अपना सारा काम खुद करता देखकर उसे नहीं जानने वाले हैरान हो जाते हैं, जबकि जो लोग वर्षों से उसे देख रहे हैं, उनके लिए करीब 40 वर्षीय झबरसिंह जिसे सब लोग प्यार से ‘झबरा’ पुकारते हैं, की यह क्षमता जानी-पहचानी बात है। झबरसिंह ने अंधता के अभिशाप को जीवन यात्रा पर हावी नहीं होने दिया। हर किसी की सहायता करने में खुशी अनुभव करता है। नियम से अपनी गाय को चराई के लिए दुर्ग की रपटीली घाटियों से भीड़भाड़ के बीच से गुजरता है। गोपा चौक स्थित प्याऊ पर काम कर प्रतिदिन हजारों लोगों की प्यास बुझाता है।
10 साल की उम्र में छिन गई नेत्रज्योति
झबरसिंह जन्म से नेत्रहीन नहीं है। उसकी आंखों की रोशनी बिलकुल दुरुस्त थी, लेकिन १० साल की उम्र अचानक उसके सिर में तेज दर्द रहने लगा और बाद में एक आंख में मोतियाबिंद पक गया। जिसका भरसक उपचार उसके परिवार ने करवाया। उस समय जोधपुर में हुए ऑपरेशन के बाद उसकी आंख तो ठीक नहीं हुई, दूसरी आंख की रोशनी भी चली गई। उसके घरवालों ने उसे अहमदाबाद में बड़े नेत्र विशेषज्ञ को दिखाया। एक विदेशी विशेषज्ञ ने भी उसकी जांच की। डॉक्टरों ने झबरसिंह की जांच के बाद घोषित किया कि, उसकी दोनों आंखों की रोशनी जा चुकी है और अब इसका कोई उपचार नहीं है।
दर्द का हद से गुजर जाना, दवा बन जाना
किशोरावस्था में अंधेपन का दंश झेलने वाले झबरसिंह को शुरुआती वर्षों में अपनी हालत पर बहुत रोना आता। उसकी माता माणको देवी और पिता मोहनसिंह, जिनका कुछ अर्सा पहले ही देहावसान हुआ है, भी उसे देखकर कलपते और भाग्य के आगे खुद को बेबस पाते। कुछ वर्ष अवसाद में बिताने के बाद झबरसिंह ने नेत्रहीनता के घाव के साथ जिंदगी में संघर्ष को नियति मान लिया। उसने इतने बड़े अभाव को अपने स्वभाव पर हावी नहीं होने दिया बल्कि उसकी रुह और पाकीजा हो गई। हर किसी के साथ हंसकर बतियाना, मन की आंखों से देखकर जिंदगी के रास्तों पर आगे बढऩा झबरसिंह की विशेषता बन चुकी है। किसी के प्रति कोई गिला या शिकवा नहीं, यहां तक कि खुद की जिंदगी से भी। वह कहता है, अब उसे किसी चीज का अभाव नहीं खलता। खुद को अन्य दृष्टिवान लोगों जितना या शायद उनसे भी ज्यादा, व्यस्त रखता है झबरसिंह। घर पर मां, भाई-भाभी उसके रोजमर्रा की जरूरतों का पूरा ख्याल रखते हैं। झबरसिंह को इससे ज्यादा कुछ चाहिए भी तो नहीं।

Deepak Vyas
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